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कार्बन अवशोषित करने में भारत ने सभी देशों को पीछे छोड़ा
Updated Thu, 13 Sep 2018 02:20 AM IST
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कार्बन अवशोषित करने में भारत ने सभी देशों को पीछे छोड़ा
ब्यूरो/अमर उजाला
देहरादून। दुनिया में तेजी से घट रहे वन क्षेत्रफल और कार्बन डाईऑक्साइड के उत्सर्जन मेें आई तेजी के चलते क्लाइमेट चेंज पर पड़ रहे असर पर मंथन के लिए वन एवं पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में काम कर रहे दुनिया के 13 देशों व कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के विशेषज्ञ देहरादून में हैं। भारतीय वन सर्वेक्षण की ओर से आयोजित तीन दिवसीय सेमिनार में पहले दिन पर्यावरण विशेषज्ञों के बीच दुनिया में कार्बन उत्सर्जन के साथ ही कार्बन डाईऑक्साइड के अवशोषण के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई।
सेमिनार के दौरान यह बात सामने आई कि भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जिसने कार्बन अवशोषण के मामले में तमाम देशों को पीछे छोड़ दिया है। सेमिनार के दौरान विशेषज्ञों ने इस बात पर चिंता जताई कि तमाम प्रयासों के बावजूद दुनिया के कई देशों में वन क्षेत्रफल कम हो रहा है। ऐसे में यदि कार्बन अवशोषण में तेजी लाना है तो वनीकरण पर जोर देना होगा।
सेमिनार के दौरान पेरिस समझौते के तहत सेमिनार में हिस्सा ले रहे देशों के प्रतिनिधियों ने ‘यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क फार क्लाइमेट चेंज एंड कंवेंशन’ यानी यूएनएफसीसीसी की ओर से संचालित प्रोग्राम रेड प्लस के तहत यह डाटा साझा किया कि आखिरकार उनके देश की ओर कितना कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन किया जा रहा है और कितना अवशोषित किया जा रहा है। सेमिनार के दौरान यह बात सामने आयी कि रूस, ब्राजील, कनाडा, अमेरिका, चीन, कांगो, आस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, पेरू के साथ भारत वन क्षेत्रफल के मामले में दुनिया के दस देशों में शामिल हो गया है।
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दुनिया के कई देशों ने तैयार किया फारेस्ट रेफरेंस इमिशन लेवल डाटा
सेमिनार के दौरान यह बात सामने आई कि ‘यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क फॉर क्लाइमेट चेंज एंड कंवेंशन’ यानी यूएनएफसीसीसी की ओर से संचालित प्रोग्राम रेड प्लस के तहत भारत के अलावा श्रीलंका, इंडोनेशिया, नेपाल, मलेशिया, कंबोडिया, वियतनाम जैसे देशों ने एफआरएल डाटा पर काफी हद तक काम कर लिया गया। इन देशों ने अपनी अपनी रिपोर्ट भी सौंप दी है लेकिन पाकिस्तान, फिजी, फिलीपींस, समोआ, सोलोमन, वनाटु जैसे देशोें ने अभी तक कोई एफआरएल डाटा तैयार नही किया है। जबकि पेरिस समझौते पर इन तमाम देशों ने भी हस्ताक्षर किए हैं।
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जितना अधिक कार्बन अवशोषण उतनी अधिक आर्थिक सहायता
एफएसआई के उपनिदेशक प्रकाश लखचौरा ने बताया कि ‘यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क फार क्लाइमेट चेंज एंड कंवेंशन’ यानी यूएनएफसीसीसी की ओर से संचालित प्रोग्राम रेड प्लस के तहत यह तय किया गया है कि दुनिया के जो भी जितना अधिक कार्बन डाईऑक्साइड अवशोषित करेंगे उन्हें उतना ही अधिक वित्तीय सहायता दी जाएगी। लेकिन इसके लिए देशों का अधिक से अधिक वनीकरण करके कार्बन अवशोषण के लिए पहल करनी होगी।
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इन देशों व अंतरराष्ट्रीय संस्थाओें के विशेषज्ञ ले रहे हिस्सा
तीन दिवसीय सेमिनार में भारत, बांग्लादेश, भूटान, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मंगोलिया, म्यांमार, नेपाल, पापुआ, न्यूगिनी, श्रीलंका, थाईलैंड, वियतनाम के अलावा एफएओ, आईसीआईएमओडी, आईसीएफआरई, यूएनडीपी, यूएन के पर्यावरण विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं।
भारत के जंगलों में 7083 मिलियन टन कार्बन स्टॉक
भारतीय वन सर्वेक्षण की ओर से तीन दिवसीय सेमिनार में पेश की गई रिपोर्ट के मुताबिक भारत के पास 7083 मिलियन टन कार्बन स्टाक है। जो साल 2015 में 44 मिलियन टन की तुलना में 39 मिलियन टन ज्यादा है। भारतीय वन सर्वेक्षण के विज्ञानियों के मुताबिक ग्राउंड बायोमास के रूप में भारत में 2238 मिलियन टन, जमीन के नीचे पाए जाने वाले बायोमास के तौर पर 699 मिलियन टन, डेड वुड के तौर पर 30 मिलियन टन, लिटर के तौर पर 136 मिलियन टन और आर्गेनिक कार्बन के तौर पर 3980 मिलियन टन कार्बन स्टाक है।
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ब्यूरो/अमर उजाला
देहरादून। दुनिया में तेजी से घट रहे वन क्षेत्रफल और कार्बन डाईऑक्साइड के उत्सर्जन मेें आई तेजी के चलते क्लाइमेट चेंज पर पड़ रहे असर पर मंथन के लिए वन एवं पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में काम कर रहे दुनिया के 13 देशों व कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के विशेषज्ञ देहरादून में हैं। भारतीय वन सर्वेक्षण की ओर से आयोजित तीन दिवसीय सेमिनार में पहले दिन पर्यावरण विशेषज्ञों के बीच दुनिया में कार्बन उत्सर्जन के साथ ही कार्बन डाईऑक्साइड के अवशोषण के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई।
सेमिनार के दौरान यह बात सामने आई कि भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जिसने कार्बन अवशोषण के मामले में तमाम देशों को पीछे छोड़ दिया है। सेमिनार के दौरान विशेषज्ञों ने इस बात पर चिंता जताई कि तमाम प्रयासों के बावजूद दुनिया के कई देशों में वन क्षेत्रफल कम हो रहा है। ऐसे में यदि कार्बन अवशोषण में तेजी लाना है तो वनीकरण पर जोर देना होगा।
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सेमिनार के दौरान पेरिस समझौते के तहत सेमिनार में हिस्सा ले रहे देशों के प्रतिनिधियों ने ‘यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क फार क्लाइमेट चेंज एंड कंवेंशन’ यानी यूएनएफसीसीसी की ओर से संचालित प्रोग्राम रेड प्लस के तहत यह डाटा साझा किया कि आखिरकार उनके देश की ओर कितना कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन किया जा रहा है और कितना अवशोषित किया जा रहा है। सेमिनार के दौरान यह बात सामने आयी कि रूस, ब्राजील, कनाडा, अमेरिका, चीन, कांगो, आस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, पेरू के साथ भारत वन क्षेत्रफल के मामले में दुनिया के दस देशों में शामिल हो गया है।
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दुनिया के कई देशों ने तैयार किया फारेस्ट रेफरेंस इमिशन लेवल डाटा
सेमिनार के दौरान यह बात सामने आई कि ‘यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क फॉर क्लाइमेट चेंज एंड कंवेंशन’ यानी यूएनएफसीसीसी की ओर से संचालित प्रोग्राम रेड प्लस के तहत भारत के अलावा श्रीलंका, इंडोनेशिया, नेपाल, मलेशिया, कंबोडिया, वियतनाम जैसे देशों ने एफआरएल डाटा पर काफी हद तक काम कर लिया गया। इन देशों ने अपनी अपनी रिपोर्ट भी सौंप दी है लेकिन पाकिस्तान, फिजी, फिलीपींस, समोआ, सोलोमन, वनाटु जैसे देशोें ने अभी तक कोई एफआरएल डाटा तैयार नही किया है। जबकि पेरिस समझौते पर इन तमाम देशों ने भी हस्ताक्षर किए हैं।
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जितना अधिक कार्बन अवशोषण उतनी अधिक आर्थिक सहायता
एफएसआई के उपनिदेशक प्रकाश लखचौरा ने बताया कि ‘यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क फार क्लाइमेट चेंज एंड कंवेंशन’ यानी यूएनएफसीसीसी की ओर से संचालित प्रोग्राम रेड प्लस के तहत यह तय किया गया है कि दुनिया के जो भी जितना अधिक कार्बन डाईऑक्साइड अवशोषित करेंगे उन्हें उतना ही अधिक वित्तीय सहायता दी जाएगी। लेकिन इसके लिए देशों का अधिक से अधिक वनीकरण करके कार्बन अवशोषण के लिए पहल करनी होगी।
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इन देशों व अंतरराष्ट्रीय संस्थाओें के विशेषज्ञ ले रहे हिस्सा
तीन दिवसीय सेमिनार में भारत, बांग्लादेश, भूटान, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मंगोलिया, म्यांमार, नेपाल, पापुआ, न्यूगिनी, श्रीलंका, थाईलैंड, वियतनाम के अलावा एफएओ, आईसीआईएमओडी, आईसीएफआरई, यूएनडीपी, यूएन के पर्यावरण विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं।
भारत के जंगलों में 7083 मिलियन टन कार्बन स्टॉक
भारतीय वन सर्वेक्षण की ओर से तीन दिवसीय सेमिनार में पेश की गई रिपोर्ट के मुताबिक भारत के पास 7083 मिलियन टन कार्बन स्टाक है। जो साल 2015 में 44 मिलियन टन की तुलना में 39 मिलियन टन ज्यादा है। भारतीय वन सर्वेक्षण के विज्ञानियों के मुताबिक ग्राउंड बायोमास के रूप में भारत में 2238 मिलियन टन, जमीन के नीचे पाए जाने वाले बायोमास के तौर पर 699 मिलियन टन, डेड वुड के तौर पर 30 मिलियन टन, लिटर के तौर पर 136 मिलियन टन और आर्गेनिक कार्बन के तौर पर 3980 मिलियन टन कार्बन स्टाक है।