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चिंतनीय: अमेरिका के बगैर विश्व स्वास्थ्य संगठन; क्या विकासशील देश भुगतेंगे इसका खामियाजा?

Sat, 24 Jan 2026 06:42 AM IST
पवन पांडेय अमर उजाला
अमर उजाला Published by: पवन पांडेय Updated Sat, 24 Jan 2026 06:42 AM IST
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Worrying: World Health Organization without the US; will developing countries suffer the consequences?
चिंतनीय: अमेरिका के बगैर विश्व स्वास्थ्य संगठन - फोटो : ANI
अमेरिका का विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से बाहर निकलने का निर्णय न केवल वैश्विक स्वास्थ्य सहयोग के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के भविष्य पर गंभीर सवाल भी खड़े करता है। ऐसे दौर में, जब दुनिया महामारी, जलवायु परिवर्तन से जुड़ी स्वास्थ्य आपदाओं, एंटीबायोटिक प्रतिरोध और उभरती हुई बीमारियों जैसी बहुस्तरीय चुनौतियों का सामना कर रही है, तब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और चिकित्सा अनुसंधान में अग्रणी देश का डब्ल्यूएचओ से अलग होना अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य क्षेत्र के भविष्य के मद्देनजर निश्चित ही चिंतनीय है।

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उल्लेखनीय है कि संगठन को अपने करीब 6.8 अरब डॉलर के भारी-भरकम बजट का पांचवां हिस्सा अमेरिका से ही मिलता था। संगठन वैसे ही अपने लगभग 80 वर्षों के इतिहास में सबसे गंभीर बजट संकट का सामना कर रहा है, और अब अमेरिका के सदस्यता वापस लेने के निर्णय से अगले कुछ वर्षों में यह संकट और भी बढ़ सकता है। इस कमी को पूरा करने के लिए संगठन ने अपने अगले बजट में करीब बीस फीसदी एवं पदों में भी कटौती की है, लेकिन बजट की समस्या संगठन के कार्यों को किस तरह से प्रभावित करेगी, यह आने वाला समय ही बताएगा। 

अमेरिका ने अपने निर्णय के पीछे जिन कारणों का हवाला दिया है, उनमें संगठन की कार्यप्रणाली, कथित अक्षमताएं और कुछ देशों के प्रति इसके नरम रुख जैसे तर्क शामिल हैं। आलोचना का अधिकार हर देश को है, और डब्ल्यूएचओ भी सुधारों से परे नहीं है। पर क्या सुधार का रास्ता भीतर रहकर दबाव बनाने से नहीं निकलता? जाहिर है कि इस फैसले का सबसे बड़ा असर विकासशील और गरीब देशों पर पड़ेगा। डब्ल्यूएचओ के टीकाकरण कार्यक्रम, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पहल, मलेरिया व टीबी उन्मूलन जैसे प्रयास काफी हद तक अमेरिकी सहयोग पर निर्भर रहे हैं।

फंडिंग में कमी से इन कार्यक्रमों की गति धीमी पड़ सकती है। वैश्विक स्वास्थ्य में असमानता पहले से एक बड़ी चुनौती है; अमेरिका का यह कदम उस खाई को और चौड़ा ही करेगा। यह उस परंपरा से भी विचलन है, जिसमें वैश्विक समस्याओं का समाधान सामूहिक प्रयासों से ढूंढा जाता था। इससे अन्य देशों को भी बहुपक्षीय संस्थानों से दूरी बनाने का संदेश जा सकता है, जो अंतरराष्ट्रीय सहयोग की नींव को कमजोर करेगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि विवेक और दूरदृष्टि अंतत: राजनीति पर भारी पड़ेगी, और अमेरिका इस साझा मंच पर अपनी वापसी पर पुनर्विचार करेगा।
 
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