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विश्व परिदृश्य: रूस और चीन की इस दोस्ती में वफा नहीं, सुदृढ है हमारे संबंधों का आधार

Wed, 22 May 2024 06:33 AM IST
Deepak Vohra दीपक वोहरा
Updated Wed, 22 May 2024 06:33 AM IST
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सार
रूस और चीन के बीच बढ़ती नजदीकी से भारत को परेशान होने की जरूरत नहीं है। रूस के साथ हमारी दशकों पुरानी परखी हुई दोस्ती है और हर जरूरत के वक्त रूस हमारे साथ खड़ा रहा है। भारत-चीन सीमा संघर्ष के तुरंत बाद भी रूस भारत को हथियार बेचने पर सहमत हो गया था।
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India does not need to worry about growing friendship between Russia and China
चीन-रूस - फोटो : ANI

विस्तार

इस साल फिर से रूस का राष्ट्रपति चुने जाने के बाद व्लादिमीर पुतिन अपनी पहली विदेश यात्रा पर चीन पहुंचे। आठ महीने में यह उनकी दूसरी चीन यात्रा है। रूस और चीन की इस बढ़ती नजदीकी को देखते हुए क्या भारत को चिंतित या निराश महसूस करना चाहिए? बिल्कुल नहीं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक के लाभ के बराबर दूसरे का नुकसान नहीं होता है।



रूस दुनिया का सबसे बड़ा देश है, जो दो महाद्वीपों-यूरोप और एशिया तक फैला है। एक विशाल पेंडुलम की कल्पना कीजिए। यह एक तरफ झुकता है, तो रूस यूरोप की ओर पश्चिम की तरफ देखता है तथा खुद को यूरोपीय सभ्यता का एक अपरिहार्य हिस्सा मानता है। जब पेंडुलम दूसरी दिशा में झुकता है, तो रूस पूर्व की तरफ देखता है तथा पश्चिमी सभ्यता एवं पश्चिमी मूल्यों की आलोचना करता है। फिर घोषणा करता है कि रूस का भविष्य एशिया में है। व्लादिमीर पुतिन के शासन में रूसी पेंडुलम पूर्व की ओर घूम गया है।


सोवियत संघ के विघटन के बाद के दशक में रूस मजबूती से पश्चिम की तरफ झुक गया था, यहां तक कि वह सोचने लगा था कि उसे यूरोपीय संघ और संभवतः नाटो में भी शामिल किया जा सकता है।  लेकिन रूस और चीन के बीच बढ़ती नजदीकी के लिए अमेरिकी नेतृत्व में पश्चिमी देश जिम्मेदार हैं। दोनों देशों को प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा। दोनों ने महसूस किया कि अकेले रहकर 80 साल पुरानी पश्चिमी तथाकथित ‘नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ को चुनौती नहीं दी जा सकती है, लेकिन अपनी शक्तियों को मिलाकर और एक-दूसरे से साझेदारी करके वे एक नई ‘वास्तविकता आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ का निर्माण कर सकते हैं। रूस के पास वह सैन्य प्रौद्योगिकी है, जिसे चीन बेसब्री से पाना चाहता था और रूस को चीनी धन की जरूरत थी। फिर दोनों के बीच नजदीकी बढ़ी और रचनात्मक साझेदारी असीमित मित्रता में तब्दील होने लगी।

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन पुतिन को 'हत्यारा तानाशाह' कहते हैं, जबकि चीनी राष्ट्रपति पुतिन के लिए बिल्कुल अलग भाषा का इस्तेमाल करते हैं। वर्ष 2022 में समरकंद में शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन से परे जब दोनों नेता मिले, तो शी जिनपिंग ने पुतिन को 'मेरे प्यारे पुराने दोस्त' कहा। व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग के बीच व्यक्तिगत रिश्ते बहुत प्रगाढ़ हैं। आज, चीन रूसी युद्ध मशीन के लिए दोहरे उपयोग वाले महत्वपूर्ण घटकों की आपूर्ति करता है, जिसमें मशीन टूल्स, ड्रोन और सेमीकंडक्टर चिप्स शामिल हैं। जब अमेरिका ने इस पर आपत्ति जताई, तो चीन ने कहा कि हम यूक्रेन संकट में पक्षकार नहीं हैं और चीन तथा रूस के बीच के सामान्य व्यापार में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। दोनों नेता बहु-ध्रुवीय दुनिया की वकालत करते हैं, जिसमें वे पश्चिम, विशेषकर अमेरिका का प्रतिकार करते हैं। साथ मिलकर, वे ईरान और सीरिया जैसे देशों के लिए एक व्यावहारिक विकल्प पेश कर सकते हैं, जो पश्चिम से ठगा हुआ महसूस करते हैं। ईरान के राष्ट्रपति की रहस्यमय तरीके से हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मौत ईरान को रूस के करीब ला सकती है।

तो क्या पुतिन और शी जिनपिंग हमेशा के लिए अच्छे मित्र बने रहेंगे? बिल्कुल नहीं। सबसे पहले, तो वैश्विक राजनीति में 'हमेशा के लिए अच्छे मित्र' दुर्लभ होते हैं। चीनी कम्युनिस्ट नहीं जानते कि लोगों को कैसे प्रभावित किया जाता है और दोस्त बनाए जाते हैं। वे बस दूसरों की निष्ठा का सौदा करना जानते हैं। कई अन्य राष्ट्रों की तरह रूस को भी पता है कि चीन के साथ काम करना दोधारी तलवार पर चलने जैसा है। वर्ष 2015 में इंटरनेट पर एक रूसी फिल्म चाइना-ए डेडली फ्रेंड (चीन-एक घातक मित्र) काफी लोकप्रिय हुई थी, जो रूस के सुदूर पूर्व में चीनी आक्रमण पर केंद्रित थी। कई रूसी मानते हैं कि यह एक भूराजनीतिक टाइम बम है। रूस-चीन दोस्ती में इस बात का बहुत ज्यादा एहसास होता है कि रूस चीन का कनिष्ठ सहयोगी है, जो रूस के लोगों को हजम नहीं हो सकता है।

वर्ष 2000 में पुतिन ने लिखा कि ‘रूस को हमेशा यूरेशियन देश होने का एहसास होता है, क्योंकि इसका मुख्य हिस्सा एशिया में है। इसलिए एशिया की ओर रुख करने का समय आ गया है।’ विजयी पश्चिम द्वारा अपमानित किए जाने के बाद हैरानी नहीं कि 2005 में राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में पुतिन ने कहा था कि ‘सोवियत संघ का पतन सदी की सबसे बड़ी भूराजनीतिक तबाही थी।’

चीन रूसी सैन्य तकनीक हासिल करने और कम आबादी वाले साइबेरिया में उसकी जमीन को हथियाने की ताक में था। उसने संघर्षरत रूसी अर्थव्यवस्था में अरबों डॉलर का निवेश किया, और रूसी तकनीक से अपनी दूसरी पीढ़ी के हथियारों को उन्नत बनाया। नतीजतन, दोनों के बीच मतलब की दोस्ती हुई। रूस-चीन की मित्रता के चलते शंघाई सहयोग संगठन का गठन हुआ, जिसमें भारत शामिल हुआ।

लेकिन रूस-चीन की बढ़ती दोस्ती से क्या भारत की रूस के साथ दोस्ती खतरे में है? क्या हमें रूस के साथ अपने रिश्ते को कमजोर करना चाहिए? बिल्कुल भी नहीं। सोवियत संघ और उसके उत्तराधिकारी फेडरेशन ऑफ रसिया जरूरत के वक्त हमेशा हमारे साथ खड़ा रहा है, चाहे वह कश्मीर पर पश्चिम प्रेरित प्रस्तावों को वीटो करना हो, या 1971 में अमेरिकी सातवें बेड़े को रोकने में मदद करना हो, या 1950-60 के दशक में हमारे स्टील एवं तेल उद्योगों के लिए टेक्नोलॉजी देने की बात हो, या परमाणु-संचालित पनडुब्बियों या परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के निर्माण सहित हमारी सेना को सर्वोत्तम हथियारों से लैस करना हो। रूस ने कभी हम पर प्रतिबंध नहीं लगाया, लेकिन पश्चिम ने ऐसा किया।

यूक्रेन के मुद्दे पर हमारे प्रधानमंत्री द्वारा सार्वजनिक रूप से यह कहने के अलावा कि यह युद्ध का नहीं, शांति का युग है, हमने अमेरिका या उसके ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे चाटुकारों की तरह रूस को नहीं कोसा। परिपक्व भारत अच्छी तरह से जानता है कि साझेदारी और वफादारी बदल सकती है, इसलिए हमने अमेरिका के साथ अपने रिश्ते में सुधार किया है। वर्ष 2020 के मध्य भारत-चीन सीमा संघर्ष के तुरंत बाद ही रूस भारत को हथियार बेचने पर सहमत हो गया था, और अमेरिकी आपत्तियों के बावजूद भारत को रूसी एस-400 विमान भेदी मिसाइल प्रणाली प्राप्त हुई थी। इसलिए भारत और रूस के रिश्ते निकट भविष्य में खत्म नहीं होने वाले हैं।   

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