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सुरेंद्र कोली जेल से तो छूटा, अपने नाम से नहीं
सार
दिसंबर 2006 में नोएडा के निठारी में कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर के मकान के पीछे नाले के पास मानव अवशेष मिलने से देश स्तब्ध रह गया। कई बच्चे और महिलाएं लापता थे। पंढेर के घरेलू नौकर सुरेंद्र कोली को गिरफ्तार किया गया। उसके खिलाफ हत्या, अपहरण और यौन अपराधों के मुकदमे चले।
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यहीं मिला था निठारी कांड के आरोपी सुरेंद्र का शव
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
किसी फिल्म की पटकथा होती तो शायद दर्शक इसके अंत को जरूरत से ज्यादा नाटकीय मानते। एक गरीब पहाड़ी युवक रोजगार की तलाश में अपना गांव छोड़ता है। महानगर में घरेलू नौकर बनता है। अचानक देश के सबसे भयावह अपराधकांडों में से एक का चेहरा बना दिया जाता है। उसे एक ऐसे खूंखार आदमी के रूप में पेश किया जाता है, जिसका नाम सुनकर लोग सिहर उठें।
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अदालत से एक के बाद एक मौत की सजाएं मिलती हैं। फांसी का फंदा उसके इतने करीब पहुंच जाता है कि जिंदगी कुछ घंटों की मेहमान दिखाई देने लगती है। लेकिन वह फांसी से बच जाता है। फिर मुकदमों की कहानी पलटती है। एक-एक कर दोषसिद्धियां गिरती हैं और करीब 19 साल बाद देश की सर्वोच्च अदालत अंतिम मामले में भी उसे बरी कर देती है।
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जेल का फाटक खुलता है। आदमी आजाद हो जाता है। लेकिन कहानी यहां समाप्त नहीं होती। असल में सुरेंद्र कोली की जिंदगी की सबसे मार्मिक कहानी शायद यहीं से शुरू होती है। वह जेल से तो छूट गया था, लेकिन उस नाम से नहीं छूट पाया जिसे लगभग दो दशक से देश ने निठारी के खौफ के साथ जोड़ रखा था।
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निठारी और वह नाम जिससे देश सिहर उठा
दिसंबर 2006 में नोएडा के निठारी में कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर के मकान के पीछे नाले के पास मानव अवशेष मिलने से देश स्तब्ध रह गया। कई बच्चे और महिलाएं लापता थे। पंढेर के घरेलू नौकर सुरेंद्र कोली को गिरफ्तार किया गया। उसके खिलाफ हत्या, अपहरण और यौन अपराधों के मुकदमे चले।
उसके कथित कबूलनामे और कथित बरामदगियों को अभियोजन ने महत्वपूर्ण आधार बनाया। मीडिया में उसका ऐसा भयावह चित्र बना कि धीरे-धीरे निठारी और सुरेंद्र कोली लगभग एक-दूसरे के पर्याय बन गए।अदालतों ने अलग-अलग मुकदमों में उसे दोषी ठहराया और मौत की सजाएं सुनाई गईं। एक समय ऐसा आया जब उसके लिए लगभग सारे कानूनी दरवाजे बंद दिखाई देने लगे।
दया याचिका भी खारिज हो गई। सितंबर 2014 में तो फांसी उसके बिल्कुल सामने खड़ी थी। उसे मेरठ जेल पहुंचाया गया था। लेकिन अंतिम समय में कानूनी हस्तक्षेप हुआ और फांसी रुक गई। बाद में मृत्युदंड को उम्रकैद में बदल दिया गया।
यह किसी थ्रिलर का मध्यांतर हो सकता था। क्योंकि इसके बाद कहानी ने बिल्कुल दूसरी दिशा पकड़ ली।
जिस कहानी पर सजा मिली, उसी पर उठे सवाल
अक्टूबर 2023 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने निठारी से जुड़े 12 मामलों में कोली को बरी कर दिया। अदालत ने जांच और अभियोजन के प्रमाणों में गंभीर कमियां पाईं। फिर जुलाई 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने उन मामलों में बरी किए जाने के खिलाफ अपीलें खारिज कर दीं।
लेकिन एक पुरानी दोषसिद्धि बची हुई थी
11 नवंबर 2025 को सर्वोच्च न्यायालय ने उस अंतिम मामले में भी कोली की दोषसिद्धि समाप्त कर दी। अदालत के सामने बड़ा सवाल यह था कि जिन कथित स्वीकारोक्ति और बरामदगियों को दूसरे संबंधित मामलों में विश्वसनीय कानूनी आधार नहीं माना गया, उन्हीं के आधार पर एक मामले में दोषसिद्धि कैसे कायम रह सकती है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे न्याय की गंभीर विफलता माना और कोली को अंतिम मामले में भी बरी कर तत्काल रिहाई का आदेश दिया।
करीब 19 साल बाद सुरेंद्र कोली जेल से बाहर आया। कानून की निगाह में अब वह आजाद आदमी था। लेकिन बाहर वह दुनिया नहीं थी जिसे वह 2006 में छोड़कर गया था।
उन्नीस साल बाद घर कहां था?
यहीं इस कहानी से अदालत, अपराध और पुलिस कुछ देर के लिए पीछे हट जाते हैं और सामने आता है एक आदमी और उसका उजड़ चुका परिवार।
19 साल बहुत लंबा समय होता है
जब कोली गिरफ्तार हुआ था तब उसका परिवार था। पत्नी थी, बच्चे थे, मां थी। लेकिन जिस आदमी को बार-बार मौत की सजा सुनाई गई हो और जिसकी फांसी तक लगभग निश्चित दिखाई देने लगी हो, उसके वापस आने की उम्मीद कोई परिवार आखिर कितने वर्षों तक लगाए रख सकता था? कोली की मां 2022 में गुजर गई थी। बेटी बड़ी हुई और उसका विवाह हो गया। पत्नी बच्चों के साथ पहले रिश्तेदारों के यहां चली गई और बाद में उसने दूसरा विवाह कर अपना नया घर बसा लिया।
पत्नी के इस निर्णय में दोष तलाशना इस त्रासदी को बहुत छोटे दायरे में देखना होगा। उसके सामने भी अपना जीवन और बच्चों का भविष्य था। जिस पति को मृत्यु-दंड मिला हो, जिसके लौटने की संभावना लगभग समाप्त दिखाई देती रही हो, उसकी प्रतीक्षा में जिंदगी को अनिश्चितकाल तक रोक देना आसान नहीं होता।
लेकिन जरा उस आदमी की वापसी की कल्पना कीजिए
करीब 19 वर्ष बाद जेल का दरवाजा खुला। जिस मां के पास लौटना था, वह अब इस दुनिया में नहीं थी। बेटी अपने ससुराल जा चुकी थी। पत्नी किसी दूसरी जिंदगी में आगे बढ़ चुकी थी। पुराना घर अब उसका इंतजार नहीं कर रहा था।
वह जेल से बाहर आया, मगर जिस घर में लौटना था, वह घर समय अपने साथ ले जा चुका था।
आजादी मिली, अब रोटी कहां से आए?
लेकिन जिंदगी केवल भावनाओं से नहीं चलती। रोटी भी चाहिए।करीब दो दशक जेल में बिताने के बाद 53 वर्ष की उम्र में वह कौन-सा रोजगार शुरू करता? और सबसे बड़ी बाधा थी उसका अपना नाम—सुरेंद्र कोली। जिस नाम के साथ वर्षों तक हत्या, बच्चों की मौत और यहां तक कि नरभक्षण जैसे भयावह आरोप सार्वजनिक स्मृति में जुड़े रहे हों, उस नाम का व्यक्ति किसी दरवाजे पर नौकरी मांगने कैसे जाए?
हरिद्वार में उसने एक नई शुरुआत की। स्थानीय लोग उसे उसके असली नाम से नहीं, “सदाराम” के नाम से जानते थे। उसने सिडकुल क्षेत्र में सुरक्षा गार्ड का काम भी किया। लेकिन रिपोर्ट के अनुसार जब नियोक्ता ने आधार कार्ड मांगा तो उसने वह काम छोड़ दिया। आधार कार्ड पर नाम था—सुरेंद्र कोली।
शायद एक प्लास्टिक का वह छोटा-सा कार्ड उसके पूरे अतीत का दरवाजा खोल सकता था। जिस आदमी को अदालतों ने बरी कर दिया था, उसे अपनी पहचान छिपाकर रोटी कमानी पड़ रही थी।
आखिर सहारा बनी चाय की दुकान
इसके बाद उसने हरिद्वार के सप्तसरोवर-भूपतवाला क्षेत्र में एक छोटी-सी चाय की दुकान किराये पर ली। दुकान का किराया करीब छह हजार रुपये महीना बताया गया है। एक सामाजिक कार्यकर्ता ने उसे दुकान शुरू करने के लिए 25 हजार रुपये देने की बात भी कही है। कभी पूरे देश के समाचार माध्यमों की सुर्खियों में रहा आदमी अब एक छोटी-सी दुकान में केतली चढ़ाकर चाय बेचना चाहता था। उसकी जरूरत शायद बहुत बड़ी नहीं थी—दो वक्त की रोटी, रहने की जगह और इतनी गुमनामी कि कोई पूछे नहीं कि सदाराम पहले कौन था।
लेकिन यह नई जिंदगी कुछ ही दिन चली
18 सितंबर 2026 की सुबह उसकी दुकान बंद मिली। लोगों ने अंदर देखा तो उसका शव फंदे से लटका हुआ था। पुलिस ने प्रथम दृष्टया इसे आत्महत्या माना है, लेकिन कोई आत्महत्या-पत्र नहीं मिला। पोस्टमार्टम और जांच के बाद ही मृत्यु की परिस्थितियों पर अंतिम निष्कर्ष निकाला जा सकेगा। उसके एक परिचित सामाजिक कार्यकर्ता ने मृत्यु की परिस्थितियों पर सवाल भी उठाए हैं। इसलिए यह मान लेना उचित नहीं होगा कि हम जानते हैं कि अंतिम समय में उसके साथ वास्तव में क्या हुआ या उसके मन में क्या चल रहा था।
एक कहानी, जिसके दो पीड़ित पक्ष हैं
सुरेंद्र कोली की कहानी लिखते समय एक बात कभी नहीं भूलनी चाहिए। निठारी में बच्चे और महिलाएं गायब हुए थे। मानव अवशेष मिले थे। परिवारों ने अपने बच्चे और अपने प्रियजन खोए। उनका दुख वास्तविक है। उनकी न्याय की तलाश को कोली की त्रासदी के नीचे दबाया नहीं जा सकता। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण न्याय का दूसरा सिद्धांत है—किसी मनुष्य को अपराधी तभी माना जा सकता है जब उसके विरुद्ध अपराध कानूनसम्मत और विश्वसनीय प्रमाणों से सिद्ध हो।
सर्वोच्च न्यायालय ने अंतिम मामले में स्पष्ट किया कि समान साक्ष्य के आधार पर परस्पर विरोधी न्यायिक परिणाम बने रहना स्वीकार्य नहीं था। अदालत ने यह भी खेद जताया कि इतने लंबे अनुसंधान के बावजूद वास्तविक अपराधी की पहचान कानूनी कसौटी पर स्थापित नहीं हो सकी।
यही निठारी की सबसे बेचैन करने वाली विरासत है। इतने जघन्य अपराध हुए तो उन्हें किसने किया?
और यदि जिस आदमी को लगभग दो दशक तक उन अपराधों का चेहरा माना गया, उसके विरुद्ध दोषसिद्धियां अंततः टिक नहीं सकीं, तो उसके जीवन के उन 19 वर्षों का हिसाब किसके पास है?
जेल से छूटा, अपने नाम से नहीं
कानून किसी आदमी को बरी कर सकता है। जेलर फाटक खोल सकता है। न्यायालय उसकी दोषसिद्धि मिटा सकता है।
लेकिन क्या समाज उसकी पुरानी पहचान मिटा सकता है? जब सुरेंद्र कोली 2006 में जेल गया था तब उसके पास एक घर, मां, पत्नी, बच्चे और भविष्य था। जब वह लौटा तो मां नहीं थी, पत्नी ने दूसरी जिंदगी शुरू कर दी थी, बेटी अपने घर चली गई थी और उसका अपना नाम आजीविका की राह में दीवार बन चुका था।
इसलिए उसने दूसरा नाम ओढ़ लिया सदाराम। पर आदमी नाम बदल सकता है, इतिहास नहीं।
सुरेंद्र कोली करीब 19 वर्ष बाद सलाखों से बाहर निकल आया था, लेकिन जिस पहचान में उसे इतने वर्षों तक कैद रखा गया, उससे शायद वह कभी बाहर नहीं निकल पाया। और इसीलिए उसकी विस्मयकारी और दुखांत कहानी एक सवाल छोड़ जाती है-
अदालत से बरी होकर लौटने वाले आदमी को अगर उसका घर, रोजगार, प्रतिष्ठा और पुरानी पहचान वापस न मिले, तो क्या केवल जेल का दरवाजा खुल जाना ही वास्तव में आजादी है?
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।