{"_id":"6aa77a796912c91efe0d09e3","slug":"brics-delhi-success-testament-to-capability-us-policy-expert-alyssa-ayres-book-world-making-space-for-india-2026-09-14","type":"story","status":"publish","title_hn":"ब्रिक्स की कामयाबी काबिलियत का प्रमाण: अमेरिकी नीति विशेषज्ञ एलिसा की राय- दुनिया भारत के लिए जगह बना रही है","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
ब्रिक्स की कामयाबी काबिलियत का प्रमाण: अमेरिकी नीति विशेषज्ञ एलिसा की राय- दुनिया भारत के लिए जगह बना रही है
सार
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की कामयाबी भारत की उस काबिलियत का प्रमाण है, जिससे वह कट्टर दुश्मनों में भी सहमति बनवा सकता है। इससे अमेरिकी विदेश नीति की विशेषज्ञ एलिसा आयर्स की किताब याद आती है, जो कहती है कि दुनिया भारत के लिए जगह बना रही है।
विज्ञापन
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन, 2026 नई दिल्ली में आयोजित किया गया और इसका विस्तृत अंतिम दस्तावेज भारत की अलग-अलग राय वाले देशों के बीच तालमेल बिठाने की क्षमता का सबसे अच्छा उदाहरण है। पहले दिन जारी हुए 'नई दिल्ली ब्रिक्स घोषणापत्र' की सबसे बड़ी बात यह है कि इसे सर्वसम्मति से जारी किया जा सका। यह भारत की उस काबिलियत का सबूत है, जिससे वह कट्टर दुश्मनों (ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब) को एक ही मेज पर लाकर बातचीत करवा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ खास और समय-सीमा वाले कदमों का सुझाव दिया। इससे पहले किसी दस्तावेज में ऐसे ठोस विचार शामिल नहीं किए गए थे।
विज्ञापन
इस दस्तावेज में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद और उसे बढ़ावा देने व उसका वित्तपोषण करने वालों की कड़ी आलोचना की गई है। साथ ही, आतंकवाद के मुख्य सरगना का नाम लिए बिना, अप्रैल 2025 में पहलगाम में 26 भारतीय पर्यटकों की उनके परिवारों के सामने धर्म के आधार पर की गई हत्या की निंदा की गई है। चीन, जिसने हमेशा आतंकवाद को संरक्षण देने वाले देश को बचाया है, ने इस घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किया। वह आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में अलग-थलग नहीं पड़ना चाहता था।
विज्ञापन
चीन के राष्ट्रपति एक बड़े प्रतिनिधिमंडल के साथ आए। उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री के साथ द्विपक्षीय बैठक की। हालांकि उन्हें इस बात की चिंता थी कि भारत ताइवान को ऑब्जर्वर के तौर पर बुला सकता है। इस शिखर सम्मेलन में नरेंद्र मोदी के साथ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी शामिल थे। उन्हें कई बार हाथ में हाथ डालकर चलते हुए देखा गया। भले ही ईरान को बहुत अहमियत दी गई और उसके राष्ट्रपति को हमारे राष्ट्रपति से मुलाकात का मौका मिला, लेकिन आतंकवाद, समुद्री यात्रियों पर हमलों और वैश्विक समुद्री व्यापार में दखलंदाजी का जिक्र असल में इस्राइल पर हमला करने के लिए ईरान द्वारा अपने आतंकवादी प्रॉक्सी (प्रतिनिधियों) के इस्तेमाल की ओर साफ इशारा था।
विज्ञापन
इसमें संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को भी आमंत्रित किया गया था। भारत ने ग्लोबल गवर्नेंस के ढांचे में सुधार की मांग की है, ताकि तेजी से अहम होते विकासशील देश केवल नियम मानने वाले न रहकर, नियम तय करने वाले बन सकें। सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों (चीन और रूस) ने भी इसके सुधार के प्रति प्रतिबद्धता को दोहराया।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ब्रिक्स को अमेरिका विरोधी मानते हैं। उन्होंने बार-बार चेतावनी दी है कि 'ब्रिक्स देशों को निश्चित रूप से कीमत चुकानी होगी, क्योंकि ब्रिक्स हमें नुकसान पहुंचाने और हमारे डॉलर की अहमियत कम करने के लिए बनाया गया था।' डॉलर का मुद्दा पश्चिमी देशों के लिए सबसे बड़ी चिंता है, भले ही ब्रिक्स कल कोई नई ब्रिक्स मुद्रा न बनाए। असल में, ब्रिक्स देश डॉलर पर निर्भरता कम करने, स्थानीय मुद्रा में व्यापार बढ़ाने और भुगतान के लिए वैकल्पिक इंफ्रास्ट्रक्चर अपनाने की दिशा में बढ़ रहे हैं। हालांकि वैश्विक वित्तीय प्रवाह में अब भी डॉलर की हिस्सेदारी 85 फीसदी है।
अमेरिका को इस बात की खास चिंता है कि चीन और रूस ब्रिक्स का इस्तेमाल करके एक ऐसी विश्व व्यवस्था बना रहे हैं, जो पश्चिम पर कम निर्भर हो, और वे अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम कर रहे हैं।
ब्रिक्स, भारत, ब्राजील, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों को चीन या रूस के गठबंधन में शामिल हुए बिना अमेरिकी दबाव का विरोध करने की आजादी देता है। हालांकि वाशिंगटन सार्वजनिक रूप से यह कहता है कि संप्रभु देश अपनी पसंद के किसी भी समूह में शामिल होने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन निजी तौर पर उसे इस बात की चिंता सता रही है कि ब्रिक्स धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को आकार देने की अमेरिका की क्षमता को कम कर सकता है।
ब्रिक्स के सदस्यों के बीच बहुत ज्यादा मतभेद हैं: एक तरफ सऊदी अरब और ईरान में मतभेद हैं, तो दूसरी तरफ व्यापार और सुरक्षा के मुद्दों पर चीन और भारत में। ब्राजील के हित रूस से अलग हैं, तो खाड़ी देशों के अमेरिका के साथ बहुत करीबी संबंध हैं। इसके अलावा, कई सदस्य अब भी डॉलर और पश्चिमी वित्तीय बाजारों पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं। लेकिन पश्चिम अब ब्रिक्स को नजरअंदाज नहीं कर सकता, क्योंकि विस्तृत ब्रिक्स दुनिया की आबादी, संसाधनों और आर्थिक उत्पादन के एक बहुत बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है-इसमें दुनिया की आधी आबादी और वैश्विक व्यापार का 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सा शामिल है।
ब्रिक्स ने एक स्थायी मंच बनाया है, जहां प्रमुख गैर-पश्चिमी शक्तियां पश्चिमी देशों की भागीदारी के बिना आपस में तालमेल बिठा सकती हैं। 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' (एनडीबी) को आंशिक रूप से इसलिए बनाया गया, क्योंकि विकासशील देशों को लगता था कि मौजूदा संस्थाएं—विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष—उनके हितों का ठीक से प्रतिनिधित्व नहीं करती हैं। एनडीबी का काम उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में बुनियादी ढांचे और टिकाऊ विकास के लिए वित्त देना है, जो मौजूदा बहुपक्षीय संस्थाओं के काम को आगे बढ़ाता है।
ब्रिक्स असल में नाटो जैसा कोई गठबंधन नहीं है, बल्कि एक ऐसी साझेदारी है, जिसमें सदस्य कहते हैं कि 'हमें और विकल्प चाहिए'। भारत इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। एक ही समय में यह क्वाड के जरिये अमेरिका के साथ सहयोग करता है, पश्चिमी देशों से टेक्नोलॉजी और ऊर्जा खरीदता है, चीन से व्यापार करता है, रूस के साथ बेहतरीन संबंध बनाए रखता है, ब्रिक्स में शामिल है और एससीओ के जरिये काम करता है।
ब्रिक्स से पश्चिम को रणनीतिक स्वायत्तता की चुनौती है। पश्चिम एक ऐसी दुनिया का आदी रहा है, जिसमें देश मोटे तौर पर पश्चिमी, रूसी या चीनी प्रभाव वाले क्षेत्रों में बंटे होते हैं। ब्रिक्स एक ऐसी चौथी संभावना बना रहा है, जिसमें देश सभी के साथ सहयोग करते हैं और किसी के साथ भी गठबंधन नहीं करते। इस शिखर सम्मेलन में भारत की शानदार भूमिका को देखते हुए दक्षिण एशिया मामलों की अमेरिकी विदेश नीति विशेषज्ञ एलिसा आयर्स की पुस्तक की याद आई : आवर टाइम हैज कमः हाउ इंडिया इज मेकिंग इट्स प्लेस इन द वर्ल्ड। दुनिया भारत के लिए जगह बना रही है।