क्या है आदिवासियों का पत्थलगड़ी आंदोलन? क्यों रहना होगा सरकार को सतर्क
झारखंड सहित अन्य आदिवासी में क्षेत्रों में पत्थलगड़ी की आड़ में एक बार फिर से माओवादी गतिविधियों को हवा देने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि इस मामले में स्थानीय पत्थलगड़ी समर्थकों का कहना है कि यह लड़ाई अपने हक के लिए लड़ी जा रही है, लेकिन गुप्तचर संस्थाओं की रिपोर्ट बताती है कि इस लड़ाई की आड़ में माओवादी पूरे क्षेत्र को अशांत करने में लगे हैं। इधर इस मामले में सरकार की ओर से भी जो सकारात्मक पहल होनी चाहिए वह नहीं हो रही है और सरकारी कारिन्दे मामले को सुलझाने के बदले उलझा रहे हैं।
इस बीच झारखंड में रघुवर दास के नेतृत्व वाली सरकार ने कुछ ऐसे कानून बनाने की कोशिश की है, जिससे आदिवासियों को यह डर सताने लगा है कि सरकार के द्वारा उन्हें अब उनकी मुख्य भूमि से बेदखल करने की साजिश की जा रही है। मसलन बिरसा मुंडा की धरती खूंटी और आसपास के कुछ खास आदिवासी इलाके इन दिनों सुर्खियों में हैं। कई गांवों में आदिवासी, पत्थलगड़ी कर ‘अपना शासन, अपनी हुकूमत की मुनादी कर रहे हैं।
ग्राम सभाएं कई किस्म का फरमान जारी करने लगी हैं। इनके अलावा कई गांवों में पुलिस वालों को घंटों बंधक बना लिए जाने की कई घटनाएं सामने आई हैं। बीते साल खूंटी के कोचांग समेत छह गांवों में पत्थलगड़ी कर आदिवासियों ने अपनी कथित हुकूमत की हुंकार भरी, लेकिन पुलिस और प्रशासन इस आन्दोलन को दबाने में लगी है।
क्या है पत्थलगड़ी और इसकी परंपरा
आदिवासी समुदाय और गांवों में विधि-विधान/संस्कार के साथ पत्थलगड़ी (बड़ा शिलालेख गाड़ने) की परंपरा पुरानी है। इनमें मौजा, सीमाना, ग्रामसभा और अधिकार की जानकारी रहती है। वंशावली, पुरखे तथा मरनी (मृत व्यक्ति) की याद संजोए रखने के लिए भी पत्थलगड़ी की जाती है। कई जगहों पर अंग्रेजों या फिर दुश्मनों के खिलाफ लड़कर शहीद होने वाले वीर सपूतों के सम्मान में भी पत्थलगड़ी की जाती रही है।
दरअसल, पत्थलगड़ी उन पत्थर स्मारकों को कहा जाता है जिसकी शुरुआत इंसानी समाज ने हजारों साल पहले की थी। यह एक पाषाणकालीन परंपरा है जो आदिवासियों में आज भी प्रचलित है। माना जाता है कि मृतकों की याद संजोने, खगोल विज्ञान को समझने, कबीलों के अधिकार क्षेत्रों के सीमांकन को दर्शाने, बसाहटों की सूचना देने, सामूहिक मान्यताओं को सार्वजनिक करने आदि उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रागैतिहासिक मानव समाज ने पत्थर स्मारकों की रचना की।
पत्थलगड़ी की इस आदिवासी परंपरा को पुरातात्त्विक वैज्ञानिक शब्दावली में ‘महापाषाण’,‘शिलावर्त’और मेगालिथ कहा जाता है। दुनिया भर के विभिन्न आदिवासी समाजों में पत्थलगड़ी की यह परंपरा मौजूदा समय में भी बरकरार है।
झारखंड के मुंडा आदिवासी समुदाय इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं, जिनमें कई अवसरों पर पत्थलगड़ी करने की प्रागैतिहासिक और पाषाणकालीन परंपरा आज भी प्रचलित है। कायदे से पत्थलगड़ी कई प्रकार का होता है। जानकारों का मानना है कि पत्थलगड़ी के कम से कम 40 प्रकार हैं, लेकिन वर्तमान सात प्रकार के पत्थलगड़ी ही प्रचलित हैं।
क्यो उठ रहे हैं इस परंपरा को लेकर सवाल
दूसरी तरफ ग्रामसभा द्वारा पत्थलगड़ी में जिन दावों का उल्लेख किया जा रहा है, उसे लेकर सवाल उठने लगे हैं। दरअसल, पत्थलगड़ी के जरिए दावे किए जा रहे हैं कि आदिवासियों के स्वशासन व नियंत्रण वाले क्षेत्र में गैरआदिवासी प्रथा के व्यक्तियों के मौलिक अधिकार लागू नहीं है। लिहाजा इन इलाकों में उनका स्वंतत्र भ्रमण, रोजगार-कारोबार करना या बस जाना, पूर्णतः प्रतिबंध है।
पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में संसद या विधानमंडल का कोई भी सामान्य कानून लागू नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 15 (पारा 1-5) के तहत एसे लोगों जिनके गांव में आने से यहां की सुशासन शक्ति भंग होने की संभावना है, तो उनका आना-जाना, घूमना-फिरना वर्जित है। वोटर कार्ड और आधार कार्ड आदिवासी विरोधी दस्तावेज हैं तथा आदिवासी लोग भारत देश के मालिक हैं, आम आदमी या नागरिक नहीं। संविधान के अनुच्छेद 13 (3) क के तहत रूढ़ी और प्रथा ही विधि का बल यानी संविधान की शक्ति है।
आदिवासी महासभा से जुड़े युसूफ पूर्ति कहते हैं- सरकार पत्थलगड़ी को गलत ठहराने में जुटी है, इससे हमें गुरेज है। सरकार, सामान्य कानून को आदिवासी क्षेत्रों में लाकर हमारे हितों की अनदेखी कर रही है, जबकि आदिवासी ग्राम सभा के जरिए स्वशासन चाहते रहे हैं और वह आदिवासियों का संवैधानिक अधिकार है।
क्यों चल रहा है यह आंदोलन?
पत्थलगड़ी आन्दोलन के पीछे जल, जंगल, जमीन और आदिवासियों की निजी जिंदगी में बाहरी लोगों का हस्तक्षेप है। लेकिन जमीन की सुरक्षा के लिए आदिवासी आवाज उठाते हैं तो उन्हें दबाया जाता है और उनका दमन किया जाता है।
दरअसल, आदिवासियों को यह आशंका सता रही है कि सरकार अंग्रेजों के जमाने में बनी छोटा नागपुर काश्तकारी कानून में संशोधन कर उनकी जमीन छीनने की कोशिश में जुटी है, तभी तो बिरसा मुंडा की जन्मस्थली उलिहातू के लोग भी कई मौके पर सरकार के रुख पर नाराजगी जता चुके हैं।
गौरतलब है कि साल 2016 में सरकार छोटा नागपुर काश्तकारी कानून में संशोधन करने की कोशिश की लेकिन पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर विरोध हुआ था और सरकार को अपना पैर पीछे करना पड़ा।
अलबत्ता इन दिनों कई गांवों में ‘अबुआ धरती, अबुआ राज ( अपनी धरती, अपना राज) अब चलेगा ग्राम सभा का राज’ जैसे नारे गूंजते हैं। हालांकि इन गांवों में किसी के आने-जाने पर सीधी रोक तो नहीं पर अनजान व्यक्ति को टोका जरूर जाता है।
तीर-कमान से लैस युवक, हर गतिविधियों पर पैनी नजर रखते हैं। वैसे पत्थलगड़ी को लेकर कई ग्राम प्रधान मुंह नहीं खोलना चाहते जबकि दर्जनों ग्राम प्रधानों को पत्थलगड़ी का यह स्वरूप उचित नहीं लग रहा है। उनका पक्ष है कि सरकारी योजना-कार्यक्रम का लाभ नहीं लेंगे तो विकास की बात बेमानी होगी। पंचायतों को भी जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी।
कितने प्रकार के होते हैं पत्थलगड़ी
पत्थलगड़ी कई प्रकार के होते हैं।
पत्थर स्मारक: ये खड़े और प्रायः अकेले होते हैं।
मृतक स्मारक पत्थर: ये चैकोर और टेबलनुमा होते हैं। जैसे चोकाहातु (झारखंड) का ससनदिरि के पत्थर स्मारक।
कतारनुमा स्मारक: ये एक कतार में या फिर समान रूप से कई कतारों में होते हैं।
अर्द्धवृताकार स्मारक: ये अर्द्धवृताकार होते हैं।
वृताकार स्मारक: ये पूरी तरह से गोल होते हैं। जैसे महाराष्ट्र के नागपुर स्थित जूनापाणी के शिलावर्त। ज्यामितिक स्मारक: ये ज्यामितिक आकार वाले होते हैं।
खगोलीय स्मारक: ये अर्द्धवृताकार, वृताकार, ज्यामितिक और टी-आकार के होते हैं। जैसे पंकरी बरवाडीह (झारखंड) के पत्थर स्मारक।
इधर मुंडा आदिवासियों के अनुसार पत्थलगड़ी 4 तरह के होते हैं।
ससनदिरि: यह दो मुंडारी शब्दों से बना है। ‘ससन’ और ‘दिरि’। ‘ससन’ का अर्थ मसान अथवा कब्रगाह है जबकि ‘दिरि’ का अर्थ पत्थर होता है। ससनदिरि में मृतकों को दफनाया जाता है और उनकी कब्र पर पत्थर रखे जाते हैं। ससनदिरि में मृतकों की याद में रखे जाने वालों पत्थरों का आकार चौकोर और टेबलनुमा होता है।
झारखंड में मुंडाओं का सबसे प्राचीन और विशाल ससनदिरि चोकाहातु गांव में है। रांची से 80 किलोमीटर रांची-जमशेदपुर मार्ग पर सोनाहातु से आगे चोकाहातु, स्थित ‘ससनदिरि’ 7 एकड़ में फैला विशाल मेगालिथ क्षेत्र है। यहां 7600 से ज्यादा मृतक स्मारक पत्थर है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह कम से कम 2500 साल पुराना है जहां आज भी मुंडा लोग मृतकों को दफनाते हैं या फिर मृतकों के ‘हड़गड़ी’ की रस्म संपन्न करते हैं।
बुरूदिरि और बिरदिरि: मुंडारी भाषा में ‘बुरू’ का अर्थ पहाड़ और ‘बिर’ का अर्थ जंगल होता है। इस तरह के पत्थर स्मारक यानी पत्थलगड़ी क्षेत्रों, बसाहटों और गांवों के सीमांकन की सूचना के लिए की जाती है।
टाइडिदिरि: ‘टाइडि’ राजनीतिक अर्थ को व्यक्त करता है।
सामाजिक-राजनीतिक निर्णयों और सूचनाओं की सार्वजनिक घोषणा के रूप में जो पत्थर स्मारक खड़े किए जाते हैं उन्हें टाइडिदिरि पत्थलगड़ी कहा जाता है।
हुकुमदिरि: हुकुम अर्थात् दिशानिर्देश या आदेश। जब मुंडा आदिवासी समाज कोई नया सामाजिक-राजनीतिक या सांस्कृतिक निर्णय लेता है तब उसकी उद्घोषणा के लिए इसकी स्थापना की जाती है।
हालांकि ये सांस्कृतिक आन्दोलन के समान है, लेकिन अब इसकी आड़ में झारखंड सहित, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओड़िसा, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक एवं महाराष्ट्र में केन्द्र एवं राज्य सरकारों को चुनौती दी जाने लगी है।
मीडिया में आई रिपोर्ट के मुताबिक खूंटी में प्रशासनिक दबाव को देखते हुए पत्थलगड़ी समर्थकों ने अपना नया ठिकाना पश्चिमी सिंहभूमि जिले के बंदगांव प्रखंड को बनाया है। यह आन्दोलन युसूफ पूर्ति के नेतृत्व में एक बार फिर से संगठित होने लगा है।
जानकारों का मानना है कि इस आन्दोलन में विदेशी शक्तियों का हाथ है और यह आन्दोलन माओवादी उपद्रव का ही एक रूप है। जानकारों का तो यहां तक कहना है कि पत्थलगड़ी समर्थकों से सरकार को सावधान हो जाना चाहिए। अगर प्रशासन समय रहते कोई सकारात्मक कार्रवाई नहीं की तो झारखंड और आदिवासी प्रदेशों में नये प्रकार मुद्दा जन्म ले सकता है।
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