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जानना जरूरी है: भगवान विष्णु का शयन और उत्थान... श्रीहरि के योगनिद्रा से जागते ही सृष्टि में पुनः गति आती है

Sun, 06 Sep 2026 09:56 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 06 Sep 2026 09:56 AM IST
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Mythology slumber and awakening of Lord Vishnu after Shri Hari Yoganidra cosmos springs back into motion
भगवान विष्णु का शयन और उत्थान - फोटो : अमर उजाला प्रिंट-ग्राफिक्स

भगवान विष्णु के शयन का जब समय आता है, तब वह वैकुंठ धाम में स्थित अपने नारायणाश्रम में प्रवेश करते हैं। वहां पहुंचकर वह अपने सभी आयुधों का त्याग कर देते हैं। उनका शयनागार समुद्र के समान विशाल और दिव्य है। देवताओं और असुरों के लिए भी वहां पहुंचना अत्यंत कठिन है। वहां सूर्य, चंद्रमा और वायु की भी पहुंच नहीं है। भगवान पद्मनाभ के सच्चिदानंदमय स्वरूप की दिव्य ज्योति ही उस धाम को प्रकाशित करती है।

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जो भगवान विराट स्वरूप में संपूर्ण जगत को धारण करते हैं, वही अब वहां पहुंचकर समस्त प्राणियों की कर्मवासनाओं को अपने भीतर समेटकर विश्राम करने लगते हैं। योगनिद्रा उनकी सेवा में उपस्थित होती है। भगवान समुद्र और मेघों के जल से शीतल दिव्य शय्या पर शयन करते हैं। उनके इस शयन को उस महान प्रलयकाल से जोड़ा गया है, जब संपूर्ण संसार एकार्णव में विलीन हो जाता है और केवल भगवान नारायण ही शेष रहते हैं। शयन करते हुए भगवान की नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट होता है। सूर्य के समान चमकने वाला वह सहस्रदल कमल ब्रह्मा जी का आसन बनता है। भगवान स्वयं योगनिद्रा में होते हुए भी सृष्टि के समस्त कार्यों का संचालन करते रहते हैं। उनके भीतर स्थित कर्म-संस्कार मानो सृष्टि के पुनः आरंभ होने का संकेत देते हैं। उनके मुख से निकलने वाली श्वास से विभिन्न प्रकार की प्रजा उत्पन्न होती रहती है, जो अपने-अपने निर्धारित कर्म और धर्म का पालन करती है।
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भगवान विष्णु की यह योगनिद्रा साधारण निद्रा नहीं है। उनके इस रहस्यमय स्वरूप को स्वयं ब्रह्मा जी और महान ब्रह्मर्षि भी पूरी तरह नहीं समझ पाते। वे यह जानने में असमर्थ रहते हैं कि परमात्मा कब जागते हैं, कब सोते हैं और कब बिना किसी बाहरी चेष्टा के भी संपूर्ण जगत का संचालन करते हैं। देवता भी उनके जन्म, कर्म और स्वरूप के रहस्य को जानने का प्रयास करते रहते हैं, किंतु उनकी लीला का कोई अंत नहीं पा सकते। 

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  • भगवान विष्णु ही वेद, यज्ञ और यज्ञ के सभी अंग हैं। यज्ञों के माध्यम से जिस परम गति की प्राप्ति बताई गई है, वह भी उन्हीं पुरुषोत्तम भगवान की प्राप्ति है।
  • उनके शयनकाल में मंत्रों से पवित्र यज्ञकर्मों का अनुष्ठान नहीं किया जाता। जब शरद ऋतु में भगवान मधुसूदन जागते हैं, तब वाजपेय आदि यज्ञों का पुनः आरंभ होता है।

प्रभु के शयनकाल में देवराज इंद्र प्रजापालन का कार्य संभालते हैं और वर्षा ऋतु से संबंधित उपाकर्म, श्राद्ध तथा तर्पण आदि कर्म करवाते हैं। प्रभु की योगनिद्रा से जुड़ी माया ही संसार में सामान्य निद्रा के रूप में भी दिखाई देती हैं। यह तमोमयी शक्ति रात्रि और अंधकार के रूप में प्राणियों को अपने प्रभाव में ले लेती है। मनुष्य दिनभर के परिश्रम के बाद निद्रा में चला जाता है और कुछ समय के लिए संसार की चिंताओं से मुक्त हो जाता है। सामान्य निद्रा जागने के बाद समाप्त हो जाती है, किंतु मृत्यु के समय यही शक्ति प्राणों का अंत करने वाली बन जाती है। श्रीनारायण के अतिरिक्त कोई भी देवता इस शक्ति को पूरी तरह धारण करने में समर्थ नहीं है। भगवान के शरीर से प्रकट हुई यह माया काल की सहचरी और संसार के मोह का कारण है। फिर भी, श्रीहरि योगनिद्रा को अपने ऊपर धारण करते हैं, क्योंकि उनके शयन में भी लोककल्याण का उद्देश्य छिपा हुआ है। सृष्टि के विशाल चक्र में एक समय ऐसा आता है, जब संसार को विश्राम मिलता है। प्रभु का शयन उसी महान विश्राम का प्रतीक है।



युग बीतते जाते हैं और भगवान अपनी योगनिद्रा में स्थित रहते हैं। अंततः जब द्वापर युग का अंत निकट आता है और समस्त लोक अत्यंत दुख से पीड़ित हो जाते हैं, तब महर्षि भगवान की स्तुति करते हैं। ऋषियों की प्रार्थना और संसार के कष्ट को देखकर भगवान श्रीहरि योगनिद्रा से जाग उठते हैं। उनके जागते ही सृष्टि में पुनः गति आती है और वह धर्म की स्थापना तथा संसार का भार कम करने के लिए सक्रिय होने को उद्धत हो जाते हैं। 

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