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भ्रूण के कटे होंठ व तालु न देख पाना रेडियोलॉजिस्ट की चूक
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ब्यूरो/अमर उजाला/देहरादून।
कटे होंठ व तालु वाला बच्चा पैदा होने के मामले में दून अस्पताल के विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भावस्था के दौरान भ्रूण में यह कमी न देख पाना रेडियोलॉजिस्ट की चूक है। यदि रेडियोलॉजिस्ट चाहता तो महिला को एडवांस जांच के लिए भी कह सकता था। दून अस्पताल के विशेषज्ञों की इस रिपोर्ट का खुलासा दंपति ने शनिवार को पत्रकार वार्ता में किया।
गत 28 जनवरी को बबीता पाठक पत्नी प्रमोद पाठक ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी को शहर के एक इमेजिंग सेंटर की शिकायत की थी। शिकायत थी कि जब वह 19 सप्ताह की गर्भवती थी तब यहां अल्ट्रासाउंड जांच कराई थी। इस जांच के बाद इमेजिंग सेंटर ने रिपोर्ट दी थी कि बच्चा पूर्णतया स्वस्थ है। होंठ और तालु के बारे में भी उन्होंने ठीक बताया था। यही नहीं हृदय को भी पूर्णतया स्वस्थ बताया था। यही कारण था कि उन्होंने कोई जांच नहीं कराई। इसके बाद 29 अक्तूबर 2018 को उन्होंने पुत्र को जन्म दिया तो उसके होंठ और तालु कटे हुए थे। यही नहीं उसका हृदय भी निर्धारित स्थान से अलग (दाईं तरफ) था और अस्वस्थ था। ऐसे में जब उन्होंने इसकी शिकायत इमेजिंग सेंटर में की तो उन्होंने भी इसकी गलती मानी, लेकिन बाद में सेंटर संचालक अपनी बात से पलट गए।
प्रमोद पाठक का कहना है कि इस मामले में अब वो मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को शिकायत करेंगे ताकि इमेजिंग सेंटर का लाइसेंस निरस्त किया जा सके। डॉ. आहूजा डिपार्टमेंट ऑफ रेडियोलॉजी की अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट की जांच दून अस्पताल के असिस्टेंट प्रोफेसर रेडियोलॉजी विभाग डॉ. सुकृति वर्मा, विभागाध्यक्ष रेडियोलॉजी विभाग दून अस्पताल डॉ. मनोज शर्मा और वरिष्ठ रेडियोलॉजिस्ट डॉ सुबोध नौटियाल ने की थी।
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जांच रिपोर्ट का निष्कर्ष
-डॉ. आहूजा पैथोलॉजी सेंटर द्वारा लेवल टू अल्ट्रासाउंड में क्लेफ्ट लिप एंड क्लेफ्ट पैलेट्स (कटे होंठ व तालु) न देख पाना एक चूक है।
-जांच समिति यह भी महसूस करती है कि भ्रूण की जांच के समय गंभीर हृदय रोग को नहीं बताया जा सकता है, लेकिन भ्रूण में कमी मिलने की दशा में माता की थ्रीडी जांच की जाने की सलाह दी जा सकती थी। इससे हृदय की सही स्थिति का पता लगाया जा सकता था।
पहले नहीं मानी थी चूक
पहले जांच समिति ने माना था कि इस तरह की कमी अल्ट्रासाउंड जांच में नहीं पकड़ी जा सकती है। इसकी दुनियाभर में संभावना नौ से 50 फीसदी ही है। लिहाजा, इसे चूक नहीं माना जा सकता है।
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जांच रिपोर्ट विरोधाभासी है। पहले की जांच रिपोर्ट कुछ और कहती है और अब की कुछ और। ऐसे में यह और भी ज्यादा आश्चर्यजनक है कि जांच समिति ने अपनी ही जांच के विरुद्ध यह निर्णय निकाला है। यह हमारी चूक बिल्कुल नहीं है।
-डॉ. मलय जोशी, डॉ. आहूजा डिपार्टमेंट ऑफ रेडियोलॉजी
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कटे होंठ व तालु वाला बच्चा पैदा होने के मामले में दून अस्पताल के विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भावस्था के दौरान भ्रूण में यह कमी न देख पाना रेडियोलॉजिस्ट की चूक है। यदि रेडियोलॉजिस्ट चाहता तो महिला को एडवांस जांच के लिए भी कह सकता था। दून अस्पताल के विशेषज्ञों की इस रिपोर्ट का खुलासा दंपति ने शनिवार को पत्रकार वार्ता में किया।
गत 28 जनवरी को बबीता पाठक पत्नी प्रमोद पाठक ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी को शहर के एक इमेजिंग सेंटर की शिकायत की थी। शिकायत थी कि जब वह 19 सप्ताह की गर्भवती थी तब यहां अल्ट्रासाउंड जांच कराई थी। इस जांच के बाद इमेजिंग सेंटर ने रिपोर्ट दी थी कि बच्चा पूर्णतया स्वस्थ है। होंठ और तालु के बारे में भी उन्होंने ठीक बताया था। यही नहीं हृदय को भी पूर्णतया स्वस्थ बताया था। यही कारण था कि उन्होंने कोई जांच नहीं कराई। इसके बाद 29 अक्तूबर 2018 को उन्होंने पुत्र को जन्म दिया तो उसके होंठ और तालु कटे हुए थे। यही नहीं उसका हृदय भी निर्धारित स्थान से अलग (दाईं तरफ) था और अस्वस्थ था। ऐसे में जब उन्होंने इसकी शिकायत इमेजिंग सेंटर में की तो उन्होंने भी इसकी गलती मानी, लेकिन बाद में सेंटर संचालक अपनी बात से पलट गए।
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प्रमोद पाठक का कहना है कि इस मामले में अब वो मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को शिकायत करेंगे ताकि इमेजिंग सेंटर का लाइसेंस निरस्त किया जा सके। डॉ. आहूजा डिपार्टमेंट ऑफ रेडियोलॉजी की अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट की जांच दून अस्पताल के असिस्टेंट प्रोफेसर रेडियोलॉजी विभाग डॉ. सुकृति वर्मा, विभागाध्यक्ष रेडियोलॉजी विभाग दून अस्पताल डॉ. मनोज शर्मा और वरिष्ठ रेडियोलॉजिस्ट डॉ सुबोध नौटियाल ने की थी।
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जांच रिपोर्ट का निष्कर्ष
-डॉ. आहूजा पैथोलॉजी सेंटर द्वारा लेवल टू अल्ट्रासाउंड में क्लेफ्ट लिप एंड क्लेफ्ट पैलेट्स (कटे होंठ व तालु) न देख पाना एक चूक है।
-जांच समिति यह भी महसूस करती है कि भ्रूण की जांच के समय गंभीर हृदय रोग को नहीं बताया जा सकता है, लेकिन भ्रूण में कमी मिलने की दशा में माता की थ्रीडी जांच की जाने की सलाह दी जा सकती थी। इससे हृदय की सही स्थिति का पता लगाया जा सकता था।
पहले नहीं मानी थी चूक
पहले जांच समिति ने माना था कि इस तरह की कमी अल्ट्रासाउंड जांच में नहीं पकड़ी जा सकती है। इसकी दुनियाभर में संभावना नौ से 50 फीसदी ही है। लिहाजा, इसे चूक नहीं माना जा सकता है।
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जांच रिपोर्ट विरोधाभासी है। पहले की जांच रिपोर्ट कुछ और कहती है और अब की कुछ और। ऐसे में यह और भी ज्यादा आश्चर्यजनक है कि जांच समिति ने अपनी ही जांच के विरुद्ध यह निर्णय निकाला है। यह हमारी चूक बिल्कुल नहीं है।
-डॉ. मलय जोशी, डॉ. आहूजा डिपार्टमेंट ऑफ रेडियोलॉजी