Srilanka Crisis: श्रीलंका के आर्थिक-संवैधानिक संकट के बारे में समझिए, जानिए भारत पर क्या होगा इसका असर?
विशेषज्ञों के मुताबिक श्रीलंका के इस हालात के लिए कई चीजें जिम्मेदार हैं। एक दशक पहले के गृह युद्ध के बाद श्रीलंका घरेलू बाजार में सामानों की आपूर्ति पर लगा रहा और इसकी वजह से दूसरे देशों से आमदनी कम होने के साथ-साथ इंपोर्ट का बिल बढ़ता गया। श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार जो 2020 के शुरुआत में करीब 7.6 बिलियन डॉलर था वह अगले तीन महीने में ही घटकर 2 बिलियन डॉलर से कम हो गया।
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विस्तार
श्रीलंका में राजनीतिक संकट काफी गहरा चुका है। देश में आपातकाल लगाया जा चुका है और देश के कई हिस्सों में हिंसक प्रदर्शन भी हो रहे हैं। इस्तीफे का ऐलान कर चुके राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे पहले ही देश छोड़कर जा चुके हैं और देश के संवैधानिक प्रावधानों के तहत प्रधानमंत्री बनाए गए रनिल विक्रमसिंघे से भी तुरंत इस्तीफा देने की मांग की जा रही है। प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे के दफ्तर में घुस चुके हैं और राष्ट्रीय टीवी चैनल के स्टूडियो पर कब्ज़ा कर चैनल को भी ऑफ एयर कर दिया है।
क्यों बने ऐसे हालात?
इस तरह के हालात में सवाल यह उठता है कि आखिर यह स्थिति क्यों पैदा हुई? गौरतलब है कि श्रीलंका के पास अब विदेशी मुद्रा का भंडार नहीं बचा है, जिसका मतलब साफ है कि उसके पास अब दूसरे देशों से सामान खरीदने की क्षमता नहीं है।
अगर सरकार की मानें तो इसके पीछे की वजह कोविड महामारी है क्योंकि इसका सीधा असर पर्यटन पर पड़ा। गौरतलब है कि पर्यटन सेक्टर, श्रीलंका की कमाई का जरूरी हिस्सा रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों का मत अलग है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, एक दशक पहले के गृह युद्ध के बाद श्रीलंका घरेलू बाजार में सामानों की आपूर्ति पर लगा रहा और इसकी वजह से दूसरे देशों से आमदनी कम होने के साथ-साथ इंपोर्ट का बिल बढ़ता गया। यही वजह रही कि श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार जो 2020 के शुरुआत में करीब 7.6 बिलियन डॉलर था वह अगले तीन महीने में ही घटकर 2 बिलियन डॉलर से कम हो गया।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, मौजूदा समय में यह सिर्फ़ 50 मिलियन डॉलर के आस-पास है। इसके अलावा, श्रीलंका पर चीन समेत दूसरे देशों का भारी कर्ज भी है।
2019 में टैक्स कटौती से जुड़े सरकारी फैसले को भी इसके लिए जिम्मेदार माना जा रहा है। विशेषज्ञों की मानें, तो इस फैसले से सरकार को सालाना करीब 1.4 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ। यही नहीं, 2021 की शुरुआत में श्रीलंका की विदेशी मुद्रा की कमी होने के बाद सरकार ने रासायनिक उर्वरकों के आयात पर प्रतिबंध लगाते हुए किसानों को लोकल जैविक उर्वरकों का इस्तेमाल करने के लिए कहा।
इससे फसल बर्बाद हुई और विदेशों से खाद्य पदार्थों की आपूर्ति की वजह से विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आई।
आगे की क्या होगी योजना?
ऐसे हालात में जब हर सामान की कीमत बढ़ रही हो, महंगाई दर पचास प्रतिशत को पार कर चुकी हो और पूरा देश बिजली, दवाई, ईंधन की कमी से जूझ रहा हो, सबसे बड़ा सवाल यह बनता है कि सरकार के पास आगे की क्या योजना है?
सामानों के आयात के लिए विदेशी मुद्रा अब बचा नहीं है और आगे की व्यवस्था कैसे बहाल होगी, इसका भी जवाब नहीं है।
फिलहाल, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से 3 बिलियन डॉलर की राहत राशि और रूस तथा कतर से कम लागत में पेट्रोल आपूर्ति के लिए बातचीत जारी है। यही नहीं, जरूरत पड़ने पर सरकारी मालिकाना हक वाली श्रीलंकाई एयरलाइंस का निजीकरण भी हो सकता है।
विश्व बैंक ने 600 मिलियन डॉलर और भारत ने 1.9 बिलियन डॉलर उधार देने पर सहमति जताई है। इसके अलाावा, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका की ग्रुप-7 ने कर्ज में राहत देने का वादा किया है।
संवैधानिक संकट का क्या होगा?
मौजूदा समय का सबसे बड़ा सवाल देश के राजनीतिक भविष्य को लेकर है। बगैर इस्तीफा दिए राष्ट्रपति के देश छोड़ने के बाद प्रधानमंत्री अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में कार्यभार संभाल रहे हैं। संवैधानिक प्रावधानों के तहत इस नियुक्ति को मंजूरी देने के लिए संसद को एक महीने के अंदर बैठक करना अनिवार्य है, लेकिन प्रदर्शनकारी तुरंत उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।
उनके इस्तीफे के बाद स्पीकर महिंदा यप्पा अभयवर्द्धना राष्ट्रपति बन सकते हैं जो गोटाबाया के दल से ही हैं। इसका मतलब साफ है कि विपक्षी दलों का समर्थन उन्हें किसी भी हालत में नहीं मिलेगा।
गौरतलब है कि सजिथ प्रेमदासा के नेतृत्व वाली विपक्षी दल का दावा है कि 113 सांसदों के समर्थन के साथ उन्हें संसद में बहुमत हासिल है। एक संभावना यह भी बनती है कि स्पीकर के बाद सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को राष्ट्रपति बनाया जाए, लेकिन इसके लिए भी संसद को प्रस्ताव पारित करना होगा जो संभव नहीं दिखता।
सजिथ प्रेमदासा की एसजेपी और जेवीपी ने संयुक्त रूप से घोषणा की है कि वे सरकार बना सकते हैं, लेकिन इसके लिए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पहले इस्तीफ़ा देना होगा। आर्थिक संकट से जूझ रहे देश के पास चुनाव कराने के लिए पैसे नहीं हैं और ऐसे में यह संकट जल्दी खत्म होता नहीं दिख रहा है।
भारत पर क्या होगा असर?
श्रीलंका में जारी राजनीतिक गतिरोध और आर्थिक संकट की वजह से भारत के समुद्री कारोबार पर असर पड़ सकता है क्योंकि भारत आने वाले 50 फीसदी से ज्यादा जहाज श्रीलंकाई बंदरगाह पर ही आते हैं। यही नहीं, इससे हर साल होने वाले करीब 4 अरब डॉलर के निर्यात और कर्ज वापसी में भी परेशानी हो सकती है।
भारत के लिए श्रीलंका का महत्व कारोबारी नज़रिए से ज्यादा जियो पॉलिटिक्स के नजरिए से है। यही वजह है कि भारत काफी सतर्क है और हर घटनाक्रम पर फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है।
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