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जौनसार के दो सौ से अधिक गांवों में मनाई गई बूढ़ी दिवाली
Updated Sun, 09 Dec 2018 02:07 AM IST
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बूढ़ी दिवाली देखने देशभर से जौनसार बावर पहुंचे लोग
ब्यूरो/अमर उजाला
चकराता। जौनसार बावर के दो सौ से अधिक गांवों में बूढ़ी दिवाली मनाई गई। क्षेत्र की इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए देशभर से लोग जौनसार बावर पहुंचे। खास बात यह है कि इस दिवाली में पटाखों का उपयोग नहीं किया जाता। वहीं, रोशनी के लिए मोमबत्तियां नहीं, बल्कि भीमल और चीड़ से बनी मशालों को जलाया जाता है।
छह दिसंबर से शुरु हुई जौनसारी दिवाली शनिवार को तीसरे दिन में प्रवेश कर गई। जगह-जगह परंपरागत रूप से इसे मनाया गया। खत विशायल, बाना, उपलगांव, सिलगांव, शैली, बमराड़, अठगांव, समाल्टा, पानुवा पाटा, मलेथा, दातनु, बडनु, जोशी गांव, मसराड, ललऊ, बसाया, चापनु, अलसी, सकनी, ककाडी कनबुआ, कोठा, तारली, खमरोली, हाजा, लोरली, विनोऊ, कोरूवा, ठाणा, फटेऊ, दसऊ, गबेला, डिमोऊ, डांडा, चदोऊ, सुरेऊ, भंजरा, लेल्टा, धोईरा, टिमरा, जामुवा, अस्टी, गोथान, पणायासा, सेंसा, बिसोई, सेंज, निथला, बन्तोऊ, उपरोली, कुरोली, बोहरी, खतासा, देऊ, लोखंडी, जोगियों आदि गांवों में डीजे नहीं बल्कि वाद्य यंत्रों की थाप पर लोगों ने परंपरागत रूप से दिवाली के जश्न को मनाया। घर-घर में विशेष पकवान बनाए गए। वहीं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में तांद बनाकर लोगों ने एकता का संदेश दिया।
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ब्यूरो/अमर उजाला
चकराता। जौनसार बावर के दो सौ से अधिक गांवों में बूढ़ी दिवाली मनाई गई। क्षेत्र की इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए देशभर से लोग जौनसार बावर पहुंचे। खास बात यह है कि इस दिवाली में पटाखों का उपयोग नहीं किया जाता। वहीं, रोशनी के लिए मोमबत्तियां नहीं, बल्कि भीमल और चीड़ से बनी मशालों को जलाया जाता है।
छह दिसंबर से शुरु हुई जौनसारी दिवाली शनिवार को तीसरे दिन में प्रवेश कर गई। जगह-जगह परंपरागत रूप से इसे मनाया गया। खत विशायल, बाना, उपलगांव, सिलगांव, शैली, बमराड़, अठगांव, समाल्टा, पानुवा पाटा, मलेथा, दातनु, बडनु, जोशी गांव, मसराड, ललऊ, बसाया, चापनु, अलसी, सकनी, ककाडी कनबुआ, कोठा, तारली, खमरोली, हाजा, लोरली, विनोऊ, कोरूवा, ठाणा, फटेऊ, दसऊ, गबेला, डिमोऊ, डांडा, चदोऊ, सुरेऊ, भंजरा, लेल्टा, धोईरा, टिमरा, जामुवा, अस्टी, गोथान, पणायासा, सेंसा, बिसोई, सेंज, निथला, बन्तोऊ, उपरोली, कुरोली, बोहरी, खतासा, देऊ, लोखंडी, जोगियों आदि गांवों में डीजे नहीं बल्कि वाद्य यंत्रों की थाप पर लोगों ने परंपरागत रूप से दिवाली के जश्न को मनाया। घर-घर में विशेष पकवान बनाए गए। वहीं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में तांद बनाकर लोगों ने एकता का संदेश दिया।
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