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परमात्मा से मिलन भक्ति, मनुष्य से मिलन काम
Updated Thu, 06 Sep 2018 02:08 AM IST
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ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
अनादि काल से मन को चिंतन करने की आदत है। मन श्रीकृष्ण का चिंतन करे, कान श्रवण करें, तो विषय चिंतन की आदत छूट जाएगी। इंद्रिय रूपी गोपियों का प्रभु के साथ परिणय गृहस्थ भक्ति में बाधक नहीं साधक है। मनुष्य के जीवन का लक्ष्य भोग नहीं, बल्कि भगवान की प्राप्ति होना चाहिए। उक्त विचार ज्योतिष पीठ व्यास आचार्य शिवप्रसाद ममगाईं ने गांधीग्राम लक्ष्मण चौक में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि भगवान का साक्षात्कार करने के लिए गोकुल में जो ऋषि गोप बनकर आए वह ऋषि रूपी गोपियां हैं। अनुभव के द्वारा परोक्ष ज्ञान भले ही प्राप्त जाए परंतु आत्म साक्षात्कार नहीं होता। इसमें देव भी हारे हैं। ईश्वर वाणी का विषय नहीं है। अत: वाणी से थके देव गोपी बनकर आए। उन्होंने कहा कि मनुष्य से मिलन की इच्छा काम और परमात्मा से मिलन की इच्छा भक्ति होती है। परमात्मा से मिलन की मनुष्य की इच्छा काम सुख भोगने के लिए नहीं बल्कि काम सुख से छूटने के लिए होती है। जो मनुष्य प्रभु का स्मरण नहीं करता, उसकी आंखों में काम का प्रवेश होता है। मन परमात्मा का चिंतन ना करे तो संसार के चिंतन में पड़ता है। उन्होंने आगे कहा कि जिस मनुष्य का परमात्मा के साथ संबंध हो गया, वह वंदनीय हैं।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री के सलाहकार रमेश भट्ट और मीडिया सलाहकार दर्शन सिंह रावत, पूर्व शिक्षा मंत्री प्रसाद नैथानी, पूर्व कुलपति डॉ. सुधारानी पांडे, पूर्व राजदूत चंद्र बल्लभ थपलियाल, श्याम सारस्वत, कृष्ण कुमार जोशी, गोपाल दासोनी, शशि भूषण डोभाल, पंडित दामोदर, प्राचार्य महेश जोशी आदि उपस्थित रहे।
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अनादि काल से मन को चिंतन करने की आदत है। मन श्रीकृष्ण का चिंतन करे, कान श्रवण करें, तो विषय चिंतन की आदत छूट जाएगी। इंद्रिय रूपी गोपियों का प्रभु के साथ परिणय गृहस्थ भक्ति में बाधक नहीं साधक है। मनुष्य के जीवन का लक्ष्य भोग नहीं, बल्कि भगवान की प्राप्ति होना चाहिए। उक्त विचार ज्योतिष पीठ व्यास आचार्य शिवप्रसाद ममगाईं ने गांधीग्राम लक्ष्मण चौक में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि भगवान का साक्षात्कार करने के लिए गोकुल में जो ऋषि गोप बनकर आए वह ऋषि रूपी गोपियां हैं। अनुभव के द्वारा परोक्ष ज्ञान भले ही प्राप्त जाए परंतु आत्म साक्षात्कार नहीं होता। इसमें देव भी हारे हैं। ईश्वर वाणी का विषय नहीं है। अत: वाणी से थके देव गोपी बनकर आए। उन्होंने कहा कि मनुष्य से मिलन की इच्छा काम और परमात्मा से मिलन की इच्छा भक्ति होती है। परमात्मा से मिलन की मनुष्य की इच्छा काम सुख भोगने के लिए नहीं बल्कि काम सुख से छूटने के लिए होती है। जो मनुष्य प्रभु का स्मरण नहीं करता, उसकी आंखों में काम का प्रवेश होता है। मन परमात्मा का चिंतन ना करे तो संसार के चिंतन में पड़ता है। उन्होंने आगे कहा कि जिस मनुष्य का परमात्मा के साथ संबंध हो गया, वह वंदनीय हैं।
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इस अवसर पर मुख्यमंत्री के सलाहकार रमेश भट्ट और मीडिया सलाहकार दर्शन सिंह रावत, पूर्व शिक्षा मंत्री प्रसाद नैथानी, पूर्व कुलपति डॉ. सुधारानी पांडे, पूर्व राजदूत चंद्र बल्लभ थपलियाल, श्याम सारस्वत, कृष्ण कुमार जोशी, गोपाल दासोनी, शशि भूषण डोभाल, पंडित दामोदर, प्राचार्य महेश जोशी आदि उपस्थित रहे।
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