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आर्थिकी: बैंक तैयार, फिर भी लोग नहीं ले रहे लोन; सस्ती पूंजी के संकट ने खड़ी की चुनौती
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बैंकिंग सेक्टर
- फोटो :
Freepik
विस्तार
बीते एक-दो वर्षों से बैंकिंग क्षेत्र पूंजी की समस्या से जूझ रहा है। हालांकि, जून महीने और फिर 8 जुलाई को बैंकिंग व्यवस्था में 3.07 लाख करोड़ रुपये अधिशेष के रूप में पड़े थे। चूंकि इस राशि का तत्काल कोई उपयोग नहीं है, इसलिए रिजर्व बैंक परिवर्तनीय रिवर्स रेपो दर (वीआरआरआर) के माध्यम से इसे बैंकिंग प्रणाली से बाहर करने की कोशिश कर रहा है।
इस क्रम में, रिजर्व बैंक ने 97,315 करोड़ रुपये की निकासी नीलामी प्रक्रिया से की और शेष बचे दो लाख करोड़ रुपये को भी वीआरआरआर की मदद से जल्द ही बैंकिंग प्रणाली से बाहर निकालना चाहता है। वीआरआरआर, रिवर्स रेपो दर का एक उपखंड है, जिसका प्रयोग आमतौर पर बैंकिंग प्रणाली में से अधिशेष तरलता को कम करने के लिए किया जाता है।
जून में कर भुगतान के लिए कम निकासी और सरकारी खर्च में वृद्धि से भी बैंकिंग तंत्र में नकदी बढ़ी है और आगामी महीनों में भी तरलता अधिशेष बने रहने की उम्मीद है, क्योंकि बैंकों के नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) को दिसंबर तक चार चरणों में 100 आधार अंक तक कम किया जाएगा।
एक अनुमान के मुताबिक, सीआरआर में कटौती करने से दिसंबर तक बैंकिंग व्यवस्था में तरलता पांच लाख करोड़ रुपये को पार कर सकती है। बैंकों के परंपरागत निवेशकों ने बैंक की जगह शेयर बाजार, सोने, बांड आदि में निवेश करना शुरू कर दिया, जिससे बैंक जमा में भारी कमी आई और इस कारण क्रेडिट ग्रोथ में भी कमी देखी गई। लेकिन जब बैंकिंग व्यवस्था में पर्याप्त नकदी है, तब क्यों ऋण का उठाव नहीं हो पा रहा है। वित्त वर्ष 2025 में देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 6.5 प्रतिशत की दर से बढ़ा, जो कोविड महामारी के बाद सबसे धीमी वृद्धि है। विकास दर सुस्त रहने के कारण सरकार, बैंकों को ऋण के उठाव को बढ़ाने के लिए प्रेरित कर रही है। केंद्रीय बैंक ने भी कम समय में ब्याज दरों में 100 आधार अंकों की कटौती की है और उसका लाभ ग्राहकों तक पहुंचाने पर जोर दिया है, ताकि विकास दर में तेजी आए। इन प्रयासों के बावजूद 13 जून को समाप्त पखवाड़े में ऋण वृद्धि दर घटकर 9.6 प्रतिशत के स्तर पर आ गई, जो एक साल पहले समान अवधि में 19.1 फीसदी के स्तर पर थी।
इधर, उद्योग खंड में ऋण वृद्धि पिछले साल के 9.4 प्रतिशत से घटकर 4.8 प्रतिशत के स्तर पर आ गई, जिसका मुख्य कारण बड़े उद्योगों की ऋण प्रवाह में तेज गिरावट है, क्योंकि इस क्षेत्र का प्रदर्शन कुछ महीनों से नरम है। फरवरी से अप्रैल के बीच रेपो दर में 50 आधार अंकों की कटौती के बाद बैंकों ने बाह्य बेंचमार्क से जुड़े कर्ज की दरें उसी अनुपात में घटा दी हैं। इसकी बैंकों की बैलेंस शीट में करीब 40 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। ऋण दर में कमी आने से सीआरआर और रेपो दर में कटौती से उपलब्ध पूंजी की लागत भी मौजूदा ऋण दरों के आसपास पहुंच गई है।
जाहिर है, ऋण में उठाव नहीं होने का एक बड़ा कारण बैंकों की पूंजी लागत का अधिक होना है, क्योंकि सस्ती पूंजी उगाहने के लिए बैंकों ने जमा ब्याज दरों में उल्लेखनीय वृद्धि की है। इसलिए, बैंकों ने जमा दरों का पुनर्मूल्यांकन शुरू किया है। हालांकि, जमा दरों में कटौती करने पर भी उसका प्रभाव आने में कुछ समय लगेगा। कम से कम चालू वित्त वर्ष में दबाव बना रह सकता है।
बहरहाल, ऋण में वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए कुछ सार्वजनिक बैंकों ने एनबीएफसी को ऋण देना शुरू किया है, क्योंकि इस क्षेत्र को अभी पूंजी की आवश्यकता है। मौजूदा माहौल में कम ऋण ब्याज दरें भी ऋण के उठाव में तेजी लाने में सफल नहीं हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कम ब्याज दरें अगले 12 से 24 महीनों में भी ऋण के उठाव में तेजी नहीं ला पाएंगी। पिछले दशक की शुरुआत में क्रेडिट वृद्धि में तेजी के बाद एनपीए में भी वृद्धि हुई थी, जिससे मार्च 2018 तक बैंकों का एनपीए कुल ऋण आवंटन का 11.6 प्रतिशत तक पहुंच गया था। हालांकि बाद में इसमें सुधार हुआ। यही वजह है कि बैंक ऋण वृद्धि में तेजी लाने के लिए आक्रामक रुख नहीं अपना रहे हैं, क्योंकि ब्याज दर की चाल बदलने से बड़ी संख्या में ऋण एनपीए में तब्दील हो सकते हैं।
इधर, फरवरी 2025 में इंडस्ट्रियल ग्रोथ छह महीने में सबसे धीमी रही और यह 2.9 प्रतिशत के स्तर पर आ गई, जो जनवरी में पांच प्रतिशत थी, वहीं खनन क्षेत्र की वृद्धि 2.8 प्रतिशत रही, जो चार महीने के निचले स्तर पर है। विनिर्माण और खनन क्षेत्र के खराब प्रदर्शन के कारण इंडस्ट्रियल ग्रोथ कम हुई है, क्योंकि विनिर्माण क्षेत्र का इंडस्ट्रियल ग्रोथ में तीन-चौथाई से ज्यादा का योगदान होता है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि विनिर्माण और खनन क्षेत्र में नरमी, ऋण मांग में कमी, बैंकों के समक्ष सस्ती पूंजी के संकट के चलते ऋण के उठाव में तेजी नहीं आ रही है।