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बीमा कंपनी के विकास अधिकारी को पांच साल की सजा
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ब्यूरो/अमर उजाला/देहरादून।
बीमा कमीशन के करीब पौने दो लाख रुपये हड़पने वाले एनआईसीएल (नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड) के विकास अधिकारी व एक अभिकर्ता (एजेंट) को सीबीआई की विशेष जज सुजाता सिंह की अदालत ने पांच साल की सजा सुनाई है। अदालत ने दोषियों पर कुल 2.90 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। इस मामले में एक एजेंट को सरकारी गवाह बनने के कारण रिहा कर दिया गया। एक अन्य अभियुक्त ट्रायल से पहले ही बाहर हो गया था।
सीबीआई के अधिवक्ता अभिषेक अरोड़ा ने बताया कि सीबीआई ने 12 मार्च 2009 को एनआईसीएल के विकास अधिकारी एलपी भट्ट, एजेंट दीपक भट्ट व अनिल डोभाल और एक अन्य कर्मचारी अनुज के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था। घटनाक्रम के अनुसार केंद्र सरकार ने स्वर्ण जयंती स्वरोजगार योजना के तहत बीमा का करार एआईसीएल से किया था। इसके तहत लोगों से एकमुश्त बीमा प्रीमियम के रूप में 189 रुपये लिया जाना था। यह रकम खंड विकास अधिकारी के यहां जमा होने थी। इसके लिए एलपी भट्ट ने नियम विरुद्ध दीपक भट्ट व अनिल डोभाल को एजेंट नियुक्त किया और इनके माध्यम से रकम का कलेक्शन शुरू कर दिया। कुल मिलाकर इस प्रीमियम पर सरकारी कंपनी का 1.90 लाख रुपये का कमीशन बना, लेकिन इन लोगों ने यह कमीशन कंपनी के खाते में जमा करने के बजाय अपने पास रख लिया। इस मामले में सीबीआई ने धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और आपराधिक षड़यंत्र के तहत मुकदमा दर्ज किया। सीबीआई ने चार्जशीट तैयार की तो उसमें अनुज का नाम नहीं था। जांच के दौरान उसके खिलाफ कोई साक्ष्य सीबीआई के हाथ नहीं लगे। इसके बाद एलपी भट्ट, दीपक भट्ट व अनिल डोभाल के खिलाफ मुकदमा चला। मुकदमे में अनिल डोभाल ने सरकारी गवाह बनना स्वीकार किया और बाकी के खिलाफ साक्ष्यों को मजबूत किया। सीबीआई ने इस मुकदमे में कुल 13 गवाह प्रस्तुत किए। सुनवाई का बाद अदालत ने एलपी भट्ट को पांच साल कठोर कारावास और 2.70 लाख रुपये जुर्माना की सजा सुनाई है। वहीं दीपक भट्ट को चार साल की कैद व 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा हुई है।
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बीमा कमीशन के करीब पौने दो लाख रुपये हड़पने वाले एनआईसीएल (नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड) के विकास अधिकारी व एक अभिकर्ता (एजेंट) को सीबीआई की विशेष जज सुजाता सिंह की अदालत ने पांच साल की सजा सुनाई है। अदालत ने दोषियों पर कुल 2.90 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। इस मामले में एक एजेंट को सरकारी गवाह बनने के कारण रिहा कर दिया गया। एक अन्य अभियुक्त ट्रायल से पहले ही बाहर हो गया था।
सीबीआई के अधिवक्ता अभिषेक अरोड़ा ने बताया कि सीबीआई ने 12 मार्च 2009 को एनआईसीएल के विकास अधिकारी एलपी भट्ट, एजेंट दीपक भट्ट व अनिल डोभाल और एक अन्य कर्मचारी अनुज के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था। घटनाक्रम के अनुसार केंद्र सरकार ने स्वर्ण जयंती स्वरोजगार योजना के तहत बीमा का करार एआईसीएल से किया था। इसके तहत लोगों से एकमुश्त बीमा प्रीमियम के रूप में 189 रुपये लिया जाना था। यह रकम खंड विकास अधिकारी के यहां जमा होने थी। इसके लिए एलपी भट्ट ने नियम विरुद्ध दीपक भट्ट व अनिल डोभाल को एजेंट नियुक्त किया और इनके माध्यम से रकम का कलेक्शन शुरू कर दिया। कुल मिलाकर इस प्रीमियम पर सरकारी कंपनी का 1.90 लाख रुपये का कमीशन बना, लेकिन इन लोगों ने यह कमीशन कंपनी के खाते में जमा करने के बजाय अपने पास रख लिया। इस मामले में सीबीआई ने धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और आपराधिक षड़यंत्र के तहत मुकदमा दर्ज किया। सीबीआई ने चार्जशीट तैयार की तो उसमें अनुज का नाम नहीं था। जांच के दौरान उसके खिलाफ कोई साक्ष्य सीबीआई के हाथ नहीं लगे। इसके बाद एलपी भट्ट, दीपक भट्ट व अनिल डोभाल के खिलाफ मुकदमा चला। मुकदमे में अनिल डोभाल ने सरकारी गवाह बनना स्वीकार किया और बाकी के खिलाफ साक्ष्यों को मजबूत किया। सीबीआई ने इस मुकदमे में कुल 13 गवाह प्रस्तुत किए। सुनवाई का बाद अदालत ने एलपी भट्ट को पांच साल कठोर कारावास और 2.70 लाख रुपये जुर्माना की सजा सुनाई है। वहीं दीपक भट्ट को चार साल की कैद व 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा हुई है।
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