फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Shifting Geopolitics US China moving from confrontation towards managed competition what lies behind this thaw

बदलती भू-राजनीति: अमेरिका-चीन शायद टकराव से नियंत्रित प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ रहे, इस गर्मजोशी के पीछे क्या?

Sat, 26 Sep 2026 05:18 AM IST
Anand Kumar आनंद कुमार
Updated Sat, 26 Sep 2026 05:18 AM IST
सार

वाशिंगटन से निकला सबसे अहम संदेश यही है कि अमेरिका व चीन शायद टकराव से नियंत्रित प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ रहे हैं। ट्रंप व शी के बीच दिखी गर्मजोशी कुछ समय के लिए तनाव कम तो कर सकती है, पर संबंधों में स्थायित्व इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों देश कठिन सवालों का समाधान कैसे खोजते हैं।

विज्ञापन
Shifting Geopolitics US China moving from confrontation towards managed competition what lies behind this thaw
राष्ट्रपति जिनपिंग और ट्रंप (फाइल) - फोटो : पीटीआई

विस्तार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात ने कूटनीतिक गर्मजोशी और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच मौजूद विरोधाभास को एक बार फिर सामने ला दिया है। जिनपिंग के स्वागत के लिए जिस तरह की भव्य तैयारियां की गईं, उसने दुनिया का ध्यान खींचा। ट्रंप खुद उनकी अगवानी करने पहुंचे। उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि दोनों देशों के बीच संबंधों को अमेरिका गंभीरता से लेता है। पर, वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है। शिखर वार्ता से दोनों देशों के बीच चल रहे मूलभूत विवादों का कोई बड़ा समाधान सामने नहीं आया।

विज्ञापन


बैठक में शी जिनपिंग ने अमेरिका और चीन को प्रतिद्वंद्वी के बजाय साझेदार बनाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि चीन का राष्ट्रीय पुनरुत्थान और ट्रंप का ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (मागा) अभियान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यह बयान दोनों देशों के बीच टकराव को सीमित रखने की इच्छा को दर्शाता है। शिखर वार्ता में दोनों देशों ने व्यापार युद्ध में जारी विराम को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई। इससे तत्काल आर्थिक तनाव कम करने में मदद मिल सकती है, पर इसे स्थायी समझौता मानना जल्दबाजी होगी। दोनों पक्षों के बीच टैरिफ, अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए चीनी खरीद, दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति, तकनीकी प्रतिबंध, औद्योगिक सब्सिडी और चीन की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता जैसे मुद्दे बने हुए हैं।
विज्ञापन


अमेरिका चाहता है कि चीन अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद बढ़ाए और दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति अधिक भरोसेमंद बनाए। दूसरी ओर, चीन के पास महत्वपूर्ण खनिजों और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में अपनी मजबूत स्थिति के कारण आर्थिक दबाव का एक महत्वपूर्ण साधन मौजूद है। इसलिए, व्यापार समझौते को किसी नए अमेरिका-चीन आर्थिक युग की शुरुआत के रूप में देखना उचित नहीं होगा। अमेरिका की कंपनियों को स्थिर और अनुमानित कारोबारी वातावरण की जरूरत है, जबकि चीन भी बड़े वैश्विक बाजारों और अमेरिकी तकनीक तक पहुंच को महत्व देता है। ऐसे में, व्यापार युद्ध को दोबारा भड़कने से रोकना दोनों के हित में है। साथ ही, शी ने अमेरिका से ताइवान के प्रश्न पर सावधानी बरतने और ताइवान की स्वतंत्रता का विरोध करने का आग्रह किया। चीन ताइवान को अपने राष्ट्रीय हित का केंद्रीय मुद्दा मानता है, जबकि अमेरिका की ताइवान के प्रति लंबे समय से सुरक्षा प्रतिबद्धताएं रही हैं। इसी कारण, ताइवान को अमेरिकी हथियारों की प्रस्तावित करीब 14 अरब डॉलर की बिक्री भी दोनों देशों के बीच विवाद का विषय बन गई है। इस मुद्दे पर किसी निर्णायक समझौते का न होना दिखाता है कि व्यक्तिगत संबंधों और कूटनीतिक गर्मजोशी की भी अपनी सीमाएं हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


शी जिनपिंग द्वारा ‘थ्यूसीडाइड्स ट्रैप’ का उल्लेख भी ध्यान देने योग्य है। यह अवधारणा उस खतरे की ओर संकेत करती है, जिसमें किसी उभरती शक्ति और मौजूदा प्रमुख शक्ति के बीच प्रतिस्पर्धा अंततः संघर्ष का रूप ले सकती है। शी ने कहा कि इस खतरे से बचने के लिए सहयोग, नियमित सैन्य संवाद तथा संकट को नियंत्रित करने वाले तंत्र विकसित करने की जरूरत है। इससे पता चलता है कि बीजिंग अमेरिका-चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के सैन्य टकराव में बदलने के खतरे को समझता है। लेकिन, इस अवधारणा का उल्लेख यह भी बताता है कि दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा कितनी गहरी हो चुकी है। एआई अब इस प्रतिस्पर्धा का नया और जरूरी क्षेत्र बन चुका है। हालांकि, एआई को लेकर दोनों देशों का दृष्टिकोण अलग है। ट्रंप ने एआई के विकास में अत्यधिक नियमन से बचने की इच्छा दिखाई, जबकि शी ने एआई को मानव नियंत्रण में रखने और उसका उपयोग सामाजिक हितों के लिए करने पर जोर दिया। अमेरिकी प्रौद्योगिकी क्षेत्र के प्रमुख लोगों की मौजूदगी ने भी स्पष्ट किया कि तकनीकी प्रतिस्पर्धा अब भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन चुकी है।

इस पूरी बैठक में एक दिलचस्प विरोधाभास दिखाई देता है। अमेरिका और चीन एक-दूसरे के लिए जरूरी भी हैं और एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी भी। दोनों को व्यापार, वैश्विक आर्थिक स्थिरता, एआई, संकट प्रबंधन और कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर सहयोग की जरूरत है। पर, कई मुद्दों पर दोनों के बीच गहरे मतभेद भी हैं। ऐसे में, संवाद का उद्देश्य अब प्रतिस्पर्धा को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसे नियंत्रित करना दिखाई देता है। शी के स्वागत में दिखी भव्यता को कुछ आलोचकों ने ‘डिप्लोटेनमेंट’, यानी कूटनीति व प्रदर्शन का मिश्रण बताया। यह आलोचना पूरी तरह निराधार भी नहीं है। ट्रंप का व्यक्तिगत रूप से शी का स्वागत करना, सैन्य सम्मान और व्हाइट हाउस में भव्य कार्यक्रम निश्चित रूप से प्रतीकात्मक महत्व रखते हैं। कूटनीति में प्रतीकों और व्यक्तिगत संबंधों की अपनी भूमिका होती है। वे कठिन बातचीत के लिए वातावरण तैयार कर सकते हैं। पर, केवल इससे ही मतभेदों का समाधान नहीं हो सकता। असली सफलता इससे तय होगी कि दोनों देश अपने मतभेदों को नियंत्रित करने के लिए कितने प्रभावी तंत्र बना पाते हैं। दुनिया के दूसरे देशों के लिए भी इस बैठक का महत्व काफी है। यदि अमेरिका-चीन के बीच तनाव बढ़ता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता बढ़ेगी और हिंद-प्रशांत के देशों के रणनीतिक विकल्प भी अधिक जटिल होंगे। इसके विपरीत, यदि दोनों देश प्रतिस्पर्धा को नियंत्रित करने में सफल होते हैं, तो कुछ हद तक स्थिरता का वातावरण बन सकता है।

भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत के अमेरिका के साथ तेजी से मजबूत होते रणनीतिक संबंध हैं, पर चीन के साथ भी उसका एक जटिल और महत्वपूर्ण संबंध है। यदि वाशिंगटन व बीजिंग अपने संबंधों में लंबे समय के लिए संवाद और प्रतिस्पर्धा के प्रबंधन का रास्ता अपनाते हैं, तो भारत को भी अपनी रणनीतिक गणनाओं को उसी के अनुरूप ढालना होगा। हिंद-प्रशांत, प्रौद्योगिकी सहयोग, आपूर्ति शृंखलाओं और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह अमेरिका के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को मजबूत रखते हुए चीन के साथ अपने संबंधों का प्रबंधन भी प्रभावी ढंग से करे। ट्रंप-शी शिखर वार्ता का वास्तविक महत्व इस प्रयास में है कि अमेरिका और चीन अपनी प्रतिस्पर्धा को अनियंत्रित टकराव में बदलने से रोकने के लिए संवाद के रास्ते खुले रखें।


वाशिंगटन से निकला सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि अमेरिका व चीन शायद टकराव से नियंत्रित प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ रहे हैं, पर रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता से आगे नहीं निकले हैं। ट्रंप और शी के बीच दिखी गर्मजोशी कुछ समय के लिए तनाव को कम तो कर सकती है, पर स्थायी स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों देश उन कठिन सवालों का समाधान कैसे खोजते हैं, जिन्हें कोई भी समारोह और कोई भी लाल कालीन नहीं ढक सकता, यानी व्यापार, तकनीक, ताइवान, सैन्य प्रतिस्पर्धा और बदलता वैश्विक शक्ति संतुलन।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed