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उत्तराखंड में मिली 18वीं सदी की दुर्लभ पांडुलिपि, आत्मा से है इसका संबंध, सच जानकर हैरान रह जाएंगे

Sun, 19 Aug 2018 09:25 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Updated Sun, 19 Aug 2018 09:25 AM IST
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18th century rare manuscript found in uttarakhand
pandulipi - फोटो : amar ujala

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जनपद के एक परिवार के पास 18वीं सदी की एक दुर्लभ शत्रु हंता लहरी पांडुलिपि मिली है।

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पांडुलिपि की रचना सतेरा गढी के मालगुजार स्वर्गीय धनसिंह बर्त्वाल की हिफाजत के लिए उनके पुरोहित पंडित बैजराम वशिष्ठ ने रची थी।

रुद्रप्रयाग में भ्रमण के दौरान उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसेक) के निदेशक डॉ. एमपीएस बिष्ट को मिली इस दुर्लभ पांडुलिपि के संरक्षण के प्रयास शुरू हो गए हैं। बकौल बिष्ट, शत्रुहंता लहरी से सिद्ध होता है कि देवी-देवताओं की भूमि उत्तराखंड में छोटी-छोटी रियासतों और गढ़ों के राजाओं, सूबेदारों की रक्षा के लिए उनके पुरोहित मंत्रों की रचना करते थे। 

इस पांडुलिपि के मंत्रों से होते थे रहस्यमयी काम

18th century rare manuscript found in uttarakhand
आत्मा

धारणा है कि इन मंत्रों का जाप यजमानों को स्वयं करना होता था और ये न सिर्फ उन्हें शत्रुओं की साजिशों और दुर्भावनाओं का शिकार होने से बचाते थे, बल्कि उन्हें परिवार के किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा की नकारात्मक ऊर्जा से भी रक्षा करते थे।

रुद्रप्रयाग बाजार से करीब 10 किमी फासले पर स्थित सतेराखाल 18वीं सदी के उत्तर्राद्ध में सतेरा गढी थी। स्वर्गीय धनसिंह बर्त्वाल इस गढी के मालगुजार थे।

उनके पड़पौते महेंद्र सिंह बर्त्वाल कहते हैं कि उनके पुराने घर में मृग की खाल मे लिपटी रिंगाल की एक कंडी में बहुत से पुराने दस्तावेज रखे थे। यह कंडी सदियों पुरानी है। बचपन से ही वे दस्तावेज उन्हें आकर्षित करते थे। उनके मन में सदैव यह जिज्ञासा रही कि आखिर उसमें क्या है? जब वह ग्रेजुएट हो गए तो उन्होंने इन दस्तावेजों को खंगालना शुरू किया। उनसे मालूम हुआ कि उनकी रचना 18वीं सदी में हुई है। इनमें शत्रु हंता लहरी भी मिली। 

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यह दस्तावेज अद्वितीय और पहाड़ की एक महत्वपूर्ण धरोहर

18th century rare manuscript found in uttarakhand
इस तरह का मंत्र जाप शायद ही किसी ने अभी तक रचा हो - फोटो : amar ujala

उन्होंने बताया कि इसे हमारे राजगुरू मयकोटि गांव के पंडित बैजराम वशिष्ठ ने संवत 1942 श्रावण चार गते यानी 1885 में रचा था।  विरजोणा थाती सतेरा गांव का उस काल में एक केंद्रीय स्थान था, जहां तत्कालीन मुखिया रहते थे।

पिछले दिनों यूसेक के निदेशक जब उनके यहां आए तो उन्होंने इन दस्तावेजों का अवलोकन किया। जिसे देखकर उन्होंने इन्हें बेहद दुर्लभ बताया। अब वह इनके संरक्षण के लिए प्रयास कर रहे हैं और ऐसे ही मिलते-जुलते दस्तावेजों के संग्रह पर जोर दे रहे हैं।

यूसेक के निदेशक डॉ. एमपीएस बिष्ट के मुताबिक, पहाड़ के वर्तमान जानकार पंडितों का मानना है कि इस तरह का मंत्र जाप शायद ही किसी ने अभी तक रचा हो। इसलिये भी यह दस्तावेज अद्वितीय है और हमारे पहाड़ की एक महत्वपूर्ण धरोहर है, जिसे आज संरक्षित करने की अति आवश्यकता है। इस संबंध में उन्होंने रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी से बात की है। उनके सहयोग और धर्मस्व विभाग के माध्यम से पांडुलिपि के संरक्षण के प्रयास किए जाएंगे।

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पुरोहित मंत्र रचते थे, जपते नहीं थे

18th century rare manuscript found in uttarakhand
ध्यान

माना जाता है कि शत्रुओं का नाश करने वाला मंत्र रचियता द्वारा नहीं पढ़ा जाता था। इसीलिए इस पांडुलिपि के अंत में पाठस्थि धन सिंह बर्त्वाल लिखा है। 

कुछ और नायाब वस्तुएं भी मिली
मालगुजार के कोठे से 18वीं सदी की दो नायाब वस्तुएं भी मिली हैं। इनमें एक पिठाला है। हिरन की खाल से जड़ित ढ़क्कन युक्त रिंगाल की यह कंडी तांबे के तार से बनें कंगनों से बंधित है।

उस कालखंड में आवश्यक दस्तावेज ऐसी ही कंडी में रखे जाते थे। दूसरी नायाब वस्तु एक कहार है जो टिहरी राज परिवार के परमार वंश से जुड़ी है।

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