फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Politics of Hindi protest

हिंदी विरोध की राजनीति

Thu, 22 Mar 2018 06:30 PM IST
उमेश चतुर्वेदी
उमेश चतुर्वेदी Updated Thu, 22 Mar 2018 06:30 PM IST
विज्ञापन
Politics of Hindi protest
उमेश चतुर्वेदी

राजनीति की आपाधापी के बीच कुछ घटनाएं महत्वपूर्ण होते हुए भी हमारा ध्यान नहीं खींच पातीं। हाल के दिनों में ऐसी ही दो घटनाएं घटीं, जिनकी तरफ कायदे से उन लोगों का तो ध्यान जाना ही चाहिए था, जो अपनी माटी और अपनी भाषा की नींव पर राजनीतिक ही नहीं, सांस्कृतिक विकास चाहते हैं। दुर्भाग्यवश इन दोनों घटनाओं की तरफ ध्यान नहीं दिया गया। जबकि दोनों का रिश्ता राष्ट्रीय अस्मिता के साथ ही भारतीय सोच से जुड़ा हुआ है।


loader

सत्रह मार्च को मेघालय विधानसभा के मौजूदा बजट सत्र की शुरूआत हुई। जैसा कि संसदीय लोकतंत्र की रवायत है, बजट सत्र की शुरुआत राज्यपाल के अभिभाषण से होती है, वैसा ही मेघालय में हुआ। लेकिन साठ सदस्यीय विधानसभा में विपक्षी कांग्रेस के सभी 21 विधायकों ने बजट सत्र का बहिष्कार कर दिया। आमतौर पर विपक्ष बजट सत्र का बहिष्कार सरकारी पक्ष द्वारा गलतबयानी या किसी खास इलाके में विकास को तवज्जो न देने जैसे मुद्दे पर करता है। लेकिन वहां विपक्ष की नाराजगी की वजह रही राज्यपाल गंगा प्रसाद द्वारा हिंदी में अभिभाषण पढ़ना। संविधान देश की राजभाषा के तौर पर हिंदी को मान्यता देता है, तो देता रहे, जिस हिंदी को देश की सांविधानिक राजभाषा बनवाने के लिए महात्मा गांधी, काका कालेलकर, पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे नेताओं ने योगदान दिया हो, उसमें मेघालय के राज्यपाल ने भाषण देकर जैसे गुनाह कर दिया। विपक्ष का आरोप था कि मेघालय के 42 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब राज्यपाल ने अंग्रेजी के बजाय हिंदी में भाषण दिया है।
 
याद कीजिए यूपीए की दूसरी सरकार के शपथ ग्रहण को। इसी मेघालय राज्य की सांसद और मौजूदा सत्ताधारी दल नेशनलिस्ट पीपुल्स पार्टी की नेता अगाथा संगमा ने सबसे ज्यादा तालियां बटोरी थीं। इसकी वजह थी उनका स्पष्ट और साफ हिंदी में शपथ लेना। तब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तक ने ताली बजाकर अगाथा का उत्साह बढ़ाया था। वैसे यहां जानकारी के लिए बता देना चाहिए कि मेघालय की राजभाषा यहां की मूल भाषाएं खासी और गारो है। साथ में संपर्क के लिए अंग्रेजी को भी यह दर्जा दिया गया है। जिस उत्तर पूर्व में मेघालय आता है, वहां के लोगों की देश की राजधानी दिल्ली में भरमार है। वे यहां नौकरियां कर रहे हैं या पढ़ाई कर रहे हैं और उनकी हिंदी भी अच्छी है, फिर वहां के विधायक राज्यपाल के हिंदी अभिभाषण को स्वीकार क्यों नहीं कर पाते?

मेघालय की इस घटना के ठीक एक हफ्ता पहले नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिनिधि सभा ने हिंदी और भारतीय भाषाओं के विकास को लेकर प्रस्ताव पास किया। इस प्रस्ताव में संघ ने कहा, 'देश में प्रचलित विविध भाषाएं व बोलियां हमारी संस्कृति, उदात्त परंपराओं, उत्कृष्ट ज्ञान एवं विपुल साहित्य को अक्षुण्ण बनाए रखने के साथ ही वैचारिक नवसृजन के लिए भी परम आवश्यक हैं। विविध भाषाओं में उपलब्ध लिखित साहित्य की अपेक्षा कई गुना अधिक ज्ञान गीतों, लोकोक्तियों तथा लोक कथाओं आदि की मौखिक परंपरा के रूप में होता है।'

पता नहीं, मेघालय के विपक्षी विधायकों को इस प्रस्ताव की जानकारी थी या नहीं, लेकिन उन्होंने राज्यपाल के हिंदी अभिभाषण को संघ और भारतीय जनता पार्टी से जरूर जोड़ दिया। पता नहीं, वे विधायक यह जानते हैं कि नहीं कि आजादी के तुरंत बाद जब बीबीसी ने गांधी से प्रतिक्रिया मांगी थी, तो उन्होंने कहा था, 'पूरी दुनिया से कह दो, गांधी अंग्रेजी नहीं जानता।' 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed