{"_id":"6aa0bbd10b7aed028709f53a","slug":"opinion-on-clean-air-survey-2026-indore-lucknow-and-delhi-situation-2026-09-09","type":"story","status":"publish","title_hn":"चुनौतियां बाकी हैं: स्वच्छ हवा अब महज पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
चुनौतियां बाकी हैं: स्वच्छ हवा अब महज पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं
Wed, 09 Sep 2026 07:22 AM IST
नितिन गौतम
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Wed, 09 Sep 2026 07:22 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
Car Pollution
- फोटो :
Adobe Stock
विस्तार
वायु प्रदूषण को लेकर जब देश के शहरों की तस्वीर लंबे समय तक निराश करने वाली रही हो, तब केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से जारी स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 इस लिहाज से उत्साह बढ़ाने वाला है कि प्रदूषण के खिलाफ लगातार किए जा रहे प्रयास अब जमीन पर असर दिखाने लगे हैं। सर्वे के अनुसार, वायु प्रदूषण के लिए कुख्यात राजधानी दिल्ली का ग्यारह पायदान की छलांग लगाते हुए 21वें स्थान पर आना और दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में पिछले आठ वर्षों से शीर्ष पर चल रहे इंदौर को पीछे छोड़ते हुए लखनऊ का पहला स्थान हासिल करना उल्लेखनीय है। यही नहीं, सर्वेक्षण की अलग-अलग श्रेणियों में उत्तर प्रदेश के 16 शहरों को जगह मिलना भी महत्वपूर्ण है।दरअसल, स्वच्छ हवा का सवाल अब महज पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं रह गया है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण, वाहनों की बढ़ती संख्या, निर्माण गतिविधियों, सड़क की धूल, औद्योगिक उत्सर्जन और कचरा जलाने जैसी वजहों ने शहरों की हवा को लगातार जहरीला बनाया है। सर्वेक्षण इसलिए भी खास है, क्योंकि यह केवल वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) पर आधारित नहीं है, बल्कि शहरों द्वारा प्रदूषण नियंत्रण के लिए जमीन पर किए गए ठोस प्रयासों, मसलन, सड़क की धूल कम करने, कचरा प्रबंधन, वाहन उत्सर्जन नियंत्रण, निर्माण व विध्वंस अपशिष्ट का निपटान, सार्वजनिक जागरूकता और वार्षिक पीएम10 स्तर में सुधार इत्यादि का मूल्यांकन करता है।
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के अंतर्गत 130 शहरों में से 108 शहरों की हवा की गुणवत्ता में सुधार दर्ज होना और कई शहरों में पीएम10 स्तर में 40 प्रतिशत से अधिक कमी आना इस बात का प्रमाण है कि सही दिशा में किए गए प्रयास रंग ला रहे हैं। फिर भी यह उत्साह सतर्कता के साथ होना चाहिए। रैंकिंग में सुधार का मतलब यह नहीं कि शहरों की हवा पूरी तरह स्वच्छ हो गई है। दिल्ली जैसे महानगरों में सर्दियों में गंभीर प्रदूषण की घटनाएं अब भी आम हैं। कई शहर अब भी राष्ट्रीय मानकों के अनुसार पीएम10 के स्वीकार्य स्तर तक नहीं पहुंच पाए हैं।
लखनऊ में भी पीएम10 का स्तर घटा जरूर है, लेकिन वार्षिक राष्ट्रीय मानक तक नहीं पहुंचा है। इसके अतिरिक्त, शहरीकरण की गति, निर्माण गतिविधियों का विस्तार और वाहनों की संख्या में वृद्धि लगातार चुनौती बनी हुई है। ऐसे में, जरूरी है कि प्रदूषण के स्रोतों पर निरंतर निगरानी, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा, सड़क और निर्माण की धूल पर नियंत्रण तथा बेहतर कचरा प्रबंधन जैसे उपाय पूरे वर्ष जारी रखे जाएं। सर्वेक्षण में अच्छे अंक हासिल करना अच्छी बात है, लेकिन अब जरूरत है कि इन प्रयासों को स्थायी और व्यापक बनाया जाए।