समाज: कोविड के बाद बदलाव मांगती शिक्षा, हिंसक व्यवहार बना चुनौती
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विस्तार
मीरा लेविनसन और डेनियल मैर्कोविट्स ने पिछले वर्ष द अटलांटिक में प्रकाशित अपने लेख में लिखा था, 'कोरोना वायरस ने अमेरिकी शिक्षा के अब तक के इतिहास में सबसे बड़ी बाधा पैदा की।' अमेरिकी जीवन पर कोविड की पकड़ भले ही ढीली हो गई हो, लेकिन स्कूली शिक्षा पुराने ढर्रे पर नहीं लौट पाई है। आज के शिक्षक और छात्रों की वास्तविकता बदल गई है, जो शायद जिंदगी भर ऐसी ही रहेगी। स्कूली दाखिले में कमी इसका एक सबूत है। कोविड के दौर के पहले पूरे शैक्षिक सत्र में सरकारी स्कूलों में दाखिले में 11 लाख की कमी आई थी। अगले पतझड़ में स्कूली दाखिला और 1,30,000 कम हो गया। एक शोध से पता चला कि सरकारी स्कूलों में दाखिला न लेने वाले इन बच्चों में से 26 फीसदी ने होम स्कूलिंग को वरीयता दी, जबकि 14 प्रतिशत बच्चों ने निजी स्कूलों में दाखिला लिया था। शेष 34 फीसदी बच्चों के बारे में पता करना कठिन था। उन्होंने भी या तो होम स्कूलिंग को प्राथमिकता दी होगी या फिर वे स्कूल छोड़ चुके होंगे। आने वाले वर्षों में जन्म दर घटने के कारण स्कूलों में दाखिला भी घटेगा, और उस अनुपात में शिक्षा के लिए सरकार की फंडिंग भी कम होगी।
इससे शैक्षिक गिरावट आएगी। वर्ष 1970 में जब शैक्षिक प्रगति के राष्ट्रीय मूल्यांकन की शुरुआत हुई थी, तब उसके अंक में या तो वृद्धि हुई थी या फिर वह स्थिर रहा था। लेकिन इस मूल्यांकन के दौरान नौ साल के जिन बच्चों के गणित और रीडिंग में अच्छे अंक आए थे, महामारी ने उनकी संभावनाओं पर पानी फेर दिया। शैक्षिक हुनर में आई कमी के दीर्घस्थायी नतीजे होंगे। शोधार्थियों ने गणना करके बताया है कि सिर्फ गणित के कौशल में आई कमी से भविष्य में इन बच्चों की आय में नौ खरब डॉलर की कमी आएगी।
इससे स्कूली छात्रों में अनुपस्थिति की प्रवृत्ति बढ़ी है। कोविड के दौरान बच्चों में स्कूल न जाने की प्रवृत्ति बढ़ी और यह आदत जारी है। एक आकलन के मुताबिक, 2021-22 के शैक्षणिक सत्र में 16 करोड़ छात्र लंबे समय तक स्कूलों में अनुपस्थित पाए गए। उस दौरान न्यूयॉर्क सिटी के सरकारी स्कूलों में 41 प्रतिशत छात्र लंबे समय तक अनुपस्थित पाए गए।
इससे अनुशासन के मोर्चे पर भी समस्याएं बढ़ी हैं। 80 फीसदी से अधिक सरकारी स्कूलों का कहना है कि महामारी के कारण छात्रों का व्यवहार बदतर हुआ है, और उनकी संवेदना में कमी आई है। उदाहरण के लिए, 2021 के पतझड़ में डेनवर पब्लिक स्कूल्स ने पाया कि कोविड से पहले की तुलना में छात्रों में लड़ने-भिड़ने की प्रवृत्ति 21 प्रतिशत बढ़ी है।
कोविड ने असमानता भी बढ़ाई है। जैसा कि ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट के एक लेख में रॉबिन लेक और ट्रैविज पिलो ने लिखा, 'अमेरिकी छात्र के आकार की रिकवरी का अनुभव कर रहे हैं, जिसमें अधिक और कम अंक पाने वाले छात्रों के बीच का फासला कोविड की तुलना में बहुत अधिक बढ़ गया है।' अभिभावक स्कूली छात्रों में आए इन बदलावों से अवगत हैं और उन्होंने अपनी सोच भी इसी अनुरूप कर ली है। अमेरिकी इतिहास में देखें, तो शिक्षा के मामले में अमेरिकी मतदाता डेमोक्रेट्स पर अधिक भरोसा करते आए हैं। लेकिन नैट मैल्कस ने नेशनल अफेयर्स में यह लिखा है कि वर्ष 2022 से अमेरिकी मतदाता शिक्षा के मामले में रिपब्लिकन्स पर भी उतना ही भरोसा करने लगे हैं, जितना डेमोक्रेट्स पर करते हैं।
यानी शिक्षा की मौजूदा स्थिति ने अभिभावकों को पुनर्विचार के लिए मजबूर कर दिया है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से राजनीतिक नेतृत्व इस बारे में कुछ सोच नहीं रहा। ऐसे में, लाजिमी तो यही है कि अमेरिका में स्कूली शिक्षा सबसे ज्वलंत मुद्दा हो और राष्ट्रपति बाइडन इसे पटरी पर लाने के लिए योजना की घोषणा करें। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो रहा। स्टेट ऑफ द यूनियन के अपने भाषण में बाइडन ने ऐसा कुछ नहीं कहा। रिपब्लिकन पार्टी स्कूली शिक्षा में सुधार के मुद्दे पर भी नस्लीय श्रेष्ठता की ही बात करेगी।
स्कूली शिक्षा में आया यह ठहराव अमेरिकी राजनीति के लिए चिंतित होने का समय है। जरूरी है कि नेतागण उठ खड़े हों और कहें कि आइए, हम चार्टर्स, वाउचर्स, सबके लिए बाथरूम जैसे पिटे-पिटाए मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय इस बारे में सोचें कि देश में शिक्षा के परिदृश्य को कैसे बेहतर किया जा सकता है।
एक सर्वे में 40 फीसदी से अधिक अभिभावकों ने बताया कि वे चाहते हैं कि सप्ताह में कम से कम एक दिन बच्चों के लिए घर में ही सीखने का विकल्प रखा जाए। अगर इस विचार ने जोड़ पकड़ा, तो स्कूली पाठ्यक्रम में बदलाव करना होगा। कुछ विचारक इस दिशा में सोच रहे हैं कि स्कूल में एक घंटा तक छात्रों को एक ही विषय पढ़ाने के बजाय उन्हें उनकी रुचि के विषय में पढ़ने कहा जाए। जबकि कुछ स्कूल पूरी कक्षा के बजाय उन्हें छोटे समूहों में बांटकर या छोटी कक्षा में एक-एक बच्चे को पढ़ाने जैसे प्रयोग कर रहे हैं।
महामारी ने हमें बताया है कि जब शिक्षक अपना काम न कर पाएं, तो शिक्षा का कितना नुकसान होता है। ऐसे में, अब राजनीतिक वर्ग को चाहिए कि वह इस दिशा में कोई ठोस पहल करे।