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टाइम मशीन: महंगाई का सूत्रधार ओपेक, तो सफर की शुरुआत करते हैं 1945 के वेनेजुएला से...

Sun, 15 Oct 2023 07:14 AM IST
Anshuman Tiwari अंशुमान तिवारी
Updated Sun, 15 Oct 2023 07:14 AM IST
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सार
दुनिया के 23 देशों का संगठन (13 ओपेक और अन्य 10) ओपेक प्लस जब चाहेगा तब पेट्रोल डीजल सस्ता होगा। तेल उद्योग हमेशा से चुनिंदा उत्पादकों की बादशाहत रहा है। कभी इस पर सात बहनें राज करती थीं, आज 23 देश की सुल्तानी है। आइए बैठते हैं टाइम मशीन में और चलते हैं 1945 के वेनेजुएला में...
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OPEC controlling petrol-diesel price and architect of inflation, journey start from Venezuela in 1945
Crude Oil

विस्तार

2023 का सितंबर बीतते बीतते कच्चे तेल की कीमतें 95 डॉलर प्रति बैरल पर खौलने लगीं। 100 डॉलर के अनुमान तैरने लगे। तेल उत्पादकों के कार्टेल यानी ओपक प्लस से अपने मतभेद भुलाकर नए जोश के साथ तेल की महंगाई बढ़ाने में जुट गया था। सऊदी अरब की अगुआई में रूस और अन्य तेल उत्पादक अब उतना ही कच्चा तेल निकालेंगे जिस पर कीमतें उनकी मनमाफिक ऊंचाई पर रहें।


रूस तो खैर पश्चिमी का बैरी है। बीते बरस तक अमेरिका की तरफ से सऊदी अरब को समझाने की कोशिश होती थी। इधर जो बाइडन और सऊदी सुल्तान एमबीएस के बीच रिश्ते बिगड़ने के बाद अब कोई नहीं बोलता। दुनिया के 23 देश (13 ओपेक और अन्य 10) ओपेक प्लस जब चाहेगा तब पेट्रोल डीजल सस्ता होगा।


तेल उद्योग हमेशा से चुनिंदा उत्पादकों की बादशाहत रहा है। कभी इस पर सात बहनें राज करतीं थीं, आज 23 देश की सुल्तानी है। आइए बैठते हैं टाइम मशीन में और चलते हैं 1945 के वेनेजुएला में...जब एक पत्रकार के जरिये दो तेल मंत्रियों की एक छोटी-सी मुलाकात ने कच्चे तेल का पूरा बाजार ही पलट दिया।  

इस कहानी के पहले नायक जुआन पाब्लो पेरेज अल्फांजो वेनेजुएला के समृद्ध परिवार से आते थे। उन्हें कारकस के छात्र आंदोलनों ने गढ़ा था। वेनेजुएला में जनरल जुआन विसेंट गोमेज की तानाशाही के खिलाफ चले आंदोलनों का हिस्सा थे पेरेज अल्फांजो। 1945 में पहली लोकतांत्रिक सरकार में वह विकास मंत्री थे। उन्होंने कच्चे तेल उत्पादन पर टैक्स घटाया था। पेरेज अल्फांजो ने ही यह तय किया कि वेनेजुएल में तेल निकालने वाली विदेशी कंपनियां अपना आधा मुनाफा देश में रखेंगी।

वेनेजुएला में 1948 में सैन्य तख्तापलट हुआ। अल्फांजो को जेल भेज दिया गया। जेल से छूटे तो पेरेज अल्फांजो को अमेरिका और मेक्सिको में निर्वासन की सजा मिली। अल्फांसो ने इस सजा को मौके में बदला और दुनिया की तेल अर्थव्यवस्था को गहराई से समझना शुरू किया। उस वक्त रेल रोड कमीशन ऑफ टेक्सस अमेरिका में तेल उद्योग का नियामक था। अल्फांजो ने इसके कामकाज का अध्ययन किया। 1958 में वेनेजुएअला में सत्ता बदली। पेरेज अल्फांजो खनन और हाइड्रोकार्बन मंत्री बने।

अब आते हैं इस कहानी के दूसरे चरित्र। यानी शेख अब्दुल्लाह इब्न हामूद अल तारीकी। उनके वालिद सऊदी अरब और कुवैत के बीच ऊंटों का कारोबारी कारवां चलाते थे। तारीकी ने टेक्सस में पेट्रोलियम टेक्नोलॉजी पढ़ी थी। 1948 में वह सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय में अफसर हो गए। 1954 में उन्हें पेट्रोलियम मामलों का डायरेक्टर जनरल बना दिया गया। उनका काम था तेल कंपनी अरामको से मिली सूचनाओं का विश्लेषण करना। अरामको तब अरब व अमेरिकी कंपनियों का विशाल कंसोर्टियम थी। 1960 में पहली बार सऊदी अरब में पेट्रोलियम मंत्रालय बना तो अब्दुल्लाह तारीकी उसके मंत्री थे। 1960 ही वह साल था जब बगदाद में ओपेक का गठन हुआ, जो दुनिया के इतिहास में अपनी तरह पहला वाकया था।

दरअसल, 1960 से पहले का तेल बाजार सात ग्लोबल तेल कंपनियों के कब्जे में था। पहली थी एंग्लो इरानियन ऑयल कंपनी जो आज की बीपी है। दूसरी थी रॉयल डच शेल जो आज शेल है। तीसरी थी स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ कैलीफोर्निया जिसे आज शेवरॉन के नाम से जाना जाता है। चौथी कंपनी थी गल्फ ऑयल जो अब शेवरॉन समूह का हिस्सा है। पांचवीं थी। टेक्सको इसका भी शेवरॉन में विलय हो गया है। छठी कंपनी थी स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ न्यूजर्सी या एस्सो जो अब एक्जॉन मोबिल का हिस्सा है और स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ न्यूयार्क सातवीं कंपनी थी जिसे बाद में एक्जॉन मोबिल में मिला दिया गया
इन्हंे सेवन सिस्टर्स कहा जाता था। वैसे यह नाम इन्हें इटली के उद्योगपति एनरिको मैट्टी ने दिया था। एनरिको मैट्टी, बेनिटो मुसोलिनी के फासिस्ट शासन के विरोधी थे। वह तेल उद्योग पर इन सात यूरोपीय अमेरिकी कंपनियों के कब्जे के भी खिलाफ थे। मैट्टी ने इटली की प्रमुख ऊर्जा कंपनी एनी की स्थापना की थी जो आज करीब 13 अरब यूरो का कारोबार करती है।

1950 के दशक में मध्य पूर्व व खाड़ी देशों में राजनीतिक तूफान उठ रहे थे। ब्रिटेन और फ्रांस की उपनिवेशवादी ताकत कमजोर पड़ रही थी। सोवियत रूस और अमेरिका के बीच शीत युद्ध चरम पर था। 1956 में इजिप्ट के राष्ट्रपति अब्दुल गमाल नासिर ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया था।

ब्रिटेन, फ्रांस और इस्राइल के साझा सैन्य दखल के बावजूद नासेर गुटनिरपेक्ष दुनिया के नए हीरो बने। इधर इराक में हश्मत सल्तनत के खिलाफ बगावत हो गई थी। ब्रिटिश समर्थन से चल रही सुल्तानी को वामपंथी बाथ पार्टी के कुछ सैन्य अफसरों ने उखाड़ फेंका था। सद्दाम हुसैन इसी बाथ पार्टी के झंडे से इराक के राष्ट्रपति बने थे। इस उलट फेर के बीच सेवेन सिस्टर्स मनमाना तेल बाजार चला रही थीं। इन कंपनियों के पास अकूत ताकत थी। अरब राजस्व के लिए इनके मोहताज थे। इसलिए इनकी तानाशाही का विरोध बढ़ रहा था।

अब शुरू होता है तेल बाजार का असली खेल
निकिता ख्रुश्चेव के नेतृत्व में रूस का तेल का उद्योग तेजी से आगे बढ़ने लगा। 1955 में रूस का सस्ता कच्चा तेल बहुत बड़ी मात्रा में बाजार में आने लगा। तेल की बहुतायत थी, कीमतें टूट रही थीं। सेवेन सिस्टर्स गहरे नुकसान में आ गईं। बाजार में बने रहने के लिए फरवरी 1959 में बीपी के नेतृत्व में तेल कंपनियों ने अरब लाइट क्रूड और वेनेजुएला के क्रूड की कीमत में बड़ी कटौती का एलान कर दिया। इसका नुकसान तेल उत्पादक देशों को होना था। उनकी कमाई कम होने वाली थी।  

सऊदी अरब और वेनेजुएला की सरकारें गुस्से से खौल उठीं। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहॉवर ने एक और पैंतरा चल दिया। घरेलू तेल को ज्यादा बाजार देने के लिए व्हाइट आउस ने वेनेजुएला से तेल इंपोर्ट में कटौती कर दी।

तेल उत्पादक देशों को नुकसान होने लगा। अप्रैल 1959 में इजिप्ट के कैरों में अरब पेट्रोलियम कांग्रेस हुई। यहां सेवेन सिस्टर्स के नुमाइंदे भी मौजूद थे। तेल उत्पादकाें का दो टूक प्रस्ताव था कि तेल उनका है इसलिए कीमतें तय करने में उनकी भूमिका होनी चाहिए।

वेनेजुएला के तेल मंत्री पेरेज अल्फांजो इस मौके की फिराक में थे। वह तेल उत्पादक देशों का एक समूह बनाकर कंपनियों की मनमानी को खत्म करना  चाहते थे। अल्फांजो वेनेजुएला की नुमाइंदगी करने कैरों की कांफ्रेंस में पहुंचे। सऊदी अरब के तेल मंत्री अब्दुल्लाह तारीकी से उनकी पहली मुलाकात यहीं हुई।  

प्रसिद्ध लेखक डेनियल येरगिन ने अपनी किताब द प्राइज में लिखा है। तारीकी और अल्फांजो की मुलाकात पत्रकार वांडा जाब्लोंस्की ने कराई थी, जो उस वक्त की सबसे प्रभावी ऑयल करेस्पांडेंट यानी तेल पत्रकार थीं। इधर एक तरफ कैरों की कांफ्रेस चल रही थी तो दूसरी तरफ शहर से बाहर एक गुप्त स्थान पर तारीकी और अल्फांजो ने अरब लीग व वेनेजुएला का एक नया संगठन बना लिया। यह ओपेक का शिलान्यास था।

तेल कंपनियां कीमतें न बढ़ाने की जिद पर अड़ी थीं। रूस का सस्ता तेल बाजार तोड़ रहा था। अगस्त 1960 में एक्जॅान ने मध्य पूर्व और सऊदी के क्रूड की कीमत फिर कीमत घटा दी। अरब देशों का गुस्सा फट पड़ा। अल्फांजो और तारीकी ने अलग-अलग देशों को तार भेजने शुरू किए। अगस्त में बगदाद में बैठक लगी, जिसमें सऊदी अरब, कुवैत, वेनेजुएला, इराक के अलावा ईरान भी था। ईरान के शाह अमेरिका के करीब माने जाते थे लेकिन तेल गठजोड़ उनके भी फायदे का था।

अब तेल देशों के कार्टेल यानी ओपेक का गठन हो गया था। 1961 में काराकस की ओपेक बैठक में अन्य औपचारिकताएं पूरी कर ली गईं। अब सरकारें कीमतों पर फैसला लेने लगीं। 1970 तक सेवेन सिस्टर्स को कारोबार समेटना पड़ा। ओपेक ने तेल कीमतों को निर्धारित स्तर से ऊंचा रखने के लिए कोटा तय करना शुरू कर दिया।

तेल कार्टेल के साठ साल के इतिहास में सदस्यों की संख्या घटती-बढ़ती रही। बाद में इसमें रूस भी आ गया और यह बन गया ओपेक प्लस। तेल उत्पादकों का यह कार्टेल हमेशा एकमत रहा है कि कच्चा तेल एक सीमा से अधिक सस्ता नहीं होना चाहिए। आज भी ओपेक उस जिद पर कायम है जिस पर उसे गढ़ा गया था। मिलते हैं टाइम मशीन के अगले सफर पर।

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