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थूक-पसीने से ही गेंद को चमकाने के पक्ष में नेहरा और भज्जी, वैसलीन को इसलिए बताया बेकार

Sun, 26 Apr 2020 01:07 PM IST
अंशुल तलमले स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला Published by: अंशुल तलमले Updated Sun, 26 Apr 2020 01:07 PM IST
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Saliva and sweat are best components to shine ball instead of vaseline says Bhajji and Nehra
आशीष नेहरा - फोटो : ट्विटर

ICC जहां कोविड-19 महामारी के बाद वायरस को फैलने से रोकने के लिए गेंद पर कृत्रिम पदार्थ के इस्तेमाल को वैध करने पर विचार कर रही है, वहीं भारत के कुछ क्रिकेटर्स का मानना है कि थूक और पसीना ऐसी चीजें हैं जिन्हें पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सकता। पूर्व भारतीय तेज गेंदबाज आशीष नेहरा और स्पिनर हरभजन सिंह को लगता है कि गेंद को चमकाने के लिए थूक का इस्तेमाल ‘जरूरी’ है।

Saliva and sweat are best components to shine ball instead of vaseline says Bhajji and Nehra

पूर्व सलामी बल्लेबाज आकाश चोपड़ा हालांकि इस विचार से सहमत हैं, लेकिन वह जानना चाहते हैं कि सीमा कहां तक होगी। चर्चाएं हालांकि शुरुआती चरण में हैं, लेकिन सवाल पूछे जा रहे हैं कि अगर गेंद से छेड़छाड़ को वैध किया जाता है तो कौन से कृत्रिम पदार्थों का इस्तेमाल किया जा सकता है। तो क्या यह जेब में रखा बोतल का ढक्कन होगा जिससे गेंद की एक तरह को खुरचा जा सके या फिर गेंद को चमकाने के लिए वैसलीन या फिर चेन जिपर का इस्तेमाल होगा?

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चमक की वजह से स्विंग लेती बॉल - फोटो : सोशल मीडिया

नेहरा ने कृत्रिम पदार्थों के इस्तेमाल के विचार को पूरी तरह से खारिज करते हुए कहा, ‘एक बात ध्यान रखिए, अगर आप गेंद पर थूक या पसीना नहीं लगाएंगे तो गेंद स्विंग नहीं करेगी। यह स्विंग गेंदबाजी की सबसे अहम चीज है। जैसे ही गेंद एक तरफ से खुरच जाती है तो दूसरी तरफ से पसीना और थूक लगाना पड़ता है।’ उन्होंने फिर समझाया कि कैसे वैसलीन से तेज गेंदबाजों की मदद नहीं हो सकती।

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बॉल - फोटो : ट्विटर

नेहरा ने कहा, ‘अब समझिए कि थूक की जरूरत क्यों पड़ती है? पसीना थूक से ज्यादा भारी होता है, लेकिन दोनों मिलाकर इतने भारी होते हैं कि ये रिवर्स स्विंग के लिए गेंद की एक तरफ को भारी बनाते हैं। वैसलीन इसके बाद ही इस्तेमाल की जा सकती है, इनसे पहले नहीं। क्योंकि यह हल्की होती है, यह गेंद को चमका तो सकती है लेकिन गेंद को भारी नहीं बना सकती।’

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हरभजन भी इस बात से सहमत थे कि थूक ज्यादा भारी होता है और अगर किसी ने ‘मिंट’ चबाई हो तो यह और ज्यादा भारी हो जाता है, क्योंकि इसमें शर्करा होती है। लेकिन जब कृत्रिम पदार्थ के इस्तेमाल की बात है तो वह जानना चाहते हैं कि इसके विकल्प क्या हैं। उन्होंने कहा, ‘ऐसा नहीं है कि ‘मिंट’ को मुंह में डाले बिना ही इस्तेमाल किया जाए। शर्करा के थूक में मिलने से यह गेंद को भारी बनाता है। खुरची हुई गेंद भी स्पिनरों के लिए अच्छी होती है जिससे इसे पकड़ना बेहतर होता जबकि चमकती हुई गेंद ऐसा नहीं कर सकती, लेकिन मेरा सवाल है कि अगर आप अनुमति देते हो तो इसकी सीमा क्या होगी?’

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