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जानना जरूरी है: तक्षक की नागयज्ञ से कैसे हुई रक्षा? संस्कृति के पन्नों से जानें पूरी कहानी
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सार
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सांकेतिक तस्वीर।
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विस्तार
जनमेजय की आज्ञा से नागयज्ञ की तैयारी आरंभ हो गई। तभी एक वास्तुशास्त्री ने भविष्यवाणी की ‘जिस स्थान और समय में यज्ञ-कार्य आरंभ हुआ है, उसे देखकर लगता है कि एक ब्राह्मण के कारण यज्ञ पूर्ण नहीं होगा!’ परंतु जनमेजय ने यज्ञ का कार्य जारी रखा।
याजक, काले वस्त्र पहनकर यज्ञ करने लगे। उन्होंने सर्पों के नाम ले-लेकर अग्नि में आहुतियां देनी शुरू कर दीं, जिससे असंख्य सर्प अग्नि में गिरे और जलकर भस्म हो गए। यह देख तक्षक घबरा गया और देवराज इंद्र की शरण में चला गया। यज्ञ के प्रभाव से नागराज वासुकि को भी चक्कर आने लगे। उनकी रक्षा के लिए देवतागण, ब्रह्मा के पास पहुंचे। ब्रह्मा ने कहा कि ऋषि जरत्कारु ने वासुकि की बहन जरत्कारु से विवाह किया था। उनके पुत्र आस्तीक ही सर्पों की रक्षा कर सकते हैं। तब माता जरत्कारु ने आस्तीक से अपने भाई वासुकि को बचाने की प्रार्थना की।
आस्तीक तुरंत यज्ञ-स्थल पर पहुंचा और राजा जनमेजय, ऋत्विजों, आदि की स्तुति आरंभ कर दी। आस्तीक ने जनमेजय के यज्ञ की तुलना वरुणदेव, ब्रह्मा, इंद्र, राजा रंतिदेव, यमराज, गय, शशबिंदु, कुबेर, नृग, अजमीढ़, श्रीराम और युधिष्ठिर के यज्ञों से की और कहा कि जनमेजय का यज्ञ इन सबके यज्ञों के समान श्रेष्ठ है। आस्तीक ने ऋत्विजों और अन्य सदस्यों की भूरि-भूरि प्रशंसा की, जिसे सुनकर सब प्रसन्न हो गए। जनमेजय इतना प्रसन्न हुआ कि उसने आस्तीक से मनवांछित वर मांगने को कह दिया। लेकिन ऋत्विज ने कहा कि वर देने से पहले तक्षक को अग्नि में गिरने दिया जाए।
मंत्रों के प्रभाव से अधिकतर सर्प, यज्ञाग्नि में गिरकर भस्म हो चुके थे, किंतु तक्षक अब भी बचा हुआ था। अग्निदेव ने बताया कि तक्षक, इंद्रदेव का मित्र है और उनके विमान में छिपा बैठा है।
तब जनमेजय ने कहा कि मंत्रोच्चारण इस तरह किया जाए, ताकि तक्षक के साथ इंद्र भी अग्नि में गिर पड़ें। यह जानकर इंद्र ने तक्षक का साथ छोड़ दिया। यज्ञ के होता ने जैसे ही तक्षक के नाम की आहुति डाली, तो तक्षक आकाश में दिखने लगा। वह धीरे-धीरे यज्ञाग्नि की ज्वाला के समीप आ रहा था। ऋत्विज बोले-‘महाराज, तक्षक को अग्नि में गिरने से कोई नहीं रोक सकता, इसलिए अब आप इस ऋषि-कुमार को वर दे सकते हैं।’
आस्तीक को इसी क्षण की प्रतीक्षा थी। तक्षक अग्नि में गिरने ही वाला था कि आस्तीक बोला-’महाराज! मैं वर मांगता हूं कि आपका यज्ञ तत्काल बंद हो जाए।’ फिर आस्तीक ने तक्षक को लक्ष्य करके तीन बार कहा-‘ठहर जा!’ ऐसा कहते ही तक्षक अधर में ठहर गया। जनमेजय वचनबद्ध था, उसने कहा-‘यज्ञ समाप्त किया जाए और सभी नाग अब कुशलपूर्वक रहें!’ यह कहते ही यज्ञ रुक गया।
आस्तीक ने तक्षक समेत शेष सभी सर्पों की रक्षा की थी, जिससे प्रसन्न होकर वासुकि ने उससे वर मांगने को कहा। आस्तीक ने मांगा, ‘जो मेरे इस उपाख्यान का पाठ करे, उसे कभी सर्पों का भय न हो!’ तब नागराज वासुकि ने असित, आर्तिमान और सुनीथ नाम के तीन मंत्र दिए, जिनका पाठ करने से मनुष्य को सर्प का भय नहीं रहता। ये मंत्र हैं-
यो जरत्कारुणा जातो जरत्कारौ महायशा:।
आस्तीक: सर्पसत्रे वः पन्नगान् योsभ्यरक्षत।
तं स्मरन्तं महाभागा न मां हिंसितुमर्हथ।।
(जरत्कारु ऋषि से जरत्कारु नामक नागकन्या से जो आस्तीक नामक यशस्वी ऋषि उत्पन्न हुए तथा जिन्होंने सर्पसत्र में तुम सर्पों की रक्षा की थी, उनका मैं स्मरण कर रहा हूं। महाभाग्यवान सर्पो! तुम लोग मुझे मत डंसो।)
सर्पापसर्प भद्रं ते गच्छ सर्प महाविष।
जनमेजयस्य यज्ञान्ते आस्तीकवचनं समर
(महाविषधर सर्प! भाग जाओ! तुम्हारा कल्याण हो! जनमेजय के यज्ञ समाप्ति में आस्तीक को तुमने जो वचन दिया था, उसका स्मरण करो।)
आस्तीकस्य वच: श्रुत्वा यः सर्पो न निवर्तते
शतधा भिद्यते मूर्ध्नि शिंशवृक्षफलं यथा
(जो सर्प आस्तीक के वचन सुनकर भी नहीं लौटेगा, उसके फन के शीशम के फल के समान सैकड़ों टुकड़े हो जाएंगे।)