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ब्रिक्स का हासिल: चुनौतीपूर्ण समय में अलग-अलग ध्रुवों के बीच संवाद, बहुपक्षीय कूटनीति की गुंजाइश अभी खत्म नहीं
Mon, 14 Sep 2026 10:02 AM IST
न्यूज डेस्क
अमर उजाला, नई दिल्ली।
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Published by: न्यूज डेस्क
Updated Mon, 14 Sep 2026 10:02 AM IST
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ब्रिक्स समिट 2026
- फोटो :
PTI
विस्तार
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और उससे पैदा हुई अनिश्चितताओं व गहरे मतभेदों के बीच तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले समूह ‘ब्रिक्स’ के सदस्य देशों को एक साझा नजरिये पर सहमत कर पाना भारत की कूटनीतिक क्षमता का परिचायक तो है ही, उसकी बढ़ती वैश्विक भूमिका का भी संकेत है।
ब्रिक्स जैसे समूह में सहमति बनाना वैसे भी आसान नहीं है। इसके सदस्य देशों के अपने-अपने रणनीतिक हित, क्षेत्रीय प्राथमिकताएं और विदेश नीति संबंधी दृष्टिकोण हैं। पश्चिम एशिया के सवाल पर यह विविधता और भी अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जहां ईरान स्वयं संघर्ष में एक प्रमुख पक्ष है और उसके सऊदी अरब और यूएई के साथ सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर मतभेद हैं।
गौरतलब है कि साझा बयान में न तो अमेरिका और इस्राइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों का और न ही इसके बाद ईरान द्वारा फारस की खाड़ी के अपने पड़ोसी देशों (जिनमें यूएई भी शामिल है) पर किए गए हमलों का सीधे तौर पर जिक्र किया गया; अलबत्ता इसमें युद्ध के दौरान ‘अधिकतम संयम’ बरतने की अपील की गई। दरअसल, किसी एक पक्ष की भाषा को स्वीकार करने के बजाय ऐसी शब्दावली पर सहमति बना कर, जिसे अलग-अलग हितों वाले देश स्वीकार कर सकें, भारत ने यह दिखाया है कि कठिन भू-राजनीतिक परिस्थितियों में असहमतियों को परे रखकर भी संवाद के रास्ते खुले रखे जा सकते हैं। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अमेरिका ब्रिक्स देशों के आपसी मतभेदों को रेखांकित करते हुए इस समूह के औचित्य पर सवाल उठाता रहा है।
घोषणापत्र में अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों को कमजोर करने वाले गैर-कानूनी कदमों को वापस लिए जाने की जो मांग की गई है, उसे अमेरिका की हालिया नीतियों के संदर्भ में देखा जा सकता है। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने संतुलन बनाते हुए यह स्पष्ट किया है कि ब्रिक्स किसी के विरुद्ध नहीं है।
दरअसल, भारत की सफलता सिर्फ ब्रिक्स में साझा घोषणापत्र पारित कराने में नहीं, बल्कि एक चुनौतीपूर्ण समय में अलग-अलग ध्रुवों के बीच संवाद की जमीन बचाए रखने में है। हालांकि साझा बयान युद्ध खत्म नहीं करा सकता और न ही पश्चिम एशिया के जटिल राजनीतिक विवादों का समाधान कर सकता है। फिर भी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में सहमति की दिशा में उठा हर कदम महत्व रखता है। यह इस बात का संकेत भी है कि बहुपक्षीय कूटनीति की गुंजाइश अभी खत्म नहीं हुई है। अब जरूरी है कि ऐसी कूटनीतिक सहमतियों को केवल सम्मेलनों और घोषणाओं तक सीमित न रखा जाए, बल्कि वैश्विक संकटों के समाधान की दिशा में इन्हें आगे बढ़ाने और व्यापक संवाद में बदलने की भी कोशिश हो।