{"_id":"6428f4432bd6dd9f6208535c","slug":"disqualification-of-rahul-gandhi-p-chidambaram-question-who-can-be-disqualified-who-was-defamed-2023-04-02","type":"story","status":"publish","title_hn":"Rahul Gandhi: पूर्व केंद्रीय मंत्री चिंदबरम का सवाल, कौन अयोग्य हो सकता है, किसकी मानहानि हुई?","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
Rahul Gandhi: पूर्व केंद्रीय मंत्री चिंदबरम का सवाल, कौन अयोग्य हो सकता है, किसकी मानहानि हुई?
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
राहुल गांधी।
- फोटो :
Social Media
विस्तार
अदालतों की स्थापना कानून के मुताबिक न्याय देने के लिए की जाती हैं। कई बार, न्याय लड़खड़ा जाता है, लेकिन भारत में वादी यथोचित उम्मीद कर सकते हैं कि यदि वे टेढ़े-मेढ़े रास्ते पर यात्रा जारी रखेंगे, तो अंततः उन्हें न्याय मिल ही जाएगा। इस भूमिका के साथ मैं एक ऐसे मामले की व्याख्या करूंगा, जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा है और जिसने राजनीतिक विभाजन के दोनों ओर भावनाओं को उत्तेजित किया है।
23 मार्च, 2023 को गुजरात के एक मजिस्ट्रेट ने श्री राहुल गांधी को मानहानि (आईपीसी की धारा 499) के अपराध में दोषी ठहराया और उन्हें दो वर्ष के कैद की सजा सुनाई। सजा सुनाने के बाद मजिस्ट्रेट ने सजा पर रोक लगा दी। इसके बावजूद, 24 मार्च को श्री गांधी को अयोग्य घोषित कर लोकसभा की उनकी सीट को रिक्त घोषित कर दिया गया।
मामला इस तरह बढ़ा:
13.04.2019: श्री गांधी ने कोलार, कर्नाटक में एक भाषण दिया
16.04.2019: श्री पूर्णेश मोदी, विधायक (भाजपा) ने सूरत, गुजरात में मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दर्ज की कि श्री गांधी ने पूरे मोदी समुदाय का अपमान किया है
07.03.2022 शिकायतकर्ता के आग्रह पर उनकी अपनी शिकायत की सुनवाई पर गुजरात उच्च न्यायालय ने स्थगन दे दिया
07.02.2023 श्री गांधी ने लोकसभा में अदाणी समूह के मुद्दों पर भाषण दिया
16.02.2023: शिकायतकर्ता ने गुजरात उच्च न्यायालय से अपनी याचिका वापस ले ली
21.02.2023: मजिस्ट्रेट ने सुनवाई बहाल कर दी
17.03.2023 सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित
23.03.2023: मजिस्ट्रेट ने 168 पेज का फैसला सुनाया, जिसमें उन्होंने श्री गांधी को दोषी करार दिया और उन्हें दो साल की सजा सुनाई, थोड़ी देर बाद मजिस्ट्रेट ने सजा पर रोक भी लगा दी
24.03.2023 लोकसभा सचिवालय ने श्री गांधी की अयोग्यता को लेकर अधिसूचना जारी कर दी
तीन बरस से अपनी गति से चल रहा यह नियमित मामला अचानक महत्त्वपूर्ण हो गया और प्रकाश की गति से 30 दिनों में इसमें सुनवाई बहाल होने से लेकर सजा तक हो गई। पहेली यह है कि किस वजह से यह इतना महत्वपूर्ण हो गया? शिकायतकर्ता ने अपनी ही शिकायत पर स्थगन क्यों लिया था और फिर लोकसभा में श्री गांधी के भाषण के नौ दिनों के बाद उन्होंने अपनी याचिका वापस लेकर स्थगित सुनवाई को तुरंत बहाल करने का आग्रह क्यों किया?
किसकी मानहानि हुई?
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि मोदी समुदाय/जाति, जिससे वह खुद ताल्लुक रखते हैं, की मानहानि हुई। साफ कहूं, तो मैं नहीं जानता कि ऐसा कोई समुदाय है, जिसे 'मोदी' कहा जाता है या जिन लोगों के उपनाम 'मोदी' हैं, वे सब एक समुदाय या जाति के हैं। द इंडियन एक्सप्रेस (28 मार्च, 2023) ने विस्तार से बताया था कि मोदी शब्द 'किसी एक विशेष समुदाय या जाति से संबंधित नहीं है। गुजरात में मोदी उपनाम का उपयोग हिंदू, मुस्लिम और पारसी करते हैं। वैष्णव (बनिया), पोरबंदर के खारवा (मछुआरे) और लोहाना (व्यवसायी समुदाय) में मोदी उपनाम लगाने वाले लोग हैं।' अखबार ने यह भी पाया कि ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) की सूची में 'मोदी' नाम का कोई समुदाय या जाति नहीं है। इसके अलावा बिहार और राजस्थान के लिए केंद्रीय सूची में भी कोई 'मोदी' नहीं है। गुजरात की केंद्रीय सूची में 'मोदी घांची' है।
मैंने छह दशक पहले जाति को त्याग दिया था और मैं जाति को मान्यता नहीं देता। एक समुदाय/जाति (कथित रूप से 13 करोड़ मजबूत) को बदनाम करने के तर्क से मेरा सिर घूम गया है।
सजा और सजा पर रोक
शिकायत के मुताबिक यह मानहानि का मामला था। आईपीसी की धारा 500 के तहत सजा दो साल की कैद या जुर्माना या दोनों हो सकती है। मैं मानहानि के ऐसे एक भी मामले के बारे में नहीं जानता, जिसमें 1860 (जब से आईपीसी अस्तित्व में आया) के बाद से किसी को अधिकतम दो साल की सजा दी गई हो।
अमूमन जब तीन साल या उससे कम की कैद की सजा सुनाई जाती है, तब आरोपी को जमानत मिल जाती है और वह आजाद व्यक्ति होता है, ताकि वह दोषसिद्धि और सजा से राहत के लिए उच्चतर अदालत जा सके। हालांकि इस मामले में खुद मजिस्ट्रेट ने सजा सुनाने के कुछ मिनटों बाद ही उस पर रोक लगा दी।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 का अनुच्छेद 8 (3) कहता है: 'कोई भी व्यक्ति जिसे वर्ष से अधिक के कारावास की सजा सुनाई जाती है, तो वह दोषी ठहराए जाने की तिथि से अयोग्य हो जाएगा...'
श्री गांधी के मामले में दोषसिद्धि तो हुई, लेकिन सजा प्रभावी नहीं हुई। इसलिए क्या वह 23 मार्च, 2023 को अयोग्य हो सकते थे? यह बहस का मुद्दा है। अनेक लोगों ने यह सवाल पूछा है और उन्हें जवाब का इंतजार है। हालांकि जिनके पास भी शक्तियां थीं, उन्हें संदेह नहीं था। पता नहीं, यह सवाल पूछा भी गया या नहीं और इसका जवाब मिला या नहीं, लेकिन 24 घंटे के भीतर लोकसभा सचिवालय ने श्री गांधी को अयोग्य कर दिया।
पहेली
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 102 (2) (ई) के मुताबिक, 'कोई भी व्यक्ति... सदस्य होने के अयोग्य हो जाएगा... यदि वह संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून द्वारा या उसके तहत अयोग्य हो जाता है।
यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यहां स्वतः अयोग्य हो जाएगा, नहीं बल्कि, 'अयोग्य हो जाएगा', प्रयुक्त हुआ है, जिसका अर्थ है कि अयोग्यता का आदेश आवश्यक होगा। स्वाभाविक प्रश्न पूछा गया (प्रश्न पूछने वालों में श्री पीडीटी आचार्य, लोकसभा के पूर्व महासचिव शामिल हैं) कि अयोग्य घोषित करने का अधिकार किसके पास है? अनुच्छेद 103 में इसका उत्तर मिल सकता है: इसके मुताबिक, 'यदि कोई प्रश्न उठता है.... प्रश्न राष्ट्रपति के निर्णय के लिए भेजा जाएगा', जो कि 'चुनाव आयोग की राय लेंगे और उस राय के अनुसार कार्य करेंगे। श्री गांधी के मामले में प्रश्न राष्ट्रपति के पास नहीं भेजा गया; न ही चुनाव आयोग ने कोई राय दी। तो फिर फैसला किसने लिया? क्या माननीय लोकसभा अध्यक्ष ने लिया या उस संस्था ने लिया, जिसे लोकसभा सचिवालय के रूप में जाना जाता है? यह कोई नहीं जानता। चर्चिल की तर्ज पर कहें, तो यह मामला और उसके परिणाम रहस्य में लिपटी किसी पहेली की तरह हैं।