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विकास की दौड़ में हांफती नदियां: गंगा-यमुना को जीवित मानव का दर्जा! ऐसे कानूनी नवाचार कड़ाई से लागू करना जरूरी

Sat, 26 Sep 2026 05:09 AM IST
Deepak Kohli दीपक कोहली
Updated Sat, 26 Sep 2026 05:09 AM IST
सार

इस रविवार को विश्व नदी दिवस है, लेकिन सिर्फ दिवस मनाए जाने से क्या विकास की अंधी दौड़ को उत्तर दिया जा सकेगा?

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Rivers Gasping in Development Race Ganga Yamuna Living Entity Legal Status Innovative implementation Essential
नदियों में प्लास्टिक प्रदूषण - फोटो : फ्रीपिक

विस्तार

नदी केवल जल की बहती हुई धारा नहीं है, वह तो किसी भी सभ्यता की धड़कन, संस्कृति की जननी और भावी पीढ़ियों का जीवनकोष है। संसार की महानतम सभ्यताएं नदियों की गोद में ही फली-फूली हैं। मिस्र की सभ्यता नील नदी के तट पर जन्मी, मेसोपोटामिया की पहचान दजला-फरात से बनी, और भारत की समृद्ध वैदिक व सनातन संस्कृति का सिंचन सिंधु, गंगा, यमुना, सरस्वती और कावेरी जैसी पवित्र नदियों ने किया। प्रतिवर्ष सितंबर माह के चौथे रविवार को ‘विश्व नदी दिवस’ का आयोजन किया जाता है। यह दिवस हमें स्मरण कराता है कि जिन नदियों ने हमें जीवन दिया, आज वही अपने अस्तित्व की अंतिम सांसें गिन रही हैं।

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प्राचीन काल से ही भारत में नदियों को ‘माता’ का दर्जा दिया गया है। ऋग्वेद का ‘नदी सूक्त’ इस बात का ज्वलंत प्रमाण है। ऋग्वेद में सरस्वती नदी को अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वती कहकर आदर दिया गया। नदियों के प्रवाह के साथ बहकर आने वाली उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी ने खाद्यान्न उत्पादन को संभव बनाया। नदी का अविरल प्रवाह मनुष्य को निरंतर चलते रहने और हर बाधा को चीरकर आगे बढ़ने का संदेश देता रहा है। पर, आज विकास की अंधी दौड़ ने नदियों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है। ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।
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नदियों का संकट सीधे तौर पर जैव विविधता का संकट है। हालांकि, स्थिति चिंताजनक है, पर अभी उम्मीद की किरण बुझी नहीं है। दुनियाभर में नदियों को पुनर्जीवित करने के कई सफल प्रयोग हुए हैं, जिनसे सीखा जा सकता है। 1950 के दशक में ब्रिटेन की टेम्स नदी को जैविक रूप से मृत घोषित कर दिया गया था। लेकिन, सख्त कानूनों, बेहतर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और जनभागीदारी के बल पर आज टेम्स इतनी साफ है कि उसमें मछलियोंं, डॉल्फिन और सील जैसी 125 से अधिक प्रजातियां देखी जा सकती हैं।
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इसी तरह राइन एक्शन प्रोग्राम के तहत यूरोपीय देशों ने मिलकर राइन नदी को औद्योगिक कचरे से मुक्त कराया और इसकी प्राकृतिक स्थिति बहाल की। भारत में भी गंगा नदी की स्वच्छता और अविरलता के लिए नमामि गंगे मिशन जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनके तहत एसटीपी निर्माण, घाटों का सौंदर्यीकरण और वनीकरण का काम किया जा रहा है। तमिलनाडु की कावेरी और कर्नाटक का कावेरी पुकार आंदोलन इसके उदाहरण हैं, जहां जलग्रहण क्षेत्र में लाखों पेड़ लगाकर मिट्टी की नमी और नदी के जलस्तर को बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। राजस्थान के अलवर जिले में भारत के जलपुरुष डॉ. राजेंद्र सिंह के नेतृत्व में तरुण भारत संघ ने पारंपरिक जोहड़ बनाकर अरवरी और रूपारेल जैसी सूखी नदियों को पुनर्जीवित कर दिखाया।


नदियों को बचाने के लिए अब केवल भाषणों और दिवस मनाने से काम नहीं चलेगा। हमें धरातल पर ठोस और कड़े कदम उठाने होंगे। न्यूजीलैंड की वांगानूई नदी और भारत में उत्तराखंड उच्च न्यायालय द्वारा गंगा-यमुना को जीवित मानव का दर्जा देने जैसे कानूनी नवाचारों को कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए, ताकि नदी को नुकसान पहुंचाने वाले को सख्त सजा मिल सके।  

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