{"_id":"5aef67af4f1c1bed778b6fdd","slug":"161525639087-dehradun-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"अब शिशुओं की मौत का होगा ऑडिट, गाइड लाइन जारी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अब शिशुओं की मौत का होगा ऑडिट, गाइड लाइन जारी
Updated Mon, 07 May 2018 02:08 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
ब्यूरो/अमर उजाला/देहरादून।
राज्य में नवजात शिशुओं की बढ़ती मृत्यु दर से चिंतित सरकार और स्वास्थ्य विभाग ने अब चाइल्ड डेथ ऑडिट कराने का निर्णय लिया है। मैटरनल डेथ ऑडिट की तर्ज पर अब हर जिले में शिशुओं की मौत का भी ऑडिट कराया जाएगा। इसके तहत बच्चों की मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई, खामियों को कैसे दूर करने आदि की जानकारी जुटाई जाएगी।
बता दें राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लागू होने के बाद देश के अन्य राज्यों में बच्चों की मृत्यु दर में कमी आयी है। वहीं उत्तराखंड ऐसा राज्य है जहां बच्चों की मृत्यु दर बढ़ी है। स्वास्थ्य विभाग के ही आंकड़ों पर नजर डालें तो हरिद्वार में यह आंकड़ा प्रति एक हजार प्रसव पर 64 है। जबकि रुद्रप्रयाग जिले में सबसे कम 19 है। आंकड़ों के मुताबिक साल 2015-16 में जहां प्रति 1000 प्रसव में 34 बच्चों की मृत्यु हुई। वहीं साल 2016-17 में यह आंकड़ा बढ़कर 38 तक पहुंच गया। इससे सरकार, शासन और स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ गई हैं। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने स्वास्थ्य विभाग के अफसरों को निर्देशित किया है कि साल 2020 तक शिशु मृत्यु दर का आंकड़ा प्रति 1000 प्रसव पर 30 किसी भी सूरत में लाया जाए। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के राज्य परियोजना निदेशक युगल किशोर पंत ने बताया कि अब हर जिले में चाइल्ड डेथ ऑडिट कराया जाएगा। इस संबंध में सभी सीएमओ को बीते माह गाइड लाइन जारी कर दी है। सीएमओ के जरिए हर जिले में शिशुओं की होने वाली मृत्यु का ब्योरा मांगा गया है।
विज्ञापन
राज्य में नवजात शिशुओं की बढ़ती मृत्यु दर से चिंतित सरकार और स्वास्थ्य विभाग ने अब चाइल्ड डेथ ऑडिट कराने का निर्णय लिया है। मैटरनल डेथ ऑडिट की तर्ज पर अब हर जिले में शिशुओं की मौत का भी ऑडिट कराया जाएगा। इसके तहत बच्चों की मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई, खामियों को कैसे दूर करने आदि की जानकारी जुटाई जाएगी।
बता दें राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लागू होने के बाद देश के अन्य राज्यों में बच्चों की मृत्यु दर में कमी आयी है। वहीं उत्तराखंड ऐसा राज्य है जहां बच्चों की मृत्यु दर बढ़ी है। स्वास्थ्य विभाग के ही आंकड़ों पर नजर डालें तो हरिद्वार में यह आंकड़ा प्रति एक हजार प्रसव पर 64 है। जबकि रुद्रप्रयाग जिले में सबसे कम 19 है। आंकड़ों के मुताबिक साल 2015-16 में जहां प्रति 1000 प्रसव में 34 बच्चों की मृत्यु हुई। वहीं साल 2016-17 में यह आंकड़ा बढ़कर 38 तक पहुंच गया। इससे सरकार, शासन और स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ गई हैं। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने स्वास्थ्य विभाग के अफसरों को निर्देशित किया है कि साल 2020 तक शिशु मृत्यु दर का आंकड़ा प्रति 1000 प्रसव पर 30 किसी भी सूरत में लाया जाए। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के राज्य परियोजना निदेशक युगल किशोर पंत ने बताया कि अब हर जिले में चाइल्ड डेथ ऑडिट कराया जाएगा। इस संबंध में सभी सीएमओ को बीते माह गाइड लाइन जारी कर दी है। सीएमओ के जरिए हर जिले में शिशुओं की होने वाली मृत्यु का ब्योरा मांगा गया है।
विज्ञापन