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दूसरा पहलू: राष्ट्रभाषा तो हिंदी ही बन सकती है, ये हृदय की भाषा है

Mon, 14 Sep 2026 10:22 AM IST
ज्योति भास्कर महात्मा गांधी
महात्मा गांधी Published by: ज्योति भास्कर Updated Mon, 14 Sep 2026 10:22 AM IST
सार

सारे हिंदुस्तान के लिए जो भाषा चाहिए, वह तो हिंदी ही होनी चाहिए। हृदय-हृदय से बातचीत करता है और हिंदी हृदय की भाषा है। यदि हिंदी भाषा की भूमि सिर्फ उत्तर प्रांत की होगी, तो साहित्य का प्रदेश संकुचित रहेगा। यदि हिंदी भाषा राष्ट्रीय भाषा होगी, तो साहित्य का विस्तार भी राष्ट्रीय होगा।

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Mahatama Gandhi opinion on Hindi Language National vs official language discussion heartful talk in hindustan
महात्मा गांधी - फोटो : amarujala kavya

विस्तार

राष्ट्रभाषा के बिना कोई भी राष्ट्र गूंगा हो जाता है। सारे हिंदुस्तान के लिए जो भाषा चाहिए, वह तो हिंदी ही होनी चाहिए। हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है और हिंदी हृदय की भाषा है। हिंदुस्तान के लिए देवनागरी लिपि का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहां हो ही नहीं सकता।

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भारत के युवक और युवतियां अंग्रेजी और दुनिया की दूसरी भाषाएं खूब पढ़ें, मगर मैं हरगिज यह नहीं चाहूंगा कि कोई भी हिंदुस्तानी अपनी मातृभाषा को भूल जाए या उसकी उपेक्षा करे या उसे देखकर शरमाए अथवा यह महसूस करे कि अपनी मातृभाषा के जरिये वह ऊंचे से ऊंचा चिंतन नहीं कर सकता।
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राष्ट्र के विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में नहीं, अन्य भाषा में शिक्षा पाते हैं तो वे आत्महत्या करते हैं। इससे उनका जन्मसिद्ध अधिकार छिन जाता है। विदेशी भाषा से बच्चों पर बेजा जोर पड़ता है और उनकी सारी मौलिकता नष्ट हो जाती है। इसलिए किसी विदेशी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाना मैं राष्ट्र का बड़ा दुर्भाग्य मानता हूं।

अगर हिंदुस्तान को सचमुच हमें एक राष्ट्र बनाना है, तो कोई माने या न माने, राष्ट्रभाषा तो हिंदी ही बन सकती है। यदि स्वराज्य देश के करोड़ों भूखे, अनपढ़, दलितों के लिए होना है, तो जन-सामान्य की भाषा हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बनाना ही होगा। जैसे अंग्रेज अपनी मादरी-जबान अंग्रेजी में ही बोलते और सर्वथा उसे ही व्यवहार में लाते हैं, वैसे ही मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनने का गौरव प्रदान करें।

राष्ट्रभाषा वही हो सकती है, जो सरकारी कर्मचारियों के लिए सहज और सुगम हो। जो धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में माध्यम भाषा बनने की शक्ति रखती हो। जिसको बोलने वाला बहुसंख्यक समाज हो, जो पूरे देश के लिए सहज रूप से उपलब्ध हो। अंग्रेजी किसी तरह से इस कसौटी पर खरी नहीं उतर पाती।

यदि हिंदी भाषा की भूमि सिर्फ उत्तर प्रांत की होगी, तो साहित्य का प्रदेश संकुचित रहेगा। यदि हिंदी भाषा राष्ट्रीय भाषा होगी, तो साहित्य का विस्तार भी राष्ट्रीय होगा। महान प्रांतीय भाषाओं को उनके स्थान से च्युत करने की कोई बात ही नहीं है, क्योंकि राष्ट्रीय भाषा की इमारत प्रांतीय भाषाओं की नींव पर ही खड़ी की जानी है। दोनों का लक्ष्य एक-दूसरे की जगह लेना नहीं, बल्कि एक-दूसरे की कमी को पूरा करना है।

(विभिन्न स्रोतों से संकलित)

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