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भौतिक शरीर को मानसिक शरीर से जोड़ना योग है

Sun, 21 Jun 2020 05:08 AM IST
BKS Iyengar बीकेएस आयंगर
Updated Sun, 21 Jun 2020 05:08 AM IST
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Linking physical body with mental body is yoga
yoga - फोटो : pixabay

आसन का उद्देश्य हमारे भौतिक शरीर और उसके विभिन्न स्तरों को भावनात्मक, मानसिक और आध्यात्मिक शरीर से जोड़ना और उन्हें एकमेव करना है। यही जुड़ाव या योग है। पर कोई शरीर और मन के इन विभिन्न स्तरों को जोड़कर जुड़ाव का एहसास कैसे कर सकता है? इस तरह के रूपांतरण को कोई किस तरह हासिल कर सकता है? यह जागरूकता से आता है। हम जानते हैं कि हमारे मस्तिष्क में बुद्धिमता और धारणा की जगह है। लेकिन योग हमें उस जागरूकता और बुद्धिमता के बारे में सिखाता है, जो हमारे शरीर को रूपांतरित करता है।


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आदर्श स्थिति यह है कि शरीर के हर हिस्से में बुद्धिमता हो। इसके लिए हमें शरीर और मन के बीच गठजोड़ स्थापित करना होगा। जब शरीर के इन दो हिस्सों में तालमेल नहीं होता, तो यह विखंडन और बीमारी की ओर ले जाता है। उदाहरण के लिए, हमें सिर्फ तभी भोजन करना चाहिए, जब हमारे मुंह से लार स्वतःस्फूर्त रूप से निकलता हो। यह लार हमारे शरीर का दिमाग है, जो भूख लगने के बारे में बताता है। लार न निकलने की स्थिति में खाना जबरन भोजन करना है, जिससे बीमारी अनिवार्य है।

बहुतेरे आधुनिकतावादी अपने शरीर का इतना कम इस्तेमाल करते हैं कि वे अपनी शारीरिक जागरूकता से संबंधित संवेदना की पहचान तक खो देते हैं। उनकी आवाजाही बिस्तर से कार, कार से डेस्क, डेस्क से कार, कार से काउच, फिर काउच से बिस्तर तक सीमित है। लेकिन उनकी आवाजाही में, दैनिक गतिविधियों में कोई जागरूकता, कोई बुद्धिमता नहीं होती। उनमें कोई सक्रियता नहीं होती। सक्रियता दरअसल ऐसी गतिविधि है, जिसमें बुद्धिमता होती है। यह दुनिया गतिविधियों से भरपूर है। लेकिन इस दुनिया को ज्यादा सक्रियता, ज्यादा सजग गतिविधियों की जरूरत है।

योग हमें सिखाता है कि हम अपनी गतिविधियों में बुद्धिमता लाकर इसे सक्रियता में कैसे रूपांतरित करें। आसनों में जो सक्रियता होती है, वह हमें बुद्धिमता की ओर प्रेरित करती है। जब हम कोई नया आसन शुरू करते हैं, और शरीर का कोई हिस्सा बगैर हमारी अनुमति के किसी खास तरफ मुड़ता है, तब मस्तिष्क सवाल करता है कि यह सही है या गलत। अगर यह गलत है, तो मैं इसे बदलने के लिए क्या करूं?

अपनी गतिविधियों को बौद्धिक सक्रियता में हम कैसे बदलें? आसन इस मामले में हमें बहुत कुछ सिखा सकते हैं। आसनों के जरिये हम ऐसी गहन संवेदना विकसित कर सकते हैं, जिससे कि हमारी त्वचा का हर हिस्सा भीतरी आंख की तरह काम करे। आसनों के जरिये हम त्वचा और मांस के बीच संवेदनशील संपर्क विकसित कर सकते हैं। इन आंतरिक आंखों के जरिये हम अपने शरीर को संतुलित कर सकते हैं। यह हमारी दो आंखों के जरिये देखने से अलग किस्म का अनुभव है। ऐसे में, हम अपने शरीर की स्थिति को साफ-साफ महसूस कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए, जब आप वारियर पोज में अपने हाथों को फैलाकर खड़े होते हैं, तब आप अपने हाथों की उंगलियों को देखने के अलावा उनका एहसास भी कर सकते हैं। यही नहीं, आप उंगलियों के अवस्थान के बारे में भी ठीक-ठीक जान सकते हैं। ऐसी स्थिति में आप बगैर आईना देखे पांव के बारे में जान सकते हैं कि वे सीधे हैं या मुड़े हुए हैं। आप अपनी आंख को क्षण भर के लिए मोड़कर या घुमाकर अपने शरीर को व्यवस्थित और संतुलित कर सकते हैं। इस तरह आसनों के जरिये आप अपने शरीर में जागरूकता ला सकते हैं और उसे बौद्धिक सक्रियता से भरपूर कर सकते हैं।

आसनों के जरिये इस बौद्धिकता की उपस्थिति आपके शरीर में सर्वत्र होनी चाहिए। जैसे ही आप अपनी त्वचा की संवेदना के एहसास से वंचित होते हैं, आसन निष्प्रभावी हो जाता है और शरीर में बिजली की तरह बौद्धिकता की मौजूदगी भी जाती रहती है। शरीर की संवेदनशील जागरूकता, मस्तिष्क की बौद्धिकता और हृदय के बीच तालमेल की आवश्यकता है। मस्तिष्क शरीर को आसन की एक मुद्रा के बारे में आदेश देता है, लेकिन हृदय को भी इसका एहसास होना चाहिए। बौद्धिकता की जगह हमारे सिर में बताई जाती है, जबकि भावना की जगह हृदय में है। इन दोनों को शरीर के साथ तालमेल बनाकर काम करना होगा।

शारीरिक बौद्धिकता एक तथ्य है। यह वास्तविकता है। जबकि मस्तिष्क में बौद्धिकता का होना कल्पना है। ऐसे में, आसनों के जरिये हमें कल्पना को वास्तविकता में बदलना होगा। लेकिन इसके लिए शरीर और मस्तिष्क के बीच तालमेल होना आवश्यक है। मस्तिष्क कह सकता है, 'हम यह कर सकते हैं।' लेकिन घुटना कहता है, 'तुम मुझे आदेश देने वाले होते कौन हो? यह मैं तय करूंगा कि मैं यह कर सकता हूं या नहीं।' इसलिए हमें अपने शरीर को सुनना होगा। कई बार शरीर हमारे साथ सहयोग करता है, तो कई बार नहीं करता। संतुलन बनाने के लिए हम अपनी बौद्धिकता का इस्तेमाल कर सकते हैं।

शरीर के ज्ञान के बारे में शब्दों में कुछ पाना कठिन है। इसकी तुलना में इसका एहसास कर पाना आसान है। यह एहसास ऐसे होता है, जैसे कि आपके शरीर से निकलती बौद्धिकता की रोशनी आपकी बांहों, हाथ की उंगलियों और पैरों से होते हुए पैरों के भीतर तक जाती है। जब ऐसा होता है, तब शरीर निष्क्रिय-सा होकर आराम करने की मुद्रा में आ जाता है। लेकिन यह निष्क्रियता निरर्थक और सुस्त करने वाली नहीं होती। यह चौकन्नापन मस्तिष्क को ऊर्जस्वित और शरीर को शुद्ध करता है।  -लाइन ऑन लाइफ : द योगा जर्नी टू होलनेस, इनर पीस, ऐंड अल्टीमेट फ्रीडम के संपादित अंश।

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