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मर्दों के साथ भी होता है रेप, कानून की किताब में इसकी कोई सजा नहीं, ऐसा क्यों?
क्राइम डेस्क, अमर उजाला
Updated Wed, 24 Jan 2018 03:50 PM IST
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पिछले कुछ सालों से भारत महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन अपराध के मामलों में कार्रवाई करने में सुस्त रहा है, लेकिन अब इन मामलों को अधिक संवेदनशीलता के साथ देखा जाता है। हालांकि पुरुषों के साथ रेप को लेकर जो खामोशी है वो ज्यादा गहरी है।
भारत में रेप को लेकर जो बहस है उसमें ऐसी धारणा है कि पुरुषों के साथ रेप नहीं किया जा सकता। लेकिन सच तो यह है कि पुरुषों के साथ भी रेप होता है। पुरुषों के साथ हुए रेप को महिला रेप से अलग क्यों देखा जाना चाहिए? पुरुषों के साथ हुए रेप से जुड़ी खबरें पढ़ने को नहीं मिलती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि अपवाद स्वरूप ही पुरुषों के साथ हुए रेप की रिपोर्टिंग होती है।
रेप में भेदभाव
पुरुषों के साथ हुए रेप के वाकये इसलिए सामने नहीं आते हैं, क्योंकि इसमें मर्दानगी की प्रवृत्ति शामिल है। मर्दानगी के दबाव के कारण ही पुरुष अपने साथ हुए यौन दुराचार को खुलकर बताने और कानूनी मदद की गुहार लगाने में शर्म महसूस करते हैं। 2013 में मध्य प्रदेश में एक नेता के कर्मचारी ने रेप का आरोप लगाया तो भारतीय मीडिया में इसे 'गुदा मैथुन' के तौर पर पेश किया गया। दूसरे शब्दों में एक वयस्क पुरुष से रेप को यौनिकता के संदर्भ में देखा जाता है न कि अपने शरीर पर यौन हमले के रूप में।
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पिछले साल एक सर्वे में पाया गया कि बाल यौन शोषण में आधे से ज्यादा पीड़ित लड़के थे। अगर नाबालिग पुरुषों के साथ रेप हो सकता है तो फिर उस सोच का क्या मतलब है कि ताकतवर (संपत्ति और सत्ता के मामले में) पुरुष वयस्क पुरुषों के साथ रेप नहीं कर सकते हैं? मिसाल के तौर पर 2015 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पाया कि भारतीय जेलों में खुदकुशी की बड़ी वजह साथी कैदियों द्वारा किया गया रेप है।
अमरिकी एलजीबीटी (लेज्बियन, गे, बाइसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर) एक्टिविस्ट जॉन स्टॉक्स ने यौन स्वास्थ्य काउंसलर के तौर पर दिल्ली में छोटे समय के लिए काम किया है। उनके पास ऐसे दर्जनों मामले आए जिनमें रेप पीड़ित पुरुष और ट्रांसजेंडर थे, लेकिन उन्हें कोई कानूनी मदद नहीं मिलती है।
पुरुषों के साथ होने वाले रेप को एक यौन संबंध के रूप में देखा जाता है जिसमें जबरन जैसी बात पर ध्यान नहीं दिया जाता है। कानूनी रूप से पुरुषों से होने वाले रेप के साथ भेदभाव किया जाता है। अब वक़्त आ गया है कि पुरुषों के साथ रेप को भी मर्दानगी के दायरे से बाहर निकाला जाए।
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भारत में रेप को लेकर जो बहस है उसमें ऐसी धारणा है कि पुरुषों के साथ रेप नहीं किया जा सकता। लेकिन सच तो यह है कि पुरुषों के साथ भी रेप होता है। पुरुषों के साथ हुए रेप को महिला रेप से अलग क्यों देखा जाना चाहिए? पुरुषों के साथ हुए रेप से जुड़ी खबरें पढ़ने को नहीं मिलती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि अपवाद स्वरूप ही पुरुषों के साथ हुए रेप की रिपोर्टिंग होती है।
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रेप में भेदभाव
पुरुषों के साथ हुए रेप के वाकये इसलिए सामने नहीं आते हैं, क्योंकि इसमें मर्दानगी की प्रवृत्ति शामिल है। मर्दानगी के दबाव के कारण ही पुरुष अपने साथ हुए यौन दुराचार को खुलकर बताने और कानूनी मदद की गुहार लगाने में शर्म महसूस करते हैं। 2013 में मध्य प्रदेश में एक नेता के कर्मचारी ने रेप का आरोप लगाया तो भारतीय मीडिया में इसे 'गुदा मैथुन' के तौर पर पेश किया गया। दूसरे शब्दों में एक वयस्क पुरुष से रेप को यौनिकता के संदर्भ में देखा जाता है न कि अपने शरीर पर यौन हमले के रूप में।
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पिछले साल एक सर्वे में पाया गया कि बाल यौन शोषण में आधे से ज्यादा पीड़ित लड़के थे। अगर नाबालिग पुरुषों के साथ रेप हो सकता है तो फिर उस सोच का क्या मतलब है कि ताकतवर (संपत्ति और सत्ता के मामले में) पुरुष वयस्क पुरुषों के साथ रेप नहीं कर सकते हैं? मिसाल के तौर पर 2015 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पाया कि भारतीय जेलों में खुदकुशी की बड़ी वजह साथी कैदियों द्वारा किया गया रेप है।
अमरिकी एलजीबीटी (लेज्बियन, गे, बाइसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर) एक्टिविस्ट जॉन स्टॉक्स ने यौन स्वास्थ्य काउंसलर के तौर पर दिल्ली में छोटे समय के लिए काम किया है। उनके पास ऐसे दर्जनों मामले आए जिनमें रेप पीड़ित पुरुष और ट्रांसजेंडर थे, लेकिन उन्हें कोई कानूनी मदद नहीं मिलती है।
पुरुषों के साथ होने वाले रेप को एक यौन संबंध के रूप में देखा जाता है जिसमें जबरन जैसी बात पर ध्यान नहीं दिया जाता है। कानूनी रूप से पुरुषों से होने वाले रेप के साथ भेदभाव किया जाता है। अब वक़्त आ गया है कि पुरुषों के साथ रेप को भी मर्दानगी के दायरे से बाहर निकाला जाए।
पुरुषों के साथ रेप और धारा 377
सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही दो जनहित याचिकाएं लंबित हैं। पहला यह कि समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर किया जाए और दूसरा यह कि सभी यौन अपराधों को लैंगिक-तटस्थता के आधार पर देखा जाए। मतलब यौन अपराध को लिंग के आधार पर तय नहीं किया जाए। यह देखना बहुत जरूरी है कि दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।
अभी भारत में अगर एक पुरुष का रेप पुरुष करता है तो उसे भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 के तहत सजा मिलती है। धारा 377 के तहत 'अप्राकृतिक सेक्स' मतलब सहमति से भी एनल सेक्स (गुदा मैथुन) किया गया हो तो उसे अपराध माना जाता है।
इसमें जब तक कोई शिकायत नहीं करता है तब तक सहमति से हुए एनल सेक्स पर मामले तय नहीं किए जा सकते। धारा 377 का कानूनी इस्तेमाल बहुत सीमित है और इसका उपयोग कभी-कभार पुरुषों के साथ हुए रेप में किया जाता है।
हालांकि इसके अंतर्गत अप्राकृतिक सेक्स में महिला और पुरुष के बीच सहमति से होने वाला ओरल सेक्स भी शामिल है। हकीकत यह है कि धारा 377 का इस्तेमाल समलैंगिकों और खास कर गे जोड़ों को प्रताड़ित करने में किया जाता है। इसके अलावा इस कानून के कारण समलैंगिक जोड़े अपनी यौन चाहतों को छुपाकर रखते हैं और उसका इजहार सार्वजनिक तौर पर नहीं करते हैं।
याचिकाकर्ता धारा 377 के खिलाफ हैं। इन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि धारा 377 सहमति से बनाए जाने वाले गे संबंधों में मान्य नहीं हो। अगर सुप्रीम कोर्ट ऐसा करता है तो धारा 377 की भूमिका केवल पुरुषों के साथ होने वाले रेप में रह जाएगी।
पर इस मामले में भी यह आदर्श स्थिति नहीं है। सरकार और न्यायपालिका को चाहिए कि वो सर्वसम्मति से धारा 377 को पूरी तरह से खत्म कर दे। इसकी भूमिका किसी भी तरह के सेक्स में नहीं होनी चाहिए। इसके बदले रेप के खिलाफ जो अभी कानून है उसे हर तरह के रेप में लागू कर देना चाहिए।
अभी भारत में अगर एक पुरुष का रेप पुरुष करता है तो उसे भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 के तहत सजा मिलती है। धारा 377 के तहत 'अप्राकृतिक सेक्स' मतलब सहमति से भी एनल सेक्स (गुदा मैथुन) किया गया हो तो उसे अपराध माना जाता है।
इसमें जब तक कोई शिकायत नहीं करता है तब तक सहमति से हुए एनल सेक्स पर मामले तय नहीं किए जा सकते। धारा 377 का कानूनी इस्तेमाल बहुत सीमित है और इसका उपयोग कभी-कभार पुरुषों के साथ हुए रेप में किया जाता है।
हालांकि इसके अंतर्गत अप्राकृतिक सेक्स में महिला और पुरुष के बीच सहमति से होने वाला ओरल सेक्स भी शामिल है। हकीकत यह है कि धारा 377 का इस्तेमाल समलैंगिकों और खास कर गे जोड़ों को प्रताड़ित करने में किया जाता है। इसके अलावा इस कानून के कारण समलैंगिक जोड़े अपनी यौन चाहतों को छुपाकर रखते हैं और उसका इजहार सार्वजनिक तौर पर नहीं करते हैं।
याचिकाकर्ता धारा 377 के खिलाफ हैं। इन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि धारा 377 सहमति से बनाए जाने वाले गे संबंधों में मान्य नहीं हो। अगर सुप्रीम कोर्ट ऐसा करता है तो धारा 377 की भूमिका केवल पुरुषों के साथ होने वाले रेप में रह जाएगी।
पर इस मामले में भी यह आदर्श स्थिति नहीं है। सरकार और न्यायपालिका को चाहिए कि वो सर्वसम्मति से धारा 377 को पूरी तरह से खत्म कर दे। इसकी भूमिका किसी भी तरह के सेक्स में नहीं होनी चाहिए। इसके बदले रेप के खिलाफ जो अभी कानून है उसे हर तरह के रेप में लागू कर देना चाहिए।
खामोशी की साजिश
एक रेप पीड़ित पुरुष स्ट्रेट (विषमलिंगी) या गे दोनों हो सकता है। इस तरह का कोई रेप सामने आता है तो इसमें समलैंगिक होने की बात थोपने की आशंका बनी रहेगी। समलैंगिकता को लेकर जो पूर्वाग्रह है उसे कानून से ही खत्म किया जा सकता है। इसलिए पुरुषों के साथ रेप का निपटारा समलैंगिकता विरोधी कानून से नहीं किया जा सकता।
किसी गे के साथ कोई पुरुष रेप करता है तो पुलिस में इसकी रिपोर्ट दर्ज कराना असंभव है। जाहिर है इसके लिए वर्तमान कानून जिम्मेदार है। 2016 में जब एक गे से रेप हुआ तो उसे पुलिस में जाने से पहले यह डर सता रहा था कि अगर उसने रिपोर्ट दर्ज कराने की हिमाकत की तो वो खुद ही गिरफ़्तार कर लिया जाएगा। भारत में 2012 में बाल यौन उत्पीड़न के खिलाफ एक कानून बना और इसे अपराध के दायरे में लाया गया। इसकी वजह यह थी कि पहले का जो बाल यौन उत्पीड़न कानून था उसमें रेप या यौन उत्पीड़न से पीड़ितों में केवल बच्चियां थीं और इसमें बच्चे शामिल नहीं थे।
इस कानून के दायरे से वयस्क पुरुष बाहर हैं। ये अपनी पीड़ा का शायद ही इजहार करते हैं। समलैंगिक अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले भी इसकी आवाज नहीं उठाते हैं। इन्हें शायद लगता है कि बलात्कारी और बाल दुराचारी के रूप में समलैंगिकों के आने से उनके आंदोलन को धक्का लगेगा। कथित पुरुष अधिकार समूह भी पुरुषों के साथ होने वाले रेप के खिलाफ नहीं बोल रहे हैं। पुरुषों के अधिकारों की बात मुख्य रूप से दहेज और घरेलू हिंसा के ईर्द-गिर्द ही की जा रही है।
किसी गे के साथ कोई पुरुष रेप करता है तो पुलिस में इसकी रिपोर्ट दर्ज कराना असंभव है। जाहिर है इसके लिए वर्तमान कानून जिम्मेदार है। 2016 में जब एक गे से रेप हुआ तो उसे पुलिस में जाने से पहले यह डर सता रहा था कि अगर उसने रिपोर्ट दर्ज कराने की हिमाकत की तो वो खुद ही गिरफ़्तार कर लिया जाएगा। भारत में 2012 में बाल यौन उत्पीड़न के खिलाफ एक कानून बना और इसे अपराध के दायरे में लाया गया। इसकी वजह यह थी कि पहले का जो बाल यौन उत्पीड़न कानून था उसमें रेप या यौन उत्पीड़न से पीड़ितों में केवल बच्चियां थीं और इसमें बच्चे शामिल नहीं थे।
इस कानून के दायरे से वयस्क पुरुष बाहर हैं। ये अपनी पीड़ा का शायद ही इजहार करते हैं। समलैंगिक अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले भी इसकी आवाज नहीं उठाते हैं। इन्हें शायद लगता है कि बलात्कारी और बाल दुराचारी के रूप में समलैंगिकों के आने से उनके आंदोलन को धक्का लगेगा। कथित पुरुष अधिकार समूह भी पुरुषों के साथ होने वाले रेप के खिलाफ नहीं बोल रहे हैं। पुरुषों के अधिकारों की बात मुख्य रूप से दहेज और घरेलू हिंसा के ईर्द-गिर्द ही की जा रही है।
महिलावादियों का भी रुख साफ नहीं है
नारीवादी समूह भी इसे लेकर आवाज नहीं उठा रहे हैं, क्योंकि इन्हें लगता है कि लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करने वाला कानून बन जाता है तो इसका दुरुपयोग महिलाओं के खिलाफ किया जा सकता है। भारत में महिला अधिकार समूहों के लिए वह शर्मनाक वक़्त था जब महिलावादी कार्यकर्ताओं ने 2012 में भारत सरकार को रेप कानून को लैंगिक भेदभाव से मुक्त बनाने से रोका था।
मुंबई स्थित जानी-मानी महिलावादी एक्टिविस्ट फ्लाविया एग्नेस ने कहा था, ''एक महिला से रेप का असर काफी दूरगामी होता है। उसे सामाजिक कलंक और पक्षपाती मानसिकता से जूझना पड़ता है। शादी तय करने के दौरान किसी पुरुष से कोई नहीं पूछता है कि क्या वो वर्जिन है?''
ऐसे तर्कों से उन बातों को तवज्जो दी जाती है कि रेप मुख्य रूप से शर्म और कलंक की समस्या है। शर्म और कलंक जैसी अनुभूति के कारण ही भारतीय जेलों में कैदी आत्महत्या कर रहे हैं। यहां तक कि उन्होंने बाल यौन उत्पीड़न कानून को भी जेंडर-न्यूट्रल बनाने का विरोध किया था।
जानी-मानी महिलावादी वकील वृंदा ग्रोवर ने कहा था, ''मैं नहीं मानती कि पुरुषों को महिलाओं की तरह गंभीर यौन हिंसा का सामना करना पड़ रहा है।'' रेप कानून को एक खास लिंग तक सीमित रखने के बजाय उसमें पुरुषों को भी शामिल किए जाना उन्हें महिलाओं के खिलाफ हिंसा जैसे गंभीर मुद्दे का मजाक बनाना लगता है।
इनके विरोध की मुख्य वजह महिलाओं के खिलाफ कानून का दुरुपयोग है। अगर दुरुपयोग का तर्क इतना बड़ा है तो भारत में कोई कानून ही नहीं बनेगा। अगर पुलिस गे को प्रताड़ित करने के लिए धारा 377 का दुरुपयोग बंद कर दे तो क्या इनका इस कानून का विरोध खत्म हो जाएगा?
मुंबई स्थित जानी-मानी महिलावादी एक्टिविस्ट फ्लाविया एग्नेस ने कहा था, ''एक महिला से रेप का असर काफी दूरगामी होता है। उसे सामाजिक कलंक और पक्षपाती मानसिकता से जूझना पड़ता है। शादी तय करने के दौरान किसी पुरुष से कोई नहीं पूछता है कि क्या वो वर्जिन है?''
ऐसे तर्कों से उन बातों को तवज्जो दी जाती है कि रेप मुख्य रूप से शर्म और कलंक की समस्या है। शर्म और कलंक जैसी अनुभूति के कारण ही भारतीय जेलों में कैदी आत्महत्या कर रहे हैं। यहां तक कि उन्होंने बाल यौन उत्पीड़न कानून को भी जेंडर-न्यूट्रल बनाने का विरोध किया था।
जानी-मानी महिलावादी वकील वृंदा ग्रोवर ने कहा था, ''मैं नहीं मानती कि पुरुषों को महिलाओं की तरह गंभीर यौन हिंसा का सामना करना पड़ रहा है।'' रेप कानून को एक खास लिंग तक सीमित रखने के बजाय उसमें पुरुषों को भी शामिल किए जाना उन्हें महिलाओं के खिलाफ हिंसा जैसे गंभीर मुद्दे का मजाक बनाना लगता है।
इनके विरोध की मुख्य वजह महिलाओं के खिलाफ कानून का दुरुपयोग है। अगर दुरुपयोग का तर्क इतना बड़ा है तो भारत में कोई कानून ही नहीं बनेगा। अगर पुलिस गे को प्रताड़ित करने के लिए धारा 377 का दुरुपयोग बंद कर दे तो क्या इनका इस कानून का विरोध खत्म हो जाएगा?
हमें इस पर तर्क-वितर्क की जरूरत है
धारा 377 को जरूर खत्म करना चाहिए, क्योंकि सहमति से पुरुषों के बीच एनल सेक्स को अपराध नहीं मानना चाहिए। इसके साथ ही पुरुषों के साथ रेप को भी महिला रेप के अपराध की तरह ही देखा जाना चाहिए।
2013 में एक पुरुष रेप पीड़ित ने लिखा था, ''कई बार पुरुषों के साथ रेप इसलिए भी किया जाता है ताकि उसकी मर्दानगी को अपमानित किया जा सके।'' यह चाहे जैसे भी हो लेकिन सवाल लैंगिक समानता का बना रहता है। यह एक मुख्य वजह है जिससे नारीवाद पर सवाल खड़ा हो रहा है।
भारत के नारीवादी भले इसे तवज्जो नहीं दे रहे हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट और भारत सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। धारा 377 को खत्म करना चाहिए और रेप कानून को महिला और पुरुष पीड़ितों के समान बनाना चाहिए।
एक महिला समलैंगिक ने मुझसे कहा कि वो लेज़्बियन कम्युनिटी के भीतर महिलाओं पर महिलाओं के अत्याचार के खिलाफ मुंह नहीं खोल सकती है। इसकी एक वजह यह है कि कानून यौन हिंसा को इस रूप में देखता है कि पुरुष ही महिला के खिलाफ करता है। सुप्रीम को सभी तरह की यौन हिंसा को किसी लिंग के दायरे में नहीं रखना चाहिए बल्कि इसे महिला और पुरुष दोनों पीड़ितों के लिए समान बनाना चाहिए।
2013 में एक पुरुष रेप पीड़ित ने लिखा था, ''कई बार पुरुषों के साथ रेप इसलिए भी किया जाता है ताकि उसकी मर्दानगी को अपमानित किया जा सके।'' यह चाहे जैसे भी हो लेकिन सवाल लैंगिक समानता का बना रहता है। यह एक मुख्य वजह है जिससे नारीवाद पर सवाल खड़ा हो रहा है।
भारत के नारीवादी भले इसे तवज्जो नहीं दे रहे हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट और भारत सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। धारा 377 को खत्म करना चाहिए और रेप कानून को महिला और पुरुष पीड़ितों के समान बनाना चाहिए।
एक महिला समलैंगिक ने मुझसे कहा कि वो लेज़्बियन कम्युनिटी के भीतर महिलाओं पर महिलाओं के अत्याचार के खिलाफ मुंह नहीं खोल सकती है। इसकी एक वजह यह है कि कानून यौन हिंसा को इस रूप में देखता है कि पुरुष ही महिला के खिलाफ करता है। सुप्रीम को सभी तरह की यौन हिंसा को किसी लिंग के दायरे में नहीं रखना चाहिए बल्कि इसे महिला और पुरुष दोनों पीड़ितों के लिए समान बनाना चाहिए।