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इमारतें नहीं, व्यवस्था गिर रही है: सत्य निकेतन के बाद सवाल- जिम्मेदार कौन?

Thu, 10 Sep 2026 07:59 AM IST
नितिन गौतम पुष्पेंद्र चौहान, अमर उजाला
पुष्पेंद्र चौहान, अमर उजाला Published by: नितिन गौतम Updated Thu, 10 Sep 2026 07:59 AM IST
सार

भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी इमारतों के गिरने से मरने वालों के जीवन की क्या कोई कीमत नहीं? हर बार जांच व कार्रवाई के बाद हालात पहले जैसे क्यों हो जाते हैं?

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Delhi building collapse - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली के सत्य निकेतन में हुए हादसे के बाद फिर वही सवाल उठ खड़ा हुआ है कि भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी इन इमारतों के गिरने पर जान गंवाने वालों के जीवन की क्या कोई कीमत नहीं है। एक के बाद एक ऐसे हादसे होते चले जा रहे हैं और हर बार जांच रिपोर्ट और चंद अफसरों पर विभागीय कार्रवाई के बाद हालात फिर पहले जैसे हो जाते हैं। सवाल यह भी कि क्या इस बार हालात सुधारने के लिए सरकार गंभीर है।
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दिल्ली के ललिता पार्क में 2010 में इस तरह के हादसे में 71 लोगों की जान गई, ग्रेटर नोएडा के शाहबेरी में नौ लोगों की मौत हुई, कोचिंग सेंटर में आग लगने और पानी भरने से भी मौतें हुईं। तब भी तमाम जांचें व सरकारी दावे हुए, लेकिन साल दर साल हादसे और अवैध निर्माण बढ़ते ही रहे। जिन पर जान-माल की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी, उन पर कानूनी कार्रवाई नहीं हुई। क्या अधिकारियों पर इन मौतों की जिम्मेदारी नहीं थी? कानूनी दायरे में नहीं आने का ही नतीजा है कि सरकारी तंत्र आंखें मूंदे रहता है और अवैध तरीके से इमारतें बनती जा रही हैं। अवैध निर्माण पर नजर रखने की जिम्मेदारी नगर निगम की तो है, पर बिजली, पानी-सीवर का कनेक्शन देने वाले विभाग और पुलिस क्या करती है? क्या यह देखना इन विभागों का काम नहीं है कि जो संसाधन 10 लोगों के लिए उपलब्ध करवाए गए, अगर उनका इस्तेमाल 100 लोग करने लगेंगे, तो व्यवस्था पर कितना बोझ बढ़ेगा।
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दिल्ली-एनसीआर के शहरों में भ्रष्टाचार का गठजोड़ देश के अन्य हिस्सों से अलग है। रहने के लिए छत की जरूरत इतनी ज्यादा है कि इसके लिए हर कानून को ताक पर रख दिया जा रहा है। यह गठजोड़ इलाके में निर्माण करवाने वाले ठेकेदार बनाते हैं, जो पहले मकान मालिक को तैयार करते हैं, फिर पुलिस-प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारियों को उनका हिस्सा पहुंचाकर बेफिक्र होकर निर्माण शुरू कर देते हैं। हर अवैध निर्माण की कीमत तय है। स्थानीय नेता इस गठजोड़ को संरक्षण देते हैं। हर जगह यही सिंडिकेट काम कर रहा है। कई जगहों पर तो नेताओं और उनके लोगों ने ही किराये के लिए कई-कई मकान बनवा रखे हैं। ठेकेदार कहने के लिए निर्माण करवाते हैं। इनका मुख्य काम बिचौलिये का होता है।
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बेहतर भविष्य बनाने के लिए अलग-अलग हिस्सों से युवा नौकरी करने, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने से लेकर पढ़ाई करने तक के लिए राष्ट्रीय राजधानी का रुख करते हैं। ऐसे में कच्ची-पक्की, दोनों तरह की आवासीय कॉलोनियां धीरे-धीरे स्टूडेंट्स का हब बनती जा रही हैं। रिहायशी इलाकों में एक के बाद एक पीजी खुलते जा रहे हैं। दिल्ली-एनसीआर में किराये का कारोबार बहुत बड़ा है। यहीं से अवैध निर्माण की बुनियाद तैयार होती है। जहां तीन मंजिलों की अनुमति है, वहां पांच मंजिला इमारतें बना दी जा रही हैं। इमारत के पिलर कितने मजबूत हैं, पिलर हैं भी या नहीं, कोई जांचने-परखने वाला नहीं है। इस तरह के हादसों में संबंधित अधिकारियों पर कानूनी कार्रवाई नहीं होती, तो वे भी आंखें मूंदे रहते हैं। कई बार लालच में आकर, तो कई बार राजनीतिक वजहों से।

समस्या केवल भ्रष्टाचार की नहीं है। हमारी शहरी नियोजन व्यवस्था भी इसका मुख्य कारण है। बड़े-बड़े निजी विश्वविद्यालय खुल रहे हैं, लेकिन पर्याप्त संख्या में हॉस्टल नहीं हैं। नोएडा का ही उदाहरण ले लें। नौकरी के लिए यहां आने वाले निम्न आय वर्ग के लोग कहां रहेंगे, इस पर कोई योजना नहीं है। नतीजतन, डूब क्षेत्र में हिंडन और यमुना के किनारों पर बड़ी संख्या में कच्ची कॉलोनियां बसा दी गईं। इसमें भी भ्रष्टाचार के गठजोड़ ने ही काम किया। गांवों में रहने वाले स्थानीय लोग धीरे-धीरे अपने पुश्तैनी घर छोड़कर अच्छे रिहायशी इलाकों में शिफ्ट हो गए और गांव में अधिकांश किरायेदार ही बचे।

अब सवाल यह है कि इसका समाधान क्या हो सकता है। सबसे पहले, जिम्मेदारों पर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान हो। चरणबद्ध तरीके से इमारतों के स्ट्रक्चरल ऑडिट की एक दीर्घकालिक परियोजना पर काम और पुरानी व जर्जर कॉलोनियों का पुनर्विकास हो। नए निर्माण की सूचना निगम या संबंधित निकाय को देना अनिवार्य किया जाए। पर्याप्त संख्या में हॉस्टल बनाए जाएं। शिकायत दर्ज कराने के लिए ऑनलाइन व्यवस्था हो और उस पर समय-सीमा में कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही, पीजी और गेस्ट हाउस के लिए लाइसेंसिंग व्यवस्था को सख्त बनाया जाए और इनसे जुड़ी सभी जानकारी एक सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराई जाए।


जंतर-मंतर पर हुए जेन-जी आंदोलन और सत्य निकेतन हादसे के बाद सरकार अब अलर्ट मोड में नजर आ रही है, क्योंकि इस बार मामला कॉलेज स्टूडेंट्स से जुड़ा हुआ है। सरकार को भी समझ आ रहा है कि अगर अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आगे चलकर इसके परिणाम उसके पक्ष में नहीं रहेंगे। स्वाभाविक है कि जेन-जी नई ताकत के रूप में एक बड़ा वर्ग बनकर उभरा है, जिसकी सभी राजनीतिक दलों को जरूरत है।
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