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समाज : एक गंभीर अनुत्तरित सवाल है आत्महत्या, जिसे संवेदनहीनता ने बना दिया जटिल
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सुसाइड
विस्तार
विगत माह सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को निर्देश दिया था कि वह केंद्रीय, राज्य, निजी और मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों से जाति आधारित भेदभाव से संबंधित मामलों के आंकड़े एकत्र करे। यद्यपि कोर्ट का आशय एससी/एसटी छात्रों द्वारा की गई आत्महत्याओं से संबंधित याचिकाओं का संज्ञान लेना था। आत्महत्या किसी भी जाति-वर्ग, किसी भी उम्र के व्यक्ति ने की हो, संवेदनशील समाज का चिंतित होना स्वाभाविक है।
आत्महत्याओं के कारण और प्रकार अलग-अलग होते हैं। मध्य प्रदेश निवासी आईआईटी, रुड़की की उन्नीस वर्षीय छात्रा अंशु ने छात्रावास में खुदकुशी की। ऐसा नहीं है कि यह केवल स्कूल-कॉलेज के छात्रों का मामला हो। दर्शनशास्त्र के वरिष्ठ स्कॉलर गोरख पांडे ने 29 जनवरी, 1989 को जेएनयू-हॉस्टल में आत्महत्या कर ली थी। गत माह मुंबई की एयर इंडिया पायलट सृष्टि तुली की आत्महत्या का मामला हो या वाराणसी नर्सिंग कॉलेज की प्राचार्य सुष्मिता सिंह का ओवरब्रिज से कूद कर जान देने का मामला। सिनेजगत में शोहरत आैर पैसा सर्वाधिक है। यहां रोटी और कपड़ों का कोई आधारभूत का संकट नहीं है, लेकिन तब भी आत्महत्याएं होती हैं।
हाल ही में रजनीकांत की कबाली फिल्म के निर्माता केपी चौधरी ने गोवा के अपने किराये के मकान में आत्महत्या की। इससे पूर्व दिव्या भारती, सुशांत सिंह राजपूत, जिया खान, गुरुदत्त आदि की मौतें रहस्य ही बनी रहीं। कोई भी आत्महत्या संबंधित व्यक्तियों के लिए भी गहरा आघातकारी होती है। दक्षिण अफ्रीकी फोटो पत्रकार केविन कार्टर द्वारा ली गई अकाल पीड़ित सूडान की एक तस्वीर 27 मार्च, 1993 को न्यूयॉर्क टाइम्स में ‘द वल्चर एंड द लिटिल गर्ल’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थी, जिस पर उन्हें पुलित्जर पुरस्कार से नवाजा गया था। इससे प्रसन्न होने के बजाय कार्टर ने तीन माह उपरांत ही आत्महत्या कर ली थी। स्वतंत्रताकालीन इतिहास में भी ऐसा एक आघात दर्ज है। ‘स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ कहने वाले बाल गंगाधर तिलक के बेटे श्रीधर बलवंत तिलक ने 25 मई, 1928 को आत्महत्या की थी। उनके मित्र डॉ. बीआर आंबेडकर ने सप्ताहिक दुनिया के 2 जून, 1928 के अंक में उन पर एक मृत्युलेख लिखा था।
मई 2019 में मुंबई के एक अस्पताल में आदिवासी समाज की एक महिला डॉक्टर पायल तड़वी ने आत्महत्या की। उसी तरह हैदराबाद विश्वविद्यालय के पीएचडी स्कॉलर रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर संवेदनशीन शिक्षा जगत को हिलाकर रख दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने रोहित वेमुला और पायल तड़वी की मां की अर्जियों पर आश्वस्त किया कि ‘बनाएंगे प्रभावी तंत्र’।
हाल ही में दलित वकीलों के एक संगठन ने राष्ट्रपति और महाराष्ट्र के राज्यपाल से पुलिस हिरासत में हुई मृत्यु के लिए जिम्मेदार पुलिस अफसरों को सजा देने की मांग की है। 2004 से 2024 के बीच केवल आईआईटी में हुईं 115 आत्महत्याओं के आंकड़े केवल गिनती भर नहीं थे, वे जलते सवाल थे अनुसूचित जातियों, जनजातियों के छात्रों की जिंदगियों के। एक हिंदी दैनिक के अनुसार, खुदकुशी करने वालों में 70 फीसदी पुरुष और 30 फीसदी संख्या महिलाओं की है। जनवरी 25 को एम्स में क्लीनर ‘रेनू’ ने दूसरी मंजिल से कूदकर आत्महत्या की। सात जनवरी को मध्य प्रदेश में ठग द्वारा डिजिटल अरेस्ट से दहशदजदा अतिथि शिक्षिका ने जहर खाकर आत्महत्या की। आईआईटी, मुंबई में फरवरी, 2023 को ‘दर्शन सोलंकी’ की आत्महत्या का मामला प्रकाश में आया था, तो संस्था पर जातिवादी होने का आरोप लगा था। जहां आत्महत्याओं के प्रति संवेदना ही न हो, वहां क्या समाज और क्या संस्थाएं, सभी सवालों के घेरे में हैं।
हत्या हो या आत्महत्या मनुष्यता के लिए दोनों ही क्षतिकारक हैं। कानून की नजर में आत्महत्या अपराध है। हालांकि, अच्छे संकेत हैं कि आत्महत्याओं के मामलों में 40 फीसदी कमी आ गई है। न्यायालय द्वारा दिए गए उक्त निर्देश में देश के सभी उच्च शिक्षण संस्थान और विश्वविद्यालय, समान अवसर प्रकोष्ठ एससी/एसटी सेल आत्महत्याओं के मामले में अनदेखी न करें। 2019 से लेकर 2024 तक क्रमशः 14 बिंदुओं पर पूरे आंकड़े ऑनलाइन उपलब्ध कराएं। शिकायत समाधान सेल ने भी अब तक क्या किया, इसकी जानकारी देनी होगी। कैंपस के अंतर्गत होने वाली हत्याओं-आत्महत्याओं के विवरण भी प्रस्तुत करने होंगे। सुधार और उपचार अपनी जगह और व्याधि की आंधी अपनी जगह है। आत्महत्या आखिर मानव सभ्यता के सीने पर एक ऐसा जख्म है, जो पुरवाई हवा चलते ही हरा हो जाता है। एक ऐसा दर्द, जिसे जितना दबाया, उतना सिर चढ़कर बोला।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी के पूर्व विभागाध्यक्ष हैं।)