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चौंतीस साल बाद न्याय
तवलीन सिंह
Updated Sun, 25 Nov 2018 07:32 PM IST
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तवलीन सिंह
जब न्याय मिलने में चौंतीस साल बीत जाएं, तो न्याय शब्द अपमानित हो जाता है। पिछले सप्ताह जब दो हत्यारों को सिख नरसंहार के लिए दंडित किया गया, तब मुझे ऐसा लगा, जैसे उन सिख परिवारों के घावों पर नमक छिड़का जा रहा है, जो अभी तक अपने उन परिजनों के लिए न्याय मांग रहे हैं, जिन्हें उनकी आंखों के सामने जिंदा जलाया गया था इंदिरा गांधी की हत्या के बाद। सरकार के अपने आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में तीन दिन के अंदर तीन हजार से ज्यादा सिख मारे गए थे। दो हत्यारों को दंडित करने के लिए चौंतीस साल लगे हैं, तो कब तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी बाकी पीड़ितों को? क्या कभी उन्हें भी न्याय मिलेगा? सवाल यह भी उठता है कि इतने बड़े नरसंहार के बाद इतने वर्षों तक न्याय क्यों नहीं मिला।
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इस सवाल का जवाब उस कांग्रेस पार्टी को तो देना ही चाहिए, जो अपनी धर्मनिरपेक्षता पर इतना गर्व करती है कि औरों पर सांप्रदायिकता का आरोप लगाने में कभी नहीं कतराती। लेकिन जवाबदेही हमारे न्यायाधीशों की भी बनती है। जब पीठों के चयन को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के जज साहिबान पत्रकारों को बुलाकर शिकायत कर सकते हैं, जैसे इस वर्ष की शुरुआत में उन्होंने की थी, तो पिछले चौंतीस साल में एक बार न्याय की रफ्तार को लेकर वे शिकायत नहीं कर सकते थे? न्याय प्रणाली की रफ्तार इतनी धीमी न होती, तो संभव है कि हमारे देश में हिंसा भी कम होती। अगर मोहम्मद इखलाक के हत्यारों को अभी तक दंडित कर दिया होता, तो लिंचिंग की वह बीमारी भी शायद रुक जाती, जो पिछले चार वर्ष में फैली है। न्याय का बहुत देर बाद मिलना ही देश में सांप्रदायिक हिंसा के अभी तक न रुकने का मुख्य कारण है।
माना कि नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में कोई बड़ा दंगा नहीं हुआ है, लेकिन यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि गोरक्षकों ने हिंसा का इतना भयानक वातावरण बना दिया है, जो एक तरह से दंगों से भी ज्यादा खतरनाक है। जब भी मुसलमानों से मेरी बातें होती हैं, तो वे बेझिझक कहते हैं कि मोदी के दौर में वे अपने आपको सुरक्षित महसूस नहीं कर सकते, क्योंकि कभी भी हिंसा हो सकती है। पिछले चार साल में मुस्लिमों और दलितों पर इतने हमले हुए हैं कि माना जाता है कि मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद गोरक्षा के नाम पर 97 फीसदी हिंसक हमले हुए हैं। पिछले वर्ष ईद के मौके पर भीड़ ने रेलगाड़ी में जुनैद की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी थी कि वह लिबास और शक्ल से मुसलमान दिखता था।
हिंसा जब इस तरह किसी देश की रगों में फैल जाती है, तो महामारी बन जाती है। सो कई गांवों में आजकल हिंदू भी हिंसक भीड़ के हाथों सिर्फ इसलिए मारे जाते हैं, क्योंकि यह अफवाह फैलाई जाती है कि वे बच्चों को अगवा करने आए हैं। इतने बड़े नरसंहार के बाद भी जब न्याय मिलने को चौंतीस वर्ष लगते हों, तब झल्लाहट में लोग कानून को अपने हाथ में लेने की गलती करते हैं।
हमारे सम्मानित न्यायाधीश इन दिनों कई मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त करते हैं। वे राजनेताओं को टोकने से नहीं कतराते। जब मौका मिलता है, पत्रकारों को डांट देते हैं। लेकिन न्याय प्रणाली की सुस्ती पर कम बोलते हैं। सो प्रधान न्यायाधीश से मैं विनम्रता से अर्ज करना चाहती हूं कि आप थोड़ा-सा अपना कीमती समय निकाल कर जांच तो करवाएं कि देशवासियों को न्याय मिलने में इतनी देर क्यों लगती है। इंटरनेट और डिजिटल क्रांति के इस दौर में हमारे न्यायालय आज भी बैलगाड़ी की चाल क्यों चलते हैं? न्याय जब चौंतीस वर्ष बाद मिलता है, तो क्या अन्याय नहीं बन जाता है?