फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   nepal flood wake up call for himalayan states of india know how

सबसे जरूरी तो हिमालय है: हिमालयी राज्यों के लिए विकास नहीं, अब पारिस्थितिकी भी प्राथमिकता होनी चाहिए

Dr. Anil Prakash Joshi डॉ. अनिल प्रकाश जोशी
Updated Wed, 09 Sep 2026 07:43 AM IST
सार

विकास की अंधी दौड़ में जिस पहलू को सबसे अधिक नजरअंदाज किया जाता है, वह है हिमालय का अत्यंत संवेदनशील और नाजुक पारिस्थितिक तंत्र। जब हिमालय ही सबको पालता है, तो इस संबंध में नए सिरे से संवाद की शुरुआत क्यों नहीं होती? क्या हिमालय से भी जरूरी कुछ हो सकता है?

विज्ञापन
nepal flood wake up call for himalayan states of india know how
himalaya - फोटो : istock

विस्तार

जब-जब हिमालयी क्षेत्र के स्थानीय लोगों ने स्वायत्तता की मांग की या अपने राज्य की प्राथमिकताओं को साधने पर बल दिया, तब-तब केंद्र सरकार ने नए राज्यों का निर्माण किया। चाहे वे पूर्वोत्तर हिमालय के राज्य हों या उत्तर-पश्चिमी हिमालय के, लगभग 60 से अधिक वर्षों से निरंतर ऐसे राज्यों का गठन होता रहा है। आरंभिक चरण में जहां जम्मू-कश्मीर व हिमाचल प्रदेश शामिल थे, वहीं पूर्वोत्तर के अधिकांश राज्य भी शुरुआती दौर में ही अपनी स्वायत्त पहचान राज्य के रूप में पा चुके थे।
विज्ञापन

इन राज्यों के गठन के पीछे मूलतः दो दृष्टिकोण थे-पहला, यहां की भौगोलिक विषमताओं ने इन्हें देश से अलग-थलग रखा। ये क्षेत्र अत्यंत दुर्गम हैं, जहां बुनियादी सुविधाओं का अभाव रहा है। देश के अन्य हिस्सों की तुलना में यहां विकास उस गति से नहीं पहुंच सका, जिसे आज किसी भी राज्य की रीढ़ माना जाता है। नतीजतन, ये क्षेत्र मुख्यधारा के विकास से वंचित रहे। दूसरा, इनकी आर्थिक व सामाजिक प्राथमिकता भी देश के अन्य हिस्सों से अलग-थलग थी। इन्हीं कारणों से यहां आर्थिक और सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता दी गई और इन्हीं आधारों पर नए राज्यों की परिकल्पना की गई। इनमें सबसे नया राज्य उत्तराखंड है। 
विज्ञापन


यदि पिछले 60 वर्षों के आंकड़ों और विकास के दावों का विश्लेषण करें, तो हिमाचल प्रदेश को छोड़कर किसी अन्य राज्य ने ऐसी कोई बड़ी छलांग नहीं लगाई, जिससे कहा जा सके कि राज्य बनने के बाद उनकी आर्थिकी बहुत सुदृढ़ हुई है। दूसरे नंबर पर उत्तराखंड ने बहुत कुछ साधा। जम्मू-कश्मीर की बात करें, तो यह सामाजिक कारणों से सदैव अशांत रहा। कुछ हद तक पूर्वोत्तर में भी, विशेषकर मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में, अशांति का माहौल रहा। शुरुआती दौर में इन क्षेत्रों में उत्साह तो था, परंतु समय बीतने के साथ ये आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक रूप से कुछ हद तक स्थिर होते चले गए। इन सबके बावजूद, कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो आज अधिकांश हिमालयी राज्य गंभीर चुनौतियों से घिरे हैं। इनमें जिस पहलू को सबसे अधिक नजरअंदाज किया गया, वह है पूरे हिमालय का पारिस्थितिकी तंत्र। 
विज्ञापन
विज्ञापन


शुरुआत में राज्य सरकारों से केवल यही अपेक्षा रखी गई कि वे अपने-अपने राज्यों का ढांचागत विकास करें। चूंकि, अर्थव्यवस्था का दबाव अधिक था, इसलिए ये राज्य भी एक अंधी दौड़ में शामिल हो गए। राजस्व जुटाने के लिए इन्होंने सभी तरह के प्रयत्न किए। कुछ राज्यों ने आर्थिकी के अन्य विकल्प भी तलाशे-जैसे हिमाचल प्रदेश ने बागवानी उत्पादों में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। पिछले एक दशक में इन राज्यों में पर्यटन भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ा है। पर्यटकों के लिए हिमालय पहली पसंद बना। इससे राजस्व में बढ़ोतरी तो हुई, पर एक बुनियादी सच को भुला दिया गया और वह यह कि हिमालय अत्यंत संवेदनशील और नाजुक है। हिमालय के प्रति संवेदनशीलता बरतना केवल स्थानीय सरकारों का दायित्व नहीं, बल्कि उन केंद्रीय नीतियों व मैदानी क्षेत्र के निवासियों की भी जिम्मेदारी है, जिनकी जीवनशैली और गतिविधियों से हिमालय प्रभावित हो रहा है।

हाल ही में, नेपाल में ग्लेशियर के टूटने/हिमस्खलन से हुई तबाही ने एक बार फिर सबको झकझोर दिया है। इससे पहले सिक्किम और असम में आई आपदाएं, तीन वर्ष पूर्व हिमाचल प्रदेश में मची भारी तबाही, और पिछले वर्ष उत्तराखंड के थराली में पूरे गांव का अस्तित्व समाप्त हो जाना-ये सभी इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं। ऐसी आपदाओं के बाद चिंता तो बहुत जताई जाती है, लेकिन यह समझना होगा कि इसके लिए केवल स्थानीय लोगों या राज्य सरकारों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। उनकी अपनी सीमाएं हैं। उन्हें जनता के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करना ही होता है। हां, राज्य सरकारों को अनियोजित निर्माण और ढांचागत विकास को लेकर अधिक सतर्कता और संवेदनशीलता बरतनी चाहिए, ताकि आपदाओं के प्रभावों को न्यूनतम किया जा सके। लेकिन, इससे भी बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि आखिर हिमालय में आपदाएं लगातार क्यों बढ़ रही हैं? इसका सीधा उत्तर पिछले दो दशकों में तेजी से बढ़ी ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन में छिपा है।

विश्वभर में बदलते पर्यावरण की पहली और सबसे घातक मार पर्वतीय क्षेत्रों, विशेषकर हिमालय पर पड़ रही है। चाहे तिब्बत के पिघलते ग्लेशियर हों या थराली जैसे क्षेत्रों का भूस्खलन-यह संकट अब स्थानीय न रहकर एक वैश्विक चेतावनी बन चुका है। फिर, बढ़ते तापमान को देखें, यह सबको लपेटे हुए तो है, पर समुद्र और पहाड़ इसके पहले निशाने हैं। समुद्र इसलिए कि यहीं से मौसम का मिजाज तय होता है और पहाड़ इसलिए कि इसे दुनिया को मिट्टी, पानी व हवा देनी है। ये दोनों ही मिलकर जीवन की दशा तय करते हैं। इसलिए, इन्हें कैसे अकेला छोड़ा जा सकता है? आखिर क्यों नहीं केंद्र स्तर पर सरकार देश के हिमालयी राज्यों और पूरी दुनिया के हिमालयी देशों में घट रही घटनाओं को केंद्र में रखकर विचार-मंथन करती? खास तौर पर तब, जब हिमालय सबको पालता हो। 

वर्तमान पारिस्थितिकी और हिमालयी ढांचे के संदर्भ में सभी हिमालयी राज्यों के साथ नए सिरे से संवाद और विमर्श की शुरुआत क्यों नहीं की जाती? अब समय आ गया है कि हिमालय को यूं ही उपेक्षित न छोड़ा जाए और न ही एक आपदा के बाद दूसरी आपदा की प्रतीक्षा की जाए। अब यह नितांत आवश्यक है कि हिमालयी राज्यों के हालात और वैश्विक स्तर पर हो रहे पर्यावरणीय परिवर्तनों को समग्र रूप से देखा जाए। केवल राज्य का दर्जा मिल जाने से सामाजिक और आर्थिक प्राथमिकताओं को तो स्थान मिल सकता है, परंतु जहां तक पारिस्थितिकी तंत्र का सवाल है, पूरे हिमालयी क्षेत्र को साथ लेकर, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को समझते हुए, कुछ नए और ठोस कदम उठाने की जरूरत है। इन मुद्दों पर नए सिरे से गंभीरता दिखानी होगी।


भविष्य के लिए कौन-से नीतिगत निर्णय लेने हैं, क्या समझ विकसित करनी है और किन सीमाओं को निर्धारित करना है-इन सब में केंद्र ही निर्णायक भूमिका निभा सकता है। राज्य अपने स्तर पर काम कर सकते हैं, पर केंद्र द्वारा तय की गई दिशा ही उनकी दशा सुधारने में प्रभावी साबित होगी। लंबे समय से इस बात की दरकार है कि प्रधानमंत्री स्वयं इस विषय का संज्ञान लें, इस पर गहन चर्चा हो और सभी हिमालयी राज्यों की पारिस्थितिकी को लेकर एक साझा समझ विकसित की जाए। अन्यथा, ऐसी घटनाएं लगातार घटती रहेंगी और राज्यों को मिले विशेष दर्जे का भी कोई औचित्य नहीं रह जाएगा, क्योंकि दशाएं बद से बदतर होती चली जाएंगी और तथाकथित विकास भी दिशाहीन हो जाएगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed