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तोते की साख

Wed, 24 Oct 2018 07:14 PM IST
रवीन्द्र दुबे
रवीन्द्र दुबे Updated Wed, 24 Oct 2018 07:14 PM IST
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Credibility of 'parrot'
सीबीआई

सीबीआई के भीतर चल रहे झगड़े के सड़क पर आ जाने से देश की इस शीर्ष जांच एजेंसी की निष्पक्षता और प्रतिष्ठा को एक बार फिर गहरा धक्का लगा है। पिछले सात दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है कि देश की इस सर्वोच्च जांच एजेंसी को अपने उप प्रमुख विशेष निदेशक राकेश अस्थाना समेत चार लोगों के खिलाफ रिश्वत लेने का मुकदमा दर्ज करना पड़ा है। इस विवाद से एजेंसी के निदेशक आलोक वर्मा भी अछूते नहीं रहे हैं और उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है।


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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी अस्थाना पर आरोप है कि उन्होंने रिश्वत लेकर मांस कारोबारी मोईन खान को क्लीन चिट दी। मोईन खान के बारे में जग जाहिर है कि मनी लांड्रिंग (अवैध रूप से अर्जित काले धन को साफ कर उसे वैध कर सफेद में बदलना) में उन्हें महारत हासिल है और इसके अलावा वह सीबीआई के अधिकारियों के दलाल के रूप में भी चर्चित रहे हैं। अस्थाना ने भी सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा पर रिश्वत लेने का आरोप लगाते हुए दो महीने पहले कैबिनेट सेक्रेटरी को भी पत्र लिखा था। यह बवाल क्यों हो रहा है? इस शिकायत से जुड़े कागजात बाहर कैसे आए और इसमें किसका हित शामिल है? उल्लेखनीय तो यह है कि पद विशेष को लेकर अफसरशाहों में खींचतान और शीतयुद्ध कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन इस तरह दो शीर्ष पदस्थ अधिकारियों का इस स्तर पर उतरना भारत के इतिहास में अभूतपूर्व है।

सीबीआई के नंबर दो विशेष निदेशक अस्थाना, डीएसपी देवेंद्र कुमार, रिश्वत देने में भूमिका निभाने वाले मनोज प्रसाद और उसके भाई सोमेश के खिलाफ पिछले हफ्ते मामला दर्ज किया गया है। मामले में खुफिया संगठन रॉ के विशेष निदेशक सामंत कुमार गोयल का नाम भी दर्ज किया गया था, लेकिन उन्हें अभियुक्त नहीं बनाया गया है। इस सिलसिले में डीएसपी देवेंद्र कुमार के दिल्ली स्थित आवास पर छापा मारकर उन्हें गिरफ्तार भी किया गया है।

ये मुकदमे सतीश साना की शिकायत के आधार पर दर्ज किए गए हैं। साना मांस कारोबारी मोईन कुरैशी से संबंधित मामले में जांच का सामना कर रहा है। साना ही वह मध्यस्थ था, जिसने मोईन को क्लीन चिट दिलाने में अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा एजेंसी ने मामले के एक अन्य बिचौलिये मनोज प्रसाद को दुबई से लौटते ही गिरफ्तार किया। मनोज और उसके भाई सोमेश ने रिश्वत में दी गई धनराशि का इंतजाम करने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। मजिस्ट्रेट के सामने मनोज के इकबालिया बयान के बाद अस्थाना के खिलाफ दो करोड़ रुपये की रिश्वत लेने का मुकदमा दर्ज किया गया। गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना प्रमुख मामलों की जांच करने वाले सीबीआई के विशेष जांच दल (एसआइटी) के प्रमुख हैं। यह दल अगस्ता वेस्टलैंड खरीद में दलाली लेने, भगोड़े शराब कारोबारी विजय माल्या के कर्ज घोटाले जैसे प्रमुख मामलों की जांच कर रहा है।
 
इसमें कोई दो मत नहीं हो सकता कि सीबीआई के इस घटनाक्रम में जो कुछ दिखाई दे रहा है, मामला उससे कहीं ज्यादा गहरा है। इस मामले में जिस तरह की पेचबंदी की गई है, उसके तार राजनीति और 2019 में आने वाले आम चुनाव से जुड़े हैं। सीबीआई के दोनों गुट एक दूसरे के खिलाफ पिछले कई महीनों से न सिर्फ सक्रिय हैं, बल्कि एक दूसरे की कब्र खोदने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। और तो और, शिकायतों के सार्वजनिक होने और सरकारी खतो-किताबत के मीडिया तक पहुंचाए जाने में सियासत की भूमिका भी साफ-साफ नजर आ रही है। अगर यह बात सही है, तो इस सब के पीछे किस का हाथ है?  यह काम  भी किसी अपराध से कम नहीं है। इस केंद्रीय एजेंसी के साथ ही इससे उन लोगों पर भी सवालिया निशान लगते हैं, जिन पर सीबीआई की निगहबानी की जवाबदारी है। जहां तक मोईन कुरैशी का सवाल है, उसके तार किससे जुड़े हैं, यह जग जाहिर है।

सीबीआई की कार्यप्रणाली पर कोई पहली बार सवाल नहीं उठे हैं और न ही पहली बार उसका कोई शीर्ष अधिकारी इस तरह से सवालों के घेरे में आया है। मई, 2013 में कोयला खदानों के आवंटन में हुई गड़बड़ी से संबंधित एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताते हुए उसे 'पिंजरे में बंद तोता' कहा था, जो अपने आका के इशारे पर ही बोलता है। तब कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की थी, 'सीबीआई को स्वतंत्र नहीं किया गया तो, हमें दखल देना होगा।' इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा था कि शीर्ष जांच एजेंसी को यह पता होना चाहिए कि उसे उस पर पड़ने वाले दबावों से कैसे निपटना है। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में सीबीआई के तत्कालीन निदेशक रंजीत सिन्हा को 2जी मामले की जांच से तब हटा दिया था, जब उनके रिटायरमेंट को महज 12 दिन ही बचे थे!

इसके बावजूद सीबीआई की कार्यप्रणाली में कोई फर्क आया हो, लगता नहीं। ताजा घटनाक्रम से तो लगता है, मानो एक ही पिंजरे में बंद दो तोतों ने एक-दूसरे को लहूलुहान कर दिया है! इस सारे विवाद से जो सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है, वह यह कि कहीं यह उन आरोपितों और हर तरह से प्रभावशाली लोगों का सीबीआई की छवि को रसातल में पहुंचाने और उसकी विश्वसनीयता समाप्त करने का कोई सुनियोजित षड्यंत्र तो नहीं है। अब कल्पना कीजिए कि पूरी दुनिया में सीबीआई में व्याप्त भष्टाचार का डंका पिटने के बाद जब यह एजेंसी किसी देश में अपना लैटर रॉगेटरी भेजेगी (किसी विदेशी कोर्ट में किसी जांच के संबंध में न्यायिक मदद के लिए भेजा जाने वाला औपचारिक पत्र) तो उस देश की जांच एजेंसियों के अधिकारियों की क्या प्रतिक्रिया होगी? वे सीबीआई से कितना सहयोग करेंगे? अब माल्या, चौकसी और ललित मोदी का भारत प्रत्यर्पण सरल रह जाएगा? और वैसे भी सीबीआई कोई एफबीआई तो कभी थी ही नहीं!

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