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अर्थव्यवस्था: चांदी भरोसेमंद निवेश, 2026 में क्या चांदी की चांदी रहेगी

Thu, 25 Dec 2025 07:15 AM IST
Satish Singh सतीश सिंह
Updated Thu, 25 Dec 2025 07:15 AM IST
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सार
गरीबों की धातु कही जाने वाली चांदी आज अमीरों का भरोसेमंद निवेश बन चुकी है। 2026 में भी इसकी कीमतों में ऐसी ही तेजी की उम्मीद है।
 
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Economy: Silver is a reliable investment. Will silver continue to shine in 2026
2026 में क्या चांदी की चांदी रहेगी - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

चांदी की कीमत अब तक के अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। इसकी वजह यह है कि दुनिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा अगले साल ब्याज दरें घटाने की संभावना के चलते निवेशकों ने सुरक्षित निवेश विकल्पों, यानी सोने-चांदी, की ओर रुख किया। यह रुपये की कमजोरी, कम जमा ब्याज दर, कच्चे माल के रूप में चांदी का बढ़ता इस्तेमाल, महंगाई के नरम रहने, रिजर्व बैंक द्वारा रेपो दर में फरवरी से अब तक 1.25 फीसदी की कटौती करने आदि के कारण दो लाख रुपये के स्तर को पार कर गई।  


कोरोना महामारी के बाद पहली बार सुरक्षित निवेश के लिए लोगों ने चांदी में निवेश किया, जिससे चांदी की कीमत 45,000 से बढ़कर 65,000 रुपये प्रति किलो के स्तर पर पहुंच गई, जबकि 2022 में सोलर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिकल वाहन आदि उद्योगों में चांदी का इस्तेमाल बढ़ने से इसकी कीमत बढ़कर 75,000 रुपये प्रति किलो हो गई। इसी तरह 2023 में चांदी के आभूषण, सिक्के, बार, बर्तन आदि की मांग में अभूतपूर्व इजाफा हुआ, जिसके कारण भारत दुनिया में चांदी का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश बन गया और इसकी कीमत 90,000 रुपये प्रति किलो के स्तर पर पहुंच गई। 2024 में चांदी के उत्पादन में कमी आई, फिर भी इसकी कीमत बढ़कर 1,25,000 रुपये प्रति किलो हो गई। 2025 में जब सोने की कीमत उच्चतम स्तर पर पहुंच गई, तो इसकी जगह चांदी निवेश का सबसे भरोसेमंद विकल्प बन गया, जिससे इसकी कीमत 17 दिसंबर, 2025 को दो लाख रुपये प्रति किलो के स्तर को पार कर गई।  


भारत समेत सभी देश हरित ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहन को बढ़ावा दे रही हैं, जिससे चांदी की खपत में इजाफा हो रहा है। सोना महंगा होने की वजह से लोग अब चांदी के आभूषण व वस्तुएं खरीदना पसंद कर रहे हैं। इन्हीं कारणों से इस साल चांदी ने सोने को पीछे छोड़ते हुए लगभग 110 फीसदी का प्रतिफल दिया है, जबकि सोने ने महज 65 प्रतिशत का। वर्तमान में, चांदी का मांग के अनुरूप उत्पादन नहीं हो पा रहा है, क्योंकि कई देशों में खनन लागत में इजाफा हुआ है और पर्यावरण से जुड़े नियम सख्त हुए हैं। विकल्प के तौर पर नए खदान शुरू करने में आठ से दस वर्षों का समय लग सकता है, इसलिए, चांदी की आपूर्ति में कमी आई है, पर मांग में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है।

भारत में सबसे बड़ा चांदी उत्पादक हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड है और यहां चांदी का अधिकांश उत्पादन बेस मेटल, यानी जिंक व सीसा, के सह-उत्पाद (बाय-प्रोडक्ट) के रूप में होता है, अर्थात हमारे देश में चांदी को सीधे खदानों से नहीं निकाला जाता है। 2023 में भारत में चांदी का उत्पादन केवल 813 मीट्रिक टन हुआ था, जबकि 2024 में 746 मीट्रिक टन। इस तरह देश में चांदी का औसत सालाना उत्पादन लगभग 750 मीट्रिक टन है, जबकि खपत करीब 7,500 मीट्रिक टन। भारत चांदी के शीर्ष 10 उत्पादक देशों में शामिल है, लेकिन यहां वैश्विक स्तर पर उत्पादन के संदर्भ में चांदी का उत्पादन सिर्फ दो से तीन प्रतिशत ही होता है, इसलिए भारत को अपनी मांग का 97 फीसदी हिस्सा दूसरे देशों से आयात करना पड़ता है।रिजर्व बैंक के रेपो दर में कटौती करने के कारण भी अधिक प्रतिफल की आस में निवेशक चांदी में निवेश कर रहे हैं।

हाल में डॉलर की तुलना में रुपये की कीमत कम होकर प्रति डॉलर 91 के स्तर को पार कर गई। इससे रुपये की क्रयशक्ति में कमी आई है। चूंकि, भारत को चांदी आयात का भुगतान डॉलर में करना पड़ता है और रुपये के डॉलर के मुकाबले कमजोर होने के कारण भारत को ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं। इसके अलावा, अभी देशों के बीच युद्ध जारी है। पश्चिम एशिया में निरंतर तनाव बना हुआ है, चीन व अमेरिका के बीच भी तनातनी का माहौल है। कुल मिलाकर, वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता के माहौल के कारण भी निवेशक चांदी में निवेश करना पसंद कर रहे हैं। फिलवक्त, चांदी में निवेश करना बेहद ही मुफीद है। कहा जा रहा है कि चांदी आने वाले वर्षों में भी एक रणनीतिक धातु बनी रहेगी। इस कारण लोग मनोवैज्ञानिक दबाव में भी चांदी की खरीदारी कर रहे हैं और इसकी कीमतें बढ़ती जा रही हैं। इस तरह, अब चांदी गरीब की जगह अमीर का सोना बनकर उन्हें शानदार प्रतिफल दे रहा है। ऐसे में कहना समीचीन होगा कि आगामी साल, यानी 2026 में भी चांदी की कीमत में उछाल की स्थिति बनी रहेगी और उम्मीद है कि नए साल में आसानी से इसकी कीमत 2.5 लाख रुपये के स्तर को पार कर सकती है।

बहरहाल, आर्थिक और वैश्विक भू-राजनीतिक स्तर पर अनिश्चितता, हरित ऊर्जा व उद्योग में चांदी की अभूतपूर्व मांग के बने रहने, सोने से बेहतर प्रतिफल देने, डॉलर की तुलना में रुपये के कमजोर बने रहने, जमा ब्याज दर के कम होने, सट्टेबाजी, त्योहारों और शादियों में चांदी की जबर्दस्त मांग आदि कारणों से इसकी चमक निरंतर चमकीली होती जा रही है।  
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