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दूसरा पहलू: शून्य दर्शन, भक्षाली लिपि और...चतुर्भुज मंदिर; यहां इतिहासकार, दार्शनिक व गणितज्ञों की भी दिलचस्पी

Mon, 02 Dec 2024 08:16 AM IST
ज्योति भास्कर भूपेंद्र कुमार
भूपेंद्र कुमार Published by: ज्योति भास्कर Updated Mon, 02 Dec 2024 08:16 AM IST
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सार
भारत के वर्तमान नक्शे पर मध्य प्रदेश में स्थित ग्वालियर किले की तलहटी में बने मंदिर में संस्कृत और पाली मिश्रित भक्षाली लिपि में दशमलव प्रणाली का इस्तेमाल होता था। जब यह मंदिर बना, उस समय तक जीरो का उपयोग भारत में बहुतायत में होने लगा था और भारत के ज्ञान का डंका भी पूरी दुनिया में बजने लगा था।
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Chaturbhuj temple Gwalior MP Zero Bhakshali script and more Historians philosophers mathematicians interested
भूपेंद्र कुमार और ग्वालियर का चतुर्भुज मंदिर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

विशाल किले की तलहटी में बने सूने और अनजान से मंदिर से कितनी सदियों का नाता रहा होगा, यह सोचना भी अजीब लगता है! ग्वालियर आने वाले लोग जब मान सिंह तोमर के किले को देखते हैं, तो शायद वृंदावन लाल वर्मा की मृगनयनी बरबस ही उन्हें याद आ जाती होगी। यह शायद दुनिया का अकेला मंदिर है, जिसमें दुनिया भर के इतिहासकारों, दार्शनिकों और गणितज्ञों की समान रुचि है। मंदिर के अंदर विष्णु की प्रतिमा के ऊपर लगे शिलापट पर भक्षाली लिपि में आपको जीरो बड़ी सहजता से लिखा दिख जाएगा।


शिला पट पर अंकित शून्य इसी मंदिर में पहली बार देखा गया, बाद में कंबोडिया...
दुनिया का सबसे पुराना दूसरा शून्य आपको यहां मिलेगा। मंदिर के पास भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का बोर्ड लगा है, जिस पर लिखा है कि इसे प्रतिहार राजा भोजदेव ने 876 ईस्वी में बनवाया था। मंदिर के चार स्तंभों पर योग के आसन दिखते हैं, मंदिर के गर्भगृह से एक तरफ गंगा, तो दूसरी तरफ यमुना दर्शाई गई हैं। विष्णु की चार भुजाओं से ही मंदिर का नाम चतुर्भुज पड़ा। दुनिया भर में काफी समय तक किसी भी शिला पट पर अंकित शून्य इसी मंदिर में पहली बार देखा गया। पर 19वीं शताब्दी के तीसरे दशक में फ्रेंच पुरातत्ववेत्ता जार्ज कोदेस ने 683 ईस्वी में कंबोडिया के सामबोर में एक ऐसा मंदिर खोज निकाला, जिसमें शिला पर शून्य अंकित था। इससे 193 साल के अंतर से चतुर्भुज मंदिर पीछे हो गया। ख्मर शासन के दौरान यह शिलापट कंबोडिया नेशनल म्यूजियम से गायब हो गया। इससे ग्वालियर को फिर पहले वाला दर्जा मिल गया।


संस्कृत और पाली मिश्रित इस लिपि को भक्षाली कहा गया
लेकिन जनवरी, 2017 में कंबोडिया की सरकार ने घोषणा की कि गायब शिलापट मिल गया है। किसी और माध्यम में जीरो का सबसे पहला इस्तेमाल पंजाब के यूसुफजई जिले में 1881 में भोजपत्र पर भक्षाली गांव में मिला था। संस्कृत और पाली मिश्रित इस लिपि को भक्षाली कहा गया। इसमें दशमलव प्रणाली का इस्तेमाल दर्शाया गया है। चीन और सुमेरियन सभ्यता में शून्यता की स्थिति को समझाया तो गया है, पर इसे दिखाया कैसे जाए-यह भारत ने ही दुनिया को बताया।

दुनिया का सबसे पुराना दूसरा शून्य आपको ग्वालियर में मिलेगा। मंदिर के पास भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का बोर्ड लगा है, जिस पर लिखा है कि इसे प्रतिहार राजा भोजदेव ने 876 ईस्वी में बनवाया था।          

गणितज्ञों ने इसे यूरोप तक लोकप्रिय बना दिया
876 ईस्वी में जब यह मंदिर बना, उस समय तक जीरो का उपयोग भारत में बहुतायत में होने लगा था। इससे दो शताब्दी पहले ब्रह्मगुप्त ने अंकगणित के नियम बनाए। इसी के साथ गणित में दशमलव प्रणाली की शुरुआत भी हो गई थी। यह प्रणाली अरब गई, तो अल ख्वारिज्मी जैसे गणितज्ञों ने इसे यूरोप तक लोकप्रिय बना दिया। और भारत के ज्ञान का डंका भी पूरी दुनिया में बजने लगा।
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