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इंडम व अभिरंग टमाटर काश्तकारों को बनाएंगे मालामाल
Updated Sat, 06 Jan 2018 01:17 AM IST
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ब्यूरो/अमर उजाल/विकासनगर।
पहाड़ी अंचलों में टमाटर के कम होते उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र ढकरानी के वैज्ञानिकों ने काश्तकारों को इंडम-13407 और अभिरंग प्रजाति के टमाटर के उत्पादन की सलाह दी है। इन प्रजाति के उत्पादन से काश्तकार कम लागत में अधिक उपार्जन कर सकते हैं।
केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक और प्रभारी डॉ. एसएस सिंह ने बताया कि देहरादून जिले के लाखामंडल, त्यूनी और साहिया क्षेत्र के 20 गांवों के निरीक्षण के दौरान यह बात सामने आई है कि क्षेत्र में बीते 10 साल से टमाटर की एक ही प्रजाति की खेती हो रही है। इसके चलते टमाटर के उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गई है साथ ही फसल पर बीमारियों का प्रकोप भी बढ़ा है। इसके चलते काश्तकारों को फसलों की सही लागत नहीं मिल पा रही है। बरसात के दौरान यह फसल पछेती झुलसा रोग की चपेट में आ जाती है। इसके चलते फल जल्द ही सड़ जाता है। ऐसे में इस साल काश्तकारों को इंडम-13407 और अभिरंग प्रजाति के टमाटर के उत्पादन की सलाह दी जा रही है। इसके लिए इन दिनों क्षेत्र में टमाटर की नर्सरी को तैयार करने का काम शुरू हो गया है। इंडम-13407 और अभिरंग प्रजाति के पौधे लगभग 6 से 7 फिट तक होते हैं। इसके फल अत्यधिक ठोस, आकर्षक लाल रंग और गोल होते हैं। इस प्रजाति के फल गुच्छों में आते हैं। एक फल का औसत वजन 70 से 80 ग्राम का होता है। रोपाई से फसल की कुल अवधि लगभग पांच माह तक की होती हैं। टमाटर की यह दोनों प्रजातियों के फल दूरस्थ मंडियों में बिक्री के लिए उपयुक्त पाए गए हैं क्योंकि इन प्रजातियों के फल ठोस आकार के होते हैं।
एक बीघा के लिए 20 ग्राम बीज पर्याप्त
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एसएस सिंह ने बताया कि दोनों प्रजातियों के बीज की करीब 20 ग्राम मात्रा 1 बीघा के लिए पर्याप्त है। इन प्रजातियों के पौध की रोपाई के लिए लाइन से लाइन की दूरी 90 सेमी और पौध से पौध की दूरी 50-60 सेमी होनी चाहिए। यदि किसान इन दोनों प्रजातियों में से किसी एक भी उत्पादन करते हैं तो एक बीघा में लगभग 40-50 कुंतल तक फसल प्राप्त की जा सकती है। दोनों ही प्रजातियों पर पछेती झुलसा का प्रकोप बेहद कम होता है। उन्होंने बेहतर उत्पादन के लिए संतुलित खाद एवं उर्वरकों के प्रयोग के साथ ही पछेती झुलसा के लिए संस्तुत फफूंदनाशकों के उपयोग की सलाह दी है।
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पहाड़ी अंचलों में टमाटर के कम होते उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र ढकरानी के वैज्ञानिकों ने काश्तकारों को इंडम-13407 और अभिरंग प्रजाति के टमाटर के उत्पादन की सलाह दी है। इन प्रजाति के उत्पादन से काश्तकार कम लागत में अधिक उपार्जन कर सकते हैं।
केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक और प्रभारी डॉ. एसएस सिंह ने बताया कि देहरादून जिले के लाखामंडल, त्यूनी और साहिया क्षेत्र के 20 गांवों के निरीक्षण के दौरान यह बात सामने आई है कि क्षेत्र में बीते 10 साल से टमाटर की एक ही प्रजाति की खेती हो रही है। इसके चलते टमाटर के उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गई है साथ ही फसल पर बीमारियों का प्रकोप भी बढ़ा है। इसके चलते काश्तकारों को फसलों की सही लागत नहीं मिल पा रही है। बरसात के दौरान यह फसल पछेती झुलसा रोग की चपेट में आ जाती है। इसके चलते फल जल्द ही सड़ जाता है। ऐसे में इस साल काश्तकारों को इंडम-13407 और अभिरंग प्रजाति के टमाटर के उत्पादन की सलाह दी जा रही है। इसके लिए इन दिनों क्षेत्र में टमाटर की नर्सरी को तैयार करने का काम शुरू हो गया है। इंडम-13407 और अभिरंग प्रजाति के पौधे लगभग 6 से 7 फिट तक होते हैं। इसके फल अत्यधिक ठोस, आकर्षक लाल रंग और गोल होते हैं। इस प्रजाति के फल गुच्छों में आते हैं। एक फल का औसत वजन 70 से 80 ग्राम का होता है। रोपाई से फसल की कुल अवधि लगभग पांच माह तक की होती हैं। टमाटर की यह दोनों प्रजातियों के फल दूरस्थ मंडियों में बिक्री के लिए उपयुक्त पाए गए हैं क्योंकि इन प्रजातियों के फल ठोस आकार के होते हैं।
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एक बीघा के लिए 20 ग्राम बीज पर्याप्त
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एसएस सिंह ने बताया कि दोनों प्रजातियों के बीज की करीब 20 ग्राम मात्रा 1 बीघा के लिए पर्याप्त है। इन प्रजातियों के पौध की रोपाई के लिए लाइन से लाइन की दूरी 90 सेमी और पौध से पौध की दूरी 50-60 सेमी होनी चाहिए। यदि किसान इन दोनों प्रजातियों में से किसी एक भी उत्पादन करते हैं तो एक बीघा में लगभग 40-50 कुंतल तक फसल प्राप्त की जा सकती है। दोनों ही प्रजातियों पर पछेती झुलसा का प्रकोप बेहद कम होता है। उन्होंने बेहतर उत्पादन के लिए संतुलित खाद एवं उर्वरकों के प्रयोग के साथ ही पछेती झुलसा के लिए संस्तुत फफूंदनाशकों के उपयोग की सलाह दी है।
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