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परिदृश्य: विकास की राजनीति और मुफ्त की रेवड़ी, लोकलुभावन वायदों के मामले में कोई दल नहीं अपवाद
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सांकेतिक तस्वीर।
विस्तार
भारत आज विकास की आकांक्षाओं वाला देश है। अतः भारत को आज 'विकास की राजनीति' चाहिए। देश में इसी विकास की बढ़ती आकांक्षा को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘विकास की राजनीति‘ का जो व्याकरण 2005 के आसपास गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए गढ़ा था, उसे 2014 के बाद प्रधानमंत्री बनने पर उन्होंने सार्वदेशिक एवं सर्व-सामाजिक विस्तार देने की बार-बार कोशिश की है। यह जानना बेहद रोचक है कि जनता के बीच बढ़ती विकास की आकांक्षा एक तरफ राज्य एवं सत्ता की राजनीति से जुड़े राजनीतिक दलों को विकास की राजनीति की तरफ उन्मुख करती है, दूसरी तरफ विकास की राजनीति जब आगे बढ़ती है, तो वह जनता के मन में विकास की आकांक्षा को मजबूत करती है।
विकास की राजनीति का आर्थिक विकास के साथ नाभि-नाल संबंध होता है। आर्थिक विकास की तेज गति विकास की राजनीति के लिए फलक तैयार करती है। बाजार की बढ़ती विक्रय शक्ति एवं लोगों की बढ़ती क्रय शक्ति इस माहौल को रचने में बड़ी भूमिका निभाती है। पैसे के डिजिटल आदान-प्रदान ने समाज के विभिन्न वर्गों में पैसे की आवाजाही की गति को तेज किया है। इसने लोगों में विकास की आकांक्षा को प्रबल किया है।
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में विकास के जो कार्य हुए हैं, तीर्थ, पर्यटन एवं बाजार का जो सम्मिश्रण यहां बना है, उसने न केवल बनारस में, बल्कि पूर्वांचल के एक बड़े भाग में पैसे की आवाजाही को तीव्र किया है। इस ‘आवाजाही' ने इस क्षेत्र के गांवों में फैली जड़ता एवं आर्थिक आलस्य को तोड़ा है एवं लोगों में विकास की आकांक्षा तेज हुई है। इसके कारण इस क्षेत्र के लोगों में सामाजिक, आर्थिक एवं भौतिक गतिशीलता बढ़ी है।
विकास की राजनीति विकासमान देशों एवं अविकसित देशों का मुख्य नारा एवं मूल राजनीतिक एजेंडा होता है। भारत अत्यंत तीव्रगति से विकास करने वाला देश है। इसने आगामी 2047 तक अपने लिए ‘विकसित भारत का लक्ष्य' तय किया है। ऐसे में भारतीय राजनीति का मुख्य एजेंडा विकास की राजनीति ही होना चाहिए।
हमें यह समझना होगा कि विकास की राजनीति एक प्रक्रिया है, परिणाम नहीं। विकास की प्रक्रिया की यह डगर बहुत मुश्किल एवं घुमावदार है। यह कई बार लोगों के कुछ वर्गों के निहित स्वार्थ को तोड़कर उन्हें बड़े परिवर्तनों के लिए बाध्य करती है। इस प्रक्रिया में कई बार लोगों का एक वर्ग नाराज भी होता है एवं चुनावों में नकारात्मक असर भी पैदा करता है। ऐसे में ‘प्रबुद्ध जनमत' की बड़ी भूमिका होती है। प्रबुद्ध जनमत जनता के छितरे, अनेक तात्कालिक हितों एवं निहित स्वार्थों से जनमन को निकालकर उन्हें बड़े परिवर्तनों के लिए तैयार करता है। यह ‘प्रबुद्ध जनमत' शिक्षित जन, लेखक, कवि, बौद्धिक वर्ग, पत्रकार एवं निष्पक्ष राजनीतिक विचारकों एवं एक्टिविस्ट्स से मिलकर बनता है। दुनिया के अन्य मुल्कों, यथा फ्रांस, इंग्लैंड, अमेरिका में ‘प्रबुद्ध जनमत' राष्ट्र एवं समाज में परिवर्तन के लिए सकारात्मक माहौल बनाता है।
लेकिन भारत में यह समस्या है कि एक तो यहां ‘प्रबुद्ध जनमत' का यह संवर्ग बहुत छोटा है, जबकि हमारी आबादी बहुत बड़ी है। दूसरा, उसका एक वर्ग जाति, धर्म एवं अनेक निहित राजनीतिक स्वार्थों में स्वयं बंधा हुआ है। अगर इस संवर्ग का विस्तार एवं विकास सम्यक ढंग से हो, यह संवर्ग अगर अपने छोटे-छोटे हितों एवं विभेदों से बाहर निकल कर ‘विकास की राजनीति' के पक्ष में जनमत निर्माण के काम को आगे ले जा सके, तो इससे 'विकसित भारत' के मिशन को मदद मिलेगी। ‘विकास की राजनीति' की इस प्रक्रिया में अनेक बाधाएं हैं। इसके रास्ते में पहली बाधा ‘जाति की राजनीति' है। ‘जाति की राजनीति' एक प्रतिगामी राजनीतिक प्रक्रिया है, जो विकास की राजनीतिक यात्रा को बार-बार बाधित करती रहती है। जिन राजनीतिक शक्तियों में विकास की दीर्घकालिक राजनीति करने का धैर्य नहीं है, वे इस ‘शॉर्टकट' से चुनावी सफलता प्राप्त करने की कोशिश करती हैं।
भारत में ‘जाति की राजनीति' का व्याकरण बिल्कुल अलग होता है। वह विकास का अपना स्वप्न गढ़ता है, जो तुरत-फुरत, टकाटक एवं फटाफट आकर्षणों पर टिका होता है। ‘जाति की राजनीति' को सामाजिक न्याय की राजनीति से जोड़कर राजनीतिक शक्तियां चमकदार शब्दावली, तात्कालिक स्वार्थों से स्वप्न गढ़ तो लेती हैं, किंतु ये स्वप्न मात्र मृगतृष्णा होते हैं, जिससे दमित एवं पिछड़े समूहों की जनता बार-बार ठगी जाती है। जाति भाव को अपने ढंग से गढ़कर चुनावी राजनीति करने वाली राजनीतिक शक्तियां अगर उसे संकुलित कर सामाजिक न्याय के बड़े हितों से जोड़ने का काम करती हैं, तो वह भी अंततः विकास की राजनीति की दिशा में ही आगे बढ़ता है।
विकास की राजनीति के लिए दूसरी समस्या राजनीति के तात्कालिक चुनावी हितों के फंदे में फंस जाने से पैदा होती है, जिसमें मुफ्त की रेवड़ी (फ्रीबीज), लोक-लुभावन वादों को ही ‘न्याय' एवं ‘सामाजिक न्याय’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। भारतीय राजनीति में आम आदमी पार्टी एवं कांग्रेस के विकास मॉडल में यह समस्या देखी जा सकती है। इन दलों का विकास मॉडल यों भी तात्कालिक एवं जाति की राजनीति से बार-बार बाधित होता रहता है। इस नए संदर्भ में इन दलों को भी विकास के दीर्घकालिक लक्ष्यों की ओर देखना होगा। उन्हें यह भी समझना होगा कि सामाजिक कल्याण एवं गिफ्ट पॉलिटिक्स में फर्क होता है। इन्हें हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक में गिफ्ट पॉलिटिक्स की आर्थिक दुर्गति एवं पंजाब में ऐसी योजनाओं की क्षण-भंगुरता से सीखना होगा।
कुछ ही दिनों में हरियाणा, जम्मू एवं कश्मीर और झारखंड जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। देखना यह होगा कि इन राज्यों में विकास की राजनीति कैसे जातीय, धार्मिक एवं क्षेत्रीय स्वार्थों से टकराती है। इस टकराहट में कौन कितना लहूलुहान होता है, यह भी देखना होगा।