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मुद्दा: चुनावी राजनीति का हिस्सा बना चीता, क्या दिला सकता है वोट?

Tue, 30 May 2023 07:02 AM IST
Vijay Vidrohi विजय विद्रोही
Updated Tue, 30 May 2023 07:02 AM IST
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सार
क्या सियासी दलों के पास बुनियादी मुद्दों का इतना अभाव हो गया है कि चीता राजनीति होने लगी है?
 
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cheetah in center of politics in india political parties involved to gain vote
चीता - फोटो : पेक्सेल्स

विस्तार

चीता वोटर नहीं है। चीता नेता नहीं है। लेकिन चीता चुनावी राजनीति का हिस्सा है। क्या चीता वोट दिला सकता है? लेकिन मध्य प्रदेश और राजस्थान में इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनावों के संदर्भ में चीता पॉलिटिक्स बड़ी दिलचस्प है। कहानी नामीबिया व दक्षिण अफ्रीका से शुरू होती है और हजारों किलोमीटर का सफर तय कर मध्य प्रदेश के कुनो राष्ट्रीय उद्यान के साथ-साथ राजस्थान के मुकुंदरा टाइगर रिजर्व तक पहुंचती है।



केंद्र की मोदी सरकार नामीबिया से आठ और दक्षिण अफ्रीका से बारह चीते लेकर आई। इनमें से तीन मर चुके हैं। एक मादा चीता ने चार शावक जने थे, जिनमें से तीन की मौत हो चुकी है। अब वन्यजीव विशेषज्ञ कह रहे हैं कि कुनो में जगह कम पड़ रही है, इसलिए पड़ोस के राजस्थान के मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में भी चीते बसाए जाने चाहिए, पर केंद्र सरकार ना- नुकर कर रही है। क्या चुनावी साल में मोदी सरकार नहीं चाहती कि राजस्थान में भी चीता बसाया जाए, जहां कांग्रेस की सरकार है? यह सवाल सर्वोच्च न्यायालय भी पूछ चुका है। साथ ही, चीता को चुनाव से न जोड़ने की नसीहत भी दे चुका है।


अब जो मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच जाए, उसे गंभीरता से लेना जरूरी हो जाता है। वैसे चीते तो नामीबिया में भी कूटनीतिक सियासत के हथियार बन चुके थे। दिलचस्प किस्सा है कि मनमोहन सिंह सरकार के समय वन और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का नामीबिया जाना हुआ। नामीबिया चीते देने को तैयार हो गया, पर वह चाहता था कि संयुक्त राष्ट्र में उसके खिलाफ लाए गए किसी प्रस्ताव पर भारत उसका साथ दे। भारत ने इन्कार किया, तो नामीबिया ने भी इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

इंदिरा गांधी ने बीती सदी के 70 के दशक में ईरान से चीता लाने की कोशिश की थी और तब भी सियासत हो गई थी। ईरान-अमेरिका के संबंध खराब हुए और चीता का भारत आना अटक गया। इसके विपरीत, मोदी सरकार ने कूटनीतिक मसले को कूटनीति के जरिये सुलझाया और चीते भारत लाए जा सके, लेकिन अब तो दो राज्यों के विधानसभा चुनावों तक सियासत सिकुड़ चुकी है।

हैरानी की बात है कि जब सर्वोच्च न्यायालय ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल को निशाने पर लेते हुए चीते के लिए राजस्थान पर भी नजर डालने को कहा था, तो वह यह बात छिपा गए कि राजस्थान सरकार के वन विभाग ने मुकुंदरा में चीता बसाने की पेशकश की थी, जिसे नजर अंदाज कर दिया गया था। राजस्थान के वन विभाग ने 2021 में इस तरह का प्रस्ताव भेजा था। जनवरी, 2022 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने चीता ऐक्शन प्लान के तहत राजस्थान के मुकुंदरा और शाहगढ़ को भी शामिल करने की बात कही थी। केंद्र के वन्यजीव संस्थान ने भी मुकुंदरा को चीता ब्रीडिंग सेंटर के रूप में विकसित करने की पेशकश की थी।

जानकारों का कहना है कि पैसों के हिसाब से भी मुकुंदरा को विकसित करने में फायदा है। नया सेंटर बनाने में 300 से 500 करोड़ रुपये तक खर्च होंगे, जबकि मुकुंदरा में 80 वर्ग किलोमीटर का तारबंदी किया हुआ इलाका तैयार है, जहां सिर्फ चीते के शिकार को देखते हुए काले हिरण, जंगली सूअर, लंगूर आदि जानवर लाने की व्यवस्था करनी है। एक चीते को रहने के लिए 21 वर्ग किलोमीटर का इलाका चाहिए, जो मुकुंदरा में आसानी से मिल जाएगा। उधर चीता ऐक्शन प्लान में 2009 से सक्रिय रूप से शामिल वन्यजीव विशेषज्ञ यदुवेंद्र देव झाला को हटा दिया गया। वह मुकुंदरा को चीता का ब्रीडिंग सेंटर बनाने के पक्ष में थे। उनका कहना था कि इससे आगे चलकर अफ्रीका से चीता आयात करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

इतने तर्क इसलिए दिए जा रहे हैं, ताकि समझने की कोशिश की जाए कि आखिर चुनाव में चीता क्या इतने काम का साबित हो सकता है या फिर यह पक्ष-विपक्ष की स्वाभाविक तकरार है? कहा जा रहा है कि मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव प्रचार के समय प्रधानमंत्री मोदी कमल छाप चीते को लाएंगे। क्या 2024 के लोकसभा चुनाव में भी यही चीज देखने को मिलेगी? क्या सियासी दलों के पास बुनियादी मुद्दों का इतना अभाव हो गया है कि चीता राजनीति होने लगी है?

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