राजकपूर जन्मशती: आधी हकीकत आधा फसाना... आज भी यकीन नहीं होता कि वह आदमी था या छलावा
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
विस्तार
राजकपूर की सृजन प्रक्रिया अजीब थी! उनके मन में ध्वनियों का जन्म पहले होता था और दृश्य संरचना बाद में। मन में उभरे टोनल पैटर्न का विजुअल अनुवाद उनकी तकनीक की आत्मा थी। एक तरह से फिल्म राजकपूर के लिए ‘ऑपेरा’ की तरह थी। संगीत ‘मोटिफ’ की धुरी पर चित्र का निर्माण होता था। मैंने कई बार देखा है कि दृश्यांकन के समय वे किसी पात्र के चलने जैसे साधारण क्रिया के समय ‘बीट’ गिनते रहते थे- उस ध्वनि की, जो उनके मन में गूंजती थी। ध्वनियों से प्रेरित दृश्य विधान के साथ ही राजकपूर संवाद का बिंब रूपांतर भी करते रहे हैं। मेरा नाम जोकर में अब्बास साहब ने मनुष्य की असहायता और सीमाओं पर एक संवाद लिखा था। इस विचार को राजकपूर ने अनोखे बिंब विधान द्वारा प्रस्तुत किया। नायक जोकर के पुतले पर जमे हुए जाले साफ करता है और उसे जमीन पर रखता है। चाबी भरे हुए खिलौने के मानिंद वह पुतला थिरकता है। पृष्ठभूमि में काले पत्थर की दीवारों पर मकड़ी का जाल बिछा हुआ है। समय की पृष्ठभूमि पर मनुष्य की लाचारी का मार्मिक चित्रण हुआ है। पुतला बदलकर नायक हो जाता है, जिसके फैले हुए हाथों के बीच से गुजरती हैं नायिकाओं की छवियां। राजकपूर को प्रतीकों का बहुत मोह था। वे पात्रों के नाम भी उनके स्वभाव के परिचायक के रूप में रखते थे। श्री 420 में नर्गिस विद्या है, तो नादिरा माया और कहीं इस प्रतीक को लोग भूल नहीं जाएं या नजरअंदाज नहीं कर जाएं- इसीलिए सेठ सोनाचंद धर्मानंद भोलेराज को अपने गिरोह में लेने के बाद कहते हैं कि ‘अब तुम्हें विद्या की नहीं, माया की जरूरत है।’ जोकर के तीसरे भाग में स्वार्थी नायिका टाइम पत्रिका पढ़ती है, अमीर निर्माता फॉर्चून पढ़ रहा है, तो तमाशे की जान-जोकर लाइफ पढ़ रहा है।
एक नकली अंधा, जब गंगा को बेच देता है, तो गंगा का संवाद है-‘अंधे बनकर ऐसा काम करोगे, तो लोग अंधों की मदद नहीं करेंगे।’ इसी तरह कहावतों का प्रयोग दृश्यों और गीतों में करने की प्रेरणा उन्हें स्वर्गीय शैलेंद्र ने दी। राजकपूर दसवीं फेल थे, परंतु उनकी असली पाठशाला तो जिंदगी थी। उनकी सारी फिल्मों की प्रेरणा उन्हें जीवन के अपने अनुभवों से मिली। प्रथम प्रदर्शन में ‘जोकर’ के असफल होने का एक कारण यह भी था कि वह राजकपूर की आत्म-कथा न होकर, राजकपूर अभिनेता की ‘होबो’ छवि की कथा थी।
राजकपूर की फिल्मों के कथानक सामाजिक यथार्थ की भूमि में जन्म लेते थे, परंतु उनका ऊपरी स्वरूप फंतासी की तरह दिखता था। जीवन के दु:ख से भागकर आए हुए दर्शक फंतासी के नयनाभिराम स्वरूप में मनोरंजन पाते और प्रबुद्ध दर्शक सामाजिक संदर्भ और पात्रों की मानवीयता से अभिभूत हो जाते। राजकपूर की जिन फिल्मों में फंतासी और सामाजिकता का संतुलन बिगड़ा, उन्हें जनता ने अस्वीकृत कर दिया जैसे आह, जागते रहो और जोकर। फंतासी और पात्र के अंतर्द्वंद्व के सामंजस्य का श्रेष्ठ उदाहरण है आवारा का स्वप्न दृश्य। राजकपूर का फिल्म दर्शन ही नहीं, वरन पूरा जीवन है आधी हकीकत, आधा फसाना। राजकपूर पर अब्बास और अन्य कम्युनिस्ट लेखकों का प्रभाव रहा, तो उनकी मनपसंद किताब एन रेंड की फाउंटेन हेड भी रही है। उन्होंने जिस कुशलता के साथ बीवी की हकीकत के साथ प्रेयसी का फसाना मिलाया था- उसी निपुणता से अपनी फिल्मों में फंतासी और यथार्थ को भी मिलाया था। आज भी यकीन नहीं होता कि वह आदमी था या छलावा।
(नब्बे के दशक में श्रीराम तिवारी संपादित ‘पटकथा’ में प्रकाशित राजकपूर-प्रेमी फिल्म आलोचक स्व. जयप्रकाश चौकसे के आलेख के अंश)