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कॉरपोरेट जगत के लिए सबक: अदाणी मामले को अलग-अलग नजरिये से देखने की जरूरत
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गौतम अदाणी (फाइल फोटो)
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सोशल मीडिया
विस्तार
गौतम अदाणी के मामले को किसी एक नजरिये से नहीं, बल्कि अलग-अलग नजरिये से देखने की जरूरत है। तभी हम इसे समझ पाएंगे। सच्चाई यह है कि पिछले एक-दो साल में गौतम अदाणी भारतीय औद्योगिक परिदृश्य में काफी तेजी से छा गए थे। हर क्षेत्र में उनका प्रवेश हो गया था। फोर्ब्स द्वारा जारी दुनिया के सबसे धनी लोगों में वह दूसरे नंबर पर पहुंच गए थे। जाहिर है, जो अचानक काफी तेजी से आगे बढ़ता है, उस पर नजर टिक जाती है। ऐसा ही अदाणी के मामले में हुआ। अदाणी के तेजी से उभार के कारण अचानक ही कई जरूरी-गैरजरूरी सवाल पैदा हुए।
इससे अदाणी के प्रति कुछ धारणाएं भी बन गईं। उदाहरण के लिए, यह कहा जाने लगा कि अदाणी का पैसा विदेश जाता है, फिर घूमकर वहां से यहां आता है। अदाणी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नजदीकी है। जहां-जहां अंबानी हैं, वहां-वहां अदाणी हैं। जैसे-अंबानी के पास मीडिया कंपनी सीएनबीसी है, तो अदाणी ने उस एनडीटीवी में निवेश किया, जिसकी छवि मोदी-विरोधी की रही है। धारणा यह भी बनी कि सत्तारूढ़ दल से रिश्ते और बैंकों से मिले कर्ज के कारण अदाणी का साम्राज्य इतना फला-फूला। और यह भी कि अदाणी समूह का साम्राज्य अपने फंडामेंटल्स के कारण नहीं, बल्कि शेयर बाजार के कारण इस ऊंचाई पर है।
तथ्य यह है कि जो लोग अदाणी की व्यवसायिक प्रतिद्वंद्विता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे थे, उन लोगों ने यहां तक मान लिया कि उनके प्रतिद्वंद्वी ने ही अमेरिकी शॉर्ट-सेलर कंपनी हिंडनबर्ग को अदाणी के बारे में जानकारी मुहैया कराई होगी। कारोबारी दुनिया में इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन उसका नतीजा सबको मालूम है।
हिंडनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में अदाणी समूह पर खाते में हेराफेरी, कंपनी में गड़बड़ी और शेयरों की कीमत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने जैसे कई गंभीर आरोप लगाए। रिपोर्ट में मॉरीशस से लेकर संयुक्त अरब अमीरात तक टैक्स हेवन देशों में अदाणी समूह की मुखौटा कंपनियों के विवरण दिए गए। रिपोर्ट में आरोप लगाए गए कि इन मुखौटा कंपनियों का इस्तेमाल हेराफेरी के लिए हुआ।
हिंडनबर्ग की रिपोर्ट जारी होते ही अदाणी के औद्योगिक साम्राज्य में सेंध लगनी शुरू हुई। निवेशकों के 10 लाख करोड़ रुपये डूब गए। खुद अदाणी फोर्ब्स की अरबपतियों की सूची में दूसरे नंबर से खिसककर 24वें नंबर पर पहुंच गए। अदाणी समूह की ज्यादातर कंपनियों के शेयरों के न सिर्फ मूल्य गिर गए, बल्कि इनके प्रति बाजार की धारणा भी बदल गई। संसद में हंगामा हुआ और विपक्षी दलों ने संयुक्त संसदीय समिति से इस मामले की जांच कराने की मांग की। लेकिन सरकार का कहना था कि इस मामले में उसका कोई लेना-देना नहीं है, और रिजर्व बैंक से लेकर सेबी जैसी संस्थाएं इसकी जांच कर रही है।
हालांकि हिंडनबर्ग रिपोर्ट के जवाब में अदाणी समूह का यह कथन कि 'यह किसी खास कंपनी पर नहीं, बल्कि भारत, उसकी विकास की कहानी और उसकी महत्वाकांक्षाओं पर सुनियोजित हमला है' खास मायने नहीं रखता। अलबत्ता बाजार में अदाणी समूह की धीरे-धीरे सुधरती स्थिति से संदेश गया कि उसके खिलाफ सुनियोजित योजना थी। अगर हिंडनबर्ग की रिपोर्ट और बीबीसी की नरेंद्र मोदी पर दो भागों में बनाई गई डॉक्यूमेंटरी की टाइमिंग देखें, तो यह अदाणी की ओट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि कमज़ोर करने की कोशिश का रूप ले लेता है। कहना और आसान हो गया कि बीबीसी तो मोदी विरोधी है ही और भारत की विकास गाथा उससे देखी नहीं जा रही। मोदी पर हमला बोलने से पहले उसने इस पर विचार करने का भी प्रयास नहीं किया कि इस देश का सुप्रीम कोर्ट गुजरात मामले में उन्हें क्लीन चिट दे चुका है। सवाल उठा कि बीबीसी हमेशा भारत-विरोधी स्टोरी ही क्यों करता है।
अब जब भारत स्थित बीबीसी के कार्यालय में आयकर के सर्वे हुए, तो इसे बदले की कार्रवाई बताया गया। अगर मान भी लें कि यह बदला है, तो राजनीतिक दृष्टि का सवाल यह है कि ऐसा क्यों नहीं हो सकता? क्या भारत और उसकी सरकार करुणा का अवतार है? दिलचस्प है कि दूसरी तरफ शॉर्ट सेलर हिंडनबर्ग के हित, बीबीसी पर पुराने जमाने में लगे प्रतिबंध से लेकर कांग्रेस शासित राज्यों में अदाणी के भारी कारोबार के पुलिंदे भी पेश हो रहे हैं। चुनाव आने की बेला में राजनीतिक पार्टियां, अंतरराष्ट्रीय लॉबी और प्रचार तंत्र का एक हिस्सा जब किसी कहानी में एक साथ दिखाई देने लगे, तो आर्थिक चोट से राजनीतिक शिकार की गंध आने लगती है।
ऐसे में पूरे प्रकरण को आम आदमी कैसे देखे? दरअसल कॉरपोरेट संस्थाओं के लिए इस प्रकरण में ज्यादा सबक छिपे हैं। देखने की बात यह है कि अदाणी मामला सर्वोच्च न्यायालय में है और सुप्रीम कोर्ट ने सेबी से यह पूछा है कि निवेशकों के हित में क्या कानून है। सर्वोच्च न्यायालय ने अदाणी-हिंडनबर्ग मामले की जांच के लिए विशेषज्ञों के नाम सीलबंद लिफाफे में लेने से इनकार कर दिया है और मामले में पारदर्शिता की बात करते हुए उसने अपनी तरफ से विशेषज्ञ कमेटी गठित करने की बात भी कही है। अदाणी समूह का कारोबार अब धीरे-धीरे पटरी पर लौट रहा है, लेकिन अदाणी समूह को निवेशकों का विश्वास वापस पाने में समय लगेगा। अलबत्ता व्यापक स्तर पर देखें, तो मेरा मानना है कि अदाणी मामले का भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोई खास असर नहीं पड़ने वाला। जिन लोगों ने अदाणी समूह के शेयर खरीदे, प्रभावित तो वही हिस्सा हुआ है। बाजार ऐसे झटकों से दो-तीन महीने में उबरने की प्रक्रिया में चला जाता है।
इसके बावजूद अदाणी मामला देश के कॉरपोरेट्स के लिए सबक तो है ही। सबक यह है कि अगर कारोबार और उद्योग के संचालन में पेशेवर तौर-तरीके नहीं अपनाए गए तथा बड़े कारोबारी फैसले व्यक्तिगत स्तर पर और राजनीतिक जुड़ाव के आधार पर लिए गए, तो उससे होने वाले नुकसान से नहीं बचा जा सकता। एक खास तरह की पेशेवर सख्ती के बिना आप स्थायी और नैतिक रूप से अभेद्य संस्थान खड़ा नहीं कर सकते।