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आस्था से राष्ट्रचेतना तक: 'गणपति बप्पा मोरया' की सामूहिक पुकार सार्थक कब, कैसे भारत के निर्माण में योगदान दें?

Mon, 14 Sep 2026 10:14 AM IST
ज्योति भास्कर आचार्य पवन त्रिपाठी।
आचार्य पवन त्रिपाठी। Published by: ज्योति भास्कर Updated Mon, 14 Sep 2026 10:14 AM IST
सार

'गणपति बप्पा मोरया' की सामूहिक पुकार तभी सार्थक होगी, जब उसके साथ यह संकल्प भी जुड़े कि हम एक अधिक विवेकशील, समरस, स्वच्छ और समर्थ भारत के निर्माण में योगदान देंगे।

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From Faith to National Consciousness collective call of Ganpati Bappa Morya meaningful on nation-building
सिद्धिविनायक मंदिर (फाइल) - फोटो : ANI

विस्तार

भारत की सांस्कृतिक परंपरा में पर्व केवल पूजा-अर्चना और उत्सव तक सीमित नहीं रहे हैं। उन्होंने समाज को जोड़ने, विचारों के आदान-प्रदान, लोकशिक्षा और सामूहिक चेतना को जागृत करने का भी काम किया है। मंगलमूर्ति, बुद्धि और विवेक के प्रतीक भगवान गणेश का दस दिवसीय महोत्सव इसी सांस्कृतिक निरंतरता की अनूठी कड़ी है। इसमें धर्म, लोकजीवन, कला, सामाजिक सहभागिता और राष्ट्रचेतना एक साथ दिखाई देती है।

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आज देश के अनेक हिस्सों में गणेश चतुर्थी मनाई जाती है, लेकिन सार्वजनिक गणेशोत्सव की आधुनिक परंपरा को व्यापक जनआंदोलन का रूप देने का श्रेय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को जाता है।
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1890 के दशक में उन्होंने गणेशोत्सव को सार्वजनिक रूप देकर समाज के विभिन्न वर्गों को एक मंच पर आने का अवसर दिया। उस समय अंग्रेजी शासन ने राजनीतिक सभाओं और सार्वजनिक गतिविधियों पर पाबंदियां लगा रखी थीं। ऐसे में धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन के माध्यम से ही लोगों का एकत्र होना संभव था। तिलक ने इसी सामाजिक संभावना को राष्ट्रीय चेतना के माध्यम में बदल दिया। गणेश मंडप चर्चा, व्याख्यान, संगीत, नाटक, देशभक्ति के गीत और सामाजिक जागरण के केंद्र बनने लगे।
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गणेशोत्सव की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष था—सार्वजनिक स्थान को सामाजिक संवाद का मंच बना देना। जाति, वर्ग और आर्थिक स्थिति की दीवारों से ऊपर उठकर लोग एक साथ आते थे। यही सामूहिकता आगे चलकर राष्ट्रवादी चेतना की ताकत बनी। पुणे का केसरी वाड़ा आज भी इस परंपरा की स्मृति संजोए हुए है, जहां गणेशोत्सव के साथ बैठकों और सार्वजनिक कार्यक्रमों का इतिहास जुड़ा है। गणेशोत्सव का यह राजनीतिक-सामाजिक प्रयोग महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहा।

सार्वजनिक उत्सवों ने जनसंपर्क का ऐसा मॉडल विकसित किया, जिसमें संस्कृति और राष्ट्रभावना साथ-साथ चलती थीं। इसी दौर में महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में युवाओं और सामाजिक संगठनों ने राष्ट्रीय चेतना फैलाने का काम किया। हालांकि गणेशोत्सव को स्वतंत्रता प्राप्ति का अकेला कारण मानना इतिहास को सरल बना देना होगा, लेकिन तिलक ने धार्मिक-सांस्कृतिक मंचों को जनजागरण की प्रभावी शक्ति में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आज भगवान गणेश के गुणधर्मों को राष्ट्रीय जीवन की आवश्यकताओं से जोड़कर देखने की जरूरत है। गणेशजी का सबसे पहला संदेश है—बुद्धि और विवेक। हाथी का विशाल मस्तक व्यापक सोच का प्रतीक माना जाता है। आज जब समाज सूचना की बाढ़, अफवाहों और डिजिटल भ्रम से गुजर रहा है, तब विवेकपूर्ण निर्णय की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। राष्ट्र की प्रगति केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि सही निर्णय लेने वाली बुद्धिमत्ता से होती है। गणेशजी के बड़े कान हमें सुनने की संस्कृति सिखाते हैं।

लोकतंत्र में केवल बोलना पर्याप्त नहीं है; जनसमस्याओं को सुनना, असहमति को समझना और संवाद के रास्ते तलाशना भी उतना ही आवश्यक है। संवाद की संस्कृति मजबूत होगी, तो सामाजिक तनाव कम होगा। गणेशजी की छोटी आंखें एकाग्रता का संदेश देती हैं। गणेशजी की सूंड को अनुकूलन और कार्यकुशलता का प्रतीक माना जा सकता है। गणेशजी का एकदंत त्याग लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता की याद दिलाता है। वहीं उनका वाहन मूषक हमें यह संदेश देता है कि छोटी से छोटी शक्ति भी महत्वहीन नहीं होती। समाज का अंतिम व्यक्ति भी राष्ट्रनिर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

यदि गणेशोत्सव की ऊर्जा को स्वच्छता, जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा और नागरिक जिम्मेदारी से जोड़ा जाए, तो गणेशोत्सव केवल धार्मिक पर्व न रहकर सामाजिक परिवर्तन का अभियान बन सकता है। मिट्टी की प्रतिमाओं को प्रोत्साहन, प्राकृतिक रंगों का उपयोग, जलस्रोतों की स्वच्छता, ध्वनि प्रदूषण में कमी और सजावट में पुनर्चक्रण योग्य सामग्री का इस्तेमाल ऐसे कदम हैं, जो आस्था और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित कर सकते हैं। भगवान गणेश स्वयं प्रकृति और जीव-जगत से जुड़े प्रतीकों से घिरे हैं; इसलिए उनके उत्सव को प्रकृति के संरक्षण का संदेश देना स्वाभाविक भी है।


भारतीय सभ्यता की शक्ति उसकी विविधता में एकता रही है। महाराष्ट्र का सार्वजनिक गणेशोत्सव इस बात का उदाहरण है कि किसी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा को सामाजिक एकता और जनजागरण का माध्यम बनाया जा सकता है। 'गणपति बप्पा मोरया' की सामूहिक पुकार तभी सार्थक होगी जब उसके साथ यह संकल्प भी जुड़े कि हम एक अधिक विवेकशील, समरस, स्वच्छ और समर्थ भारत के निर्माण में योगदान देंगे।

-लेखक मुंबई के श्रीसिद्धिविनायक न्यास के कोषाध्यक्ष हैं।

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