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क्यों नहीं रुक रही रैगिंग की घटनाएं: क्या सुप्रीम कोर्ट की सख्ती भी बेमानी? शिक्षकों और समाज को सोचना होगा
सार
सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद उच्च शिक्षण संस्थानों में रैगिंग जैसी घटनाएं हो रही हैं, तो अभिभावकों, शिक्षकों और पूरे समाज को बहुत कुछ सोचने की आवश्यकता है।
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शिक्षक दिवस
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
हाल ही में सूरत के सरकारी मेडिकल कॉलेज के एक रेजिडेंट डॉक्टर ने रैगिंग के बाद आत्महत्या कर ली। मृतक की पहचान हर्ष पांड्या के रूप में हुई है, जो न्यू सिविल अस्पताल से संबद्ध जीएमसी के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में स्नातकोत्तर के छात्र थे। कॉलेज प्रशासन ने जांच के बाद चार वरिष्ठ डॉक्टरों को निलंबित कर दिया है। इससे शर्मनाक और क्या हो सकता है कि स्नातकोत्तर के छात्र को भी रैगिंग का शिकार बनाया जा रहा है।
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यदि कोई व्यक्ति किसी को पीड़ा पहुंचाकर आनंद प्राप्त कर रहा है, तो इसका अर्थ है कि वह मनोरोग का शिकार है। यदि सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद, उच्च शिक्षण संस्थानों में ऐसी घटनाएं हो रही हैं, तो अभिभावकों, शिक्षकों और पूरे समाज को बहुत कुछ सोचने की आवश्यकता है।
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दरअसल, रैगिंग झेल रहे छात्र दोहरे शोषण के शिकार होते हैं। रैगिंग एक मनोवैज्ञानिक समस्या है। रैगिंग लेने वाले सीनियर छात्र अपने साथ हुआ बुरा व्यवहार जूनियर छात्रों पर दोहराना चाहते हैं। इसके साथ ही स्वयं को बड़ा सिद्ध करने एवं रौब झाड़ने की प्रवृत्ति काम करती है। दूसरी ओर, रैगिंग के द्वारा जूनियर छात्रों पर भी मनोवैज्ञानिक दबाव काम करता है और वे खुद को अपमानित महसूस करते हैं। ऐसे छात्र कई बार आत्महत्या भी कर लेते हैं। इसे मनोवैज्ञानिक रूप से ही हल किए जाने की आवश्यकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि रैगिंग रोकने लिए नियम-कानूनों का पालन ही न किया जाए। ऐसी घटनाओं में आरोपी छात्रों के साथ सख्ती से कानूनी कार्रवाई को लेकर मतभेद हैं। लेकिन यह गंभीर अपराध है और इसकी सजा भी कड़ी ही होनी चाहिए।
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गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को यह निर्देश है कि रैगिंग की घटना के लिए संस्थान को जिम्मेदार माना जाएगा। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भी प्रतिवर्ष रैगिंग रोकने के निर्देश देता रहता है। हर शिक्षण संस्थान दाखिला देने से पहले छात्रों से हलफनामा भी लेता है कि रैगिंग जैसी घटना में शामिल पाए जाने पर उसका दाखिला रद्द कर दिया जाएगा। पर, ऐसी कोशिशों के बावजूद रैगिंग की घटनाएं रुक नहीं रही हैं। अब तो यह प्रवृत्ति स्कूलों में भी बढ़ रही है। उच्च शिक्षण संस्थानों में रैगिंग रोकने के प्रयास होते दिखाई देते हैं, लेकिन स्कूलों में ऐसी कोई कोशिश होती दिखाई नहीं देती है।
कई बार संस्थान ऐसी घटनाओं को छिपाने का प्रयास करते हैं। रैगिंग रोकने के लिए शिक्षण संस्थानों को अपने परिसर में बेहतर माहौल बनाना होगा। उन्हें छात्रों के अंदर नैतिक मूल्य विकसित करने की कोशिश करनी होगी। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि शिक्षण संस्थान भाषणों में तो नैतिक मूल्यों की बात बहुत करते हैं, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर ऐसा कोई प्रयास होता दिखाई नहीं देता है। जाहिर है, ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए हमें सामूहिक रूप से प्रयास करना होगा। अभिभावकों को यह जानने का प्रयास करना होगा कि उनके बच्चों के अंदर ऐसी भावना क्यों पनप रही है? अगर ऐसे मामलों में अभिभावक हाथ पर हाथ रखकर बैठ गए, तो यह समस्या और अधिक बढ़ेगी। रैगिंग रूपी सामाजिक अभिशाप को रोकने लिए निरंतर रैगिंग विरोधी अभियान चलाने की जरूरत है।