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मंदिर राजनीति की निर्णायक परिणति, नीरजा चौधरी बता रही हैं कोई और फैसला आता तो..?

Neerja Chowdhary नीरजा चौधरी
Updated Thu, 01 Oct 2020 02:05 AM IST
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ढांचा विध्वंस में सभी आरोपी बरी
ढांचा विध्वंस में सभी आरोपी बरी - फोटो : Amar Ujala

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आखिरकार 28 वर्षों बाद बुधवार को बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने सभी 32 अभियुक्तों को बाइज्जत बरी कर दिया और कहा कि इनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है। गौरतलब है कि बाबरी मस्जिद छह दिसंबर, 1992 में ढहा दी गई थी।
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इस मामले में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह और उमा भारती जैसे भाजपा के कई दिग्गज नेताओं समेत 49 लोग अभियुक्त थे, जिनमें से 17 की पहले ही मौत हो गई है। पिछले वर्ष नवंबर में जब राम मंदिर के निर्माण से संबंधित जो फैसला आया था, उसके बाद अगर अदालत का इससे अलग कोई फैसला आता, तो हैरानी होती।


मान लीजिए कि अगर सीबीआई की विशेष अदालत ने कोई दूसरा फैसला सुनाया होता, तो अयोध्या में भव्य मंदिर बनने पर एक आंच आ जाती, क्योंकि तब किसी को यह कहने का मौका मिल जाता कि आपराधिक षड्यंत्र करके आपने मस्जिद को ढहाया और वहीं आप अदालत की मंजूरी से रामलला का भव्य मंदिर बना रहे हैं। इसलिए बुधवार को आया फैसला अपेक्षित लाइन पर ही है।

दूसरी बात, मान लीजिए अगर फैसला इसके विपरीत आता,तो इस मामले के अभियुक्त उसे चुनौती देते और तब मुख्य मुद्दा मंदिर न रहकर ये लोग बन जाते। ये वे लोग हैं, जिन्होंने इस पूरे आंदोलन को खड़ा किया और उसे आगे बढ़ाया। इन्हीं लोगों के उठाए मुद्दे के कारण भाजपा राजनीति के केंद्र में आई और आज केंद्रीय सत्ता पर काबिज है। अगर ये लोग चुनौती देते, तो सवाल उठता, इन्हें लोगों का समर्थन मिलता, बहस होती, तो ये लोग एक बार फिर उस बहस के केंद्र में आ जाते। भव्य राम मंदिर इतना केंद्र में नहीं रहता।

लेकिन आज जो बात प्रमुखता से उभरकर सामने आई है, वह है भव्य राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त होना और इस मुद्दे को निर्णायक परिणति तक पहुंचाना और यह सब कुछ नरेंद्र मोदी के शासन काल में हुआ है। यह संदेश मुख्य मुद्दा बन गया है।

बीते पांच अगस्त को अयोध्या में जिस तरह से राम मंदिर का शिलान्यास किया गया, जिसमें प्रमुख नेता के रूप मे केवल नरेंद्र मोदी ही थे, उसे देखते हुए यह संदेश और भी मजबूत होता है। इस तरह से आज के फैसले के बाद एक मजबूत संदेश यह जाता है कि राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को नरेंद्र मोदी के शासन काल में निर्णायक परिणति तक पहुंचाया गया।

ठीक है कि अदालत को इन लोगों के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिला, लेकिन भाजपा व विहिप के नेताओं ने एक उन्माद का माहौल तो खड़ा किया ही था, जिसके असर से वह ढांचा ढहा। यह माना जा सकता है कि आडवाणी या जोशी जैसे लोग आपराधिक षड्यंत्र का हिस्सा नहीं थे, पर इनके भाषणों से उन्माद तो पैदा हुआ ही।

सुप्रीम कोर्ट ने तो 2017 और 2019 में कहा ही था कि यह पूर्वनियोजित था, गैर-कानूनी था और कानून के राज का गंभीर उल्लंघन था। सबकी आंखों के सामने ढांचे को ढहाया गया। फिर भी 28 साल बाद जब कई सरकारें आई और गईं, तो भी इतने बड़े लोकतांत्रिक देश में इतनी बड़ी पुलिस मशीनरी और जांच एजेंसियों के बावजूद यह पता नहीं लगाया जा सका कि ढांचे को ढहाने वाले कौन थे।

इससे हमारे संस्थानों के बारे में क्या संदेश जाता है, यह तो हम देख ही रहे हैं। राजनीतिक रूप से यह मंदिर की राजनीति की निर्णायक परिणति है। राम मंदिर बनेगा और विवादित ढांचे के ढहाये जाने वाले मुद्दे में सारे अभियुक्त बरी हो गए-एक तरह से यह कहानी खत्म हो गई। लेकिन न्याय नहीं हुआ। किसी को दोषी नहीं ठहराया गया कि किसने ढांचे को ढहाया और न ही वह पता करने की मंशा दिखती है।

इससे उन लोगों में उत्साह पैदा होगा, जिन्होंने पहले ही काशी और मथुरा के बारे में बात करना शुरू कर दिया है। काशी के ज्ञानव्यापी मस्जिद और मथुरा के ईदगाह मस्जिद को हटाने के लिए कुछ लोगों ने याचिका दायर की है। इसके अलावा प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 को भी जून में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है और इसे रद्द करने की मांग की गई है।

अगर आर्थिक संकट और बढ़ेगा, तो काशी-मथुरा मुद्दे को भाजपा द्वारा तूल दिया जा सकता है। उत्तर प्रदेश के चुनाव में और लोकसभा चुनाव में भाजपा इसका किस तरह से फायदा उठाती है, यह देखने वाली बात होगी, लेकिन इसका श्रेय निश्चित रूप से नरेंद्र मोदी को मिलेगा।

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