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श्रद्धालुओं के लिए खुले फ्यूंला नारायण मंदिर के कपाट
Updated Mon, 16 Jul 2018 10:52 PM IST
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जोशीमठ। उर्गम घाटी में स्थित फ्यूंला नारायण मंदिर के कपाट सोमवार को विधि-विधान के साथ श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। भक्तों ने नारायण भगवान को मक्खन, घी, दूध और सत्तू का भोग लगाया। इसके बाद मंदिर में यज्ञ कुंड में अग्नि प्रज्ज्वलित की गई। यह अग्नि आगामी डेढ़ माह तक धुनी की तरह जलती रहेगी।
मध्य हिमालय क्षेत्र में करीब 9000 फीट की ऊंचाई पर उर्गम घाटी में फ्यूंला नारायण मंदिर स्थित है। सोमवार को विधि-विधान के साथ मंदिर के कपाट अपराह्न ग्यारह बजे श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए गए। कपाट खुलने के बाद भेंटा गांव की गोदांबरी देवी ने भगवान नारायण का शृंगार किया। दो माह तक भगवान नारायण को दूध और मक्खन का भोग लगाया जाएगा। मंदिर के कपाट वर्षभर में ढाई माह ही खोले जाते हैं। आगामी 18 सितंबर को मंदिर के कपाट बंद हो जाएंगे। मंदिर समिति के अध्यक्ष रामचंद्र कंडवाल और लक्ष्मण सिंह नेगी ने बताया कि मंदिर में ग्रामीणों की ओर से भजन-कीर्तन का आयोजन भी किया जाएगा।
इंसेट
यह है मान्यता
मान्यता है कि आदिकाल में स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी उर्गम घाटी में पुष्प लेने पहुंची तो उसे यहां विष्णु भगवान विचरण करते दिखाई दिए। अप्सरा ने भगवान विष्णु को यहां फूलों से बनी माला भेंट की थी। साथ ही भगवान का विभिन्न रंग-बिरंगे फूलों से शृंगार किया था। तब से यहां महिलाओं की ओर से भगवान का शृगार किए जाने की परंपरा है।
मध्य हिमालय क्षेत्र में करीब 9000 फीट की ऊंचाई पर उर्गम घाटी में फ्यूंला नारायण मंदिर स्थित है। सोमवार को विधि-विधान के साथ मंदिर के कपाट अपराह्न ग्यारह बजे श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए गए। कपाट खुलने के बाद भेंटा गांव की गोदांबरी देवी ने भगवान नारायण का शृंगार किया। दो माह तक भगवान नारायण को दूध और मक्खन का भोग लगाया जाएगा। मंदिर के कपाट वर्षभर में ढाई माह ही खोले जाते हैं। आगामी 18 सितंबर को मंदिर के कपाट बंद हो जाएंगे। मंदिर समिति के अध्यक्ष रामचंद्र कंडवाल और लक्ष्मण सिंह नेगी ने बताया कि मंदिर में ग्रामीणों की ओर से भजन-कीर्तन का आयोजन भी किया जाएगा।
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यह है मान्यता
मान्यता है कि आदिकाल में स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी उर्गम घाटी में पुष्प लेने पहुंची तो उसे यहां विष्णु भगवान विचरण करते दिखाई दिए। अप्सरा ने भगवान विष्णु को यहां फूलों से बनी माला भेंट की थी। साथ ही भगवान का विभिन्न रंग-बिरंगे फूलों से शृंगार किया था। तब से यहां महिलाओं की ओर से भगवान का शृगार किए जाने की परंपरा है।
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