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क्रोध स्वाभाविक है, समाधान नहीं: गुस्सा आने पर तुरंत जवाब न दें, शांत रहना और नजरिया बदलना बेहतर उपाय

Sun, 13 Sep 2026 06:17 AM IST
राकेश कुमार टॉम डेंसन, मनोविज्ञान के प्रोफेसर, यूएनएसडब्ल्यू
टॉम डेंसन, मनोविज्ञान के प्रोफेसर, यूएनएसडब्ल्यू Published by: राकेश कुमार Updated Sun, 13 Sep 2026 06:17 AM IST
सार

गुस्सा आना इंसानी स्वभाव का हिस्सा है, लेकिन उस पर तुरंत प्रतिक्रिया देना कई बार स्थिति बिगाड़ सकता है। शोध बताते हैं कि गुस्से में तेज दौड़ना या सीढ़ियां चढ़ना हमेशा राहत नहीं देता, बल्कि उत्तेजना बढ़ा सकता है। ज्यादातर मामलों में गुस्सा करीब 30 मिनट में अपने आप कम होने लगता है। इसलिए इस दौरान बहस करने या बदला लेने के बारे में सोचने के बजाय ध्यान भटकाना, शांत रहना और माइंडफुलनेस अपनाना ज्यादा मददगार हो सकता है।

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क्रोध, प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि रात में ठीक से नींद न आई हो, सुबह होते ही नाश्ते की मेज पर बच्चों से बहस हो गई हो, पड़ोसी ने गलत पार्किंग कर दी हो और दफ्तर पहुंचने में एक घंटे की देरी हुई हो। ऊपर से बॉस ने ऐसा काम थमा दिया, जो लगभग नामुमकिन लग रहा हो। ऐसे में लोगों पर गुस्सा आना बिल्कुल स्वाभाविक है। लेकिन, सवाल यह है कि गुस्सा आए, तो करें क्या? दौड़ने निकल जाएं, सीढ़ियां चढ़ें या ध्यान लगाएं?
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शोध बताते हैं कि हर तरीका गुस्सा कम नहीं करता। कुछ तरीके तो उल्टा उसे और भड़का सकते हैं। किसी भी दिन करीब 22 फीसदी लोग गुस्सा महसूस करते ही हैं। हालांकि, ज्यादातर लोग इसे आक्रामक व्यवहार में नहीं बदलते, फिर भी लगभग आठ फीसदी लोगों का मानना है कि गुस्सा उनकी जिंदगी पर नकारात्मक असर डालता ही है। आम धारणा है कि गुस्सा आने पर दौड़ना या सीढ़ियां चढ़ना अच्छा है। पर, शोध कुछ और ही कहते हैं। तेज शारीरिक गतिविधियां, खासकर दौड़ना या सीढ़ियां चढ़ना, कई बार गुस्से को और बढ़ा सकती हैं। 
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अच्छी बात यह है कि ज्यादातर मामलों में गुस्सा करीब 30 मिनट में स्वाभाविक रूप से कम होने लगता है। इसलिए, उस दौरान खुद को थोड़ा वक्त देना बेहतर है। बार-बार बहस करना, सबक सिखाने की कल्पना करना या ‘उसने ऐसा किया ही क्यों?’ सोचते रहना गुस्से की आग में घी डाल सकता है। इसके बजाय, ध्यान भटकाना ज्यादा प्रभावी हो सकता है। इसके लिए, कोई किताब पढ़ें, शांत खेल खेलें या किसी सुखद याद को ताजा करें। करीब 85 फीसदी लोगों ने इस तरीके से अपने गुस्से को कम किया है। माइंडफुलनेस भी मददगार है। यानी गुस्से को तुरंत दबाने या उस पर प्रतिक्रिया देने के बजाय कुछ पल उसे महसूस करें और फिर जाने दें। स्थिति को सामने वाले की नजर से भी देखने की कोशिश करें। शायद, वह भी तनाव से जूझ रहा हो। 
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 याद रखिए, गुस्से को दबाना भी जरूरी नहीं और तुरंत उगल देना भी नहीं। ध्यान भटकाना, शांत रहना, माइंडफुलनेस और नजरिया बदलना न सिर्फ रिश्ते और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहतर है, बल्कि दिल की सेहत के लिए भी फायदेमंद हो सकते हैं। अगर गुस्सा बार-बार आता है, लंबे समय तक बना रहता है या आक्रामक व्यवहार में बदलने लगे, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेना समझदारी भरा कदम है।
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