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जानना जरूरी है: जरासंध से युद्ध में कृष्ण ने क्यों छोड़ा रण? महाभारत काल में भीम ने किया था वध, जानिए कथा

Sun, 27 Sep 2026 08:47 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 27 Sep 2026 08:47 AM IST
सार

बलराम व जरासंध के बीच युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा था। दैवीय वाणी सुनकर बलराम ने जरासंध पर प्रहार नहीं किया और श्रीकृष्ण व बलराम रण छोड़कर पीछे हट गए। 

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Why did Krishna withdraw from battle against Jarasandha Bhima killed him during Mahabharata know story
भीम ने किया था जरासंध वध - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

जरासंध ने मथुरा पर आक्रमण कर दिया था। वसुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण और बलराम रणभूमि में पहुंचे, तो सेना में हलचल मच गई। दोनों यदुवंशी वीर अपनी भुजाओं को ही आयुध बनाकर सेना के बीच उसी प्रकार युद्ध करने लगे, जैसे दो मगर समुद्र को विक्षुब्ध करते हुए उसके भीतर घूम रहे हों। समरभूमि में प्रवेश करते ही उन्हें अपने पुराने दिव्य अस्त्र-शस्त्रों को ग्रहण करने का विचार आया और अस्त्र आकाश से उनके हाथों में आ पहुंचे, जिन्हें वे पहले के युद्ध में प्राप्त कर चुके थे। बलराम ने सांवर्तक हल और सौनंद मूसल धारण किया, जबकि श्रीकृष्ण के पास सुदर्शन चक्र, शार्ङ्ग धनुष और कौमोदकी आदि आयुध थे।

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दिव्य आयुधों से सुसज्जित दोनों भाई विष्णु के स्वरूप बनकर रणभूमि में उतर आए। बलराम ने अपना हल उठाया और शत्रुओं के लिए काल बनकर विचरने लगे। उन्होंने हाथियों को हल से खींचकर ऊपर उछाल दिया और मूसल के प्रहार से विशाल हाथियों को धराशायी कर दिया। उनके प्रहारों से भयभीत होकर अनेक क्षत्रिय योद्धा रथहीन होकर राजा जरासंध के पास भाग गए। जरासंध ने उन्हें आदेश दिया कि वे पुनः आक्रमण करें। इसके बाद सेना ने श्रीकृष्ण व बलराम के विरुद्ध एक बार फिर युद्ध आरंभ कर दिया।
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रणभूमि में दोनों भाइयों और राजाओं के बीच भयंकर युद्ध होने लगा। बाणों की बौछार, गदाओं के प्रहार और अस्त्रों की मार भी उन दोनों वीरों को विचलित न कर सकी। वे पर्वतों के समान अविचल खड़े रहे। तब श्रीकृष्ण वायु से प्रज्वलित हुई अग्नि के समान आगे बढ़े और अपने तेजस्वी सुदर्शन चक्र से मनुष्यों, हाथियों, घोड़ों और बड़े-बड़े रथों के टुकड़े-टुकड़े कर डाले। बलराम के हल और मूसल तथा श्रीकृष्ण के चक्र और गदा के सामने शत्रु सेना टिक न सकी। कुछ ही देर में रणभूमि में टूटे हुए रथ, घायल हाथी-घोड़े और मारे गए योद्धाओं के शरीर बिखर गए। रक्त की धाराएं बहने लगीं और चारों ओर प्राणियों की चीख-पुकार सुनाई दे रही थी।
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श्रीकृष्ण ने सेना के मध्य में खड़े होकर राजाओं को ललकारते हुए कहा, ‘शूरवीरो! युद्ध क्यों नहीं करते? इस प्रकार पलायन क्यों करते हो? मैं तो अपने बड़े भाई के साथ तुम्हारे सामने खड़ा हूं।’ उन्होंने आगे कहा, ‘जिस जरासंध ने अब तक तुम्हारा पालन किया है, वह अब हमारे सामने क्यों नहीं आ रहा है?’ श्रीकृष्ण की चुनौती सुनकर राजा दरद आगे आया और उसने बलराम को युद्ध के लिए ललकारा।

बलराम और दरद का युद्ध दो हाथियों के संघर्ष के समान हुआ। अंततः बलराम ने मूसल के प्रहार से दरद का वध कर दिया। दरद के मारे जाने के बाद राजा जरासंध स्वयं बलराम के सामने आ खड़ा हुआ। दोनों गदायुद्ध में निपुण थे। वे एक-दूसरे पर उसी प्रकार प्रहार कर रहे थे, जैसे दो मदमत्त हाथी अपने दांतों से परस्पर आक्रमण करते हैं। गदाओं के प्रहार से पृथ्वी कांपने लगी और दसों दिशाएं गूंज उठीं। बलराम की गदा की गूंज वज्रपात के समान थी, जबकि जरासंध के प्रहार की ध्वनि फटते हुए पर्वत जैसी। दोनों में से कोई पीछे हटने को तैयार नहीं था। देवता, गंधर्व, सिद्ध, महर्षि, यक्ष और अप्सराएं भी इस युद्ध को देखने के लिए आकाश में एकत्र हो गए। युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा था। बलराम दुखी हो गए। तभी आकाशवाणी हुई, ‘दूसरों को मान देने वाले बलराम! जरासंध का वध तुम्हारे हाथों से नहीं होगा, अतः खेद मत करो। इसकी मृत्यु का विधान मेरे द्वारा निश्चित किया जा चुका है। तुम इस युद्ध से विरत हो जाओ। थोड़े ही समय में जरासंध को प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा।’


दैवीय वाणी सुनकर बलराम ने जरासंध पर प्रहार नहीं किया और दोनों वीर भाई, कृष्ण और बलराम, रण छोड़कर पीछे हट गए।  जरासंध का अंत बलराम के हाथों नहीं, बल्कि आगे चलकर भीम के हाथों होना नियत था। यह युद्ध आगे चलकर महाभारत की महत्वपूर्ण घटनाओं का आधार बना। बाद में, श्रीकृष्ण की योजना के अनुसार भीम ने ही जरासंध का वध किया था।  

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