फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Chhattisgarh ›   The village in Chhattisgarh where Ravana is not burnt on Dussehra: the king's procession takes place

छत्तीसगढ़ का वह गांव, जहां दशहरे पर नहीं जलता रावण: निकलती है राजा की सवारी, 16वीं सदी से चली आ रही परंपरा

Thu, 02 Oct 2025 03:13 PM IST
Lalit Kumar Singh अमर उजाला नेटवर्क, मुंगेली
अमर उजाला नेटवर्क, मुंगेली Published by: Lalit Kumar Singh Updated Thu, 02 Oct 2025 03:13 PM IST
सार

कंतेली का दशहरा सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर है, जो छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं और अनोखी मान्यताओं की झलक प्रस्तुत करता है। यहां दशहरे के दिन रावण का दहन नहीं होता, बल्कि राजा की सवारी निकाली जाती है। 44 गांवों के लोग एकत्रित होते हैं।

विज्ञापन
The village in Chhattisgarh where Ravana is not burnt on Dussehra: the king's procession takes place
दशहरे पर नहीं जलता रावण बल्कि निकलती है राजा की सवारी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दशहरा आते ही पूरे देश में जगह-जगह रावण दहन की तैयारियां होती हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले का एक गांव ऐसा है जहां सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवंत है। यहां दशहरे के दिन रावण का दहन नहीं होता, बल्कि राजा की सवारी निकाली जाती है। इस अनोखी परंपरा को देखने और इसमें शामिल होने के लिए 44 गांवों के लोग एकत्रित होते हैं।
विज्ञापन


मुंगेली मुख्यालय से लगभग 10 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत कंतेली में 16वीं सदी से यह परंपरा चली आ रही है। यहां दशहरे के दिन कंतेली जमींदारी परिवार की ओर से राजा की सवारी निकाली जाती है। राजमहल से निकलने वाली यह सवारी कुल देवी मंदिर तक जाती है, जहां राजा मां महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली की पूजा-अर्चना कर क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
विज्ञापन


छत्तीसगढ़ का पहला ऐसा गांव
कंतेली गांव को छत्तीसगढ़ का पहला ऐसा गांव माना जाता है, जहां दशहरे पर रावण दहन नहीं होता। यहां का दशहरा केरल की उस परंपरा से मिलता-जुलता है, जहां राजा बली पाताललोक से बाहर आकर अपनी प्रजा का हालचाल लेते हैं। कंतेली में भी राजा और प्रजा के बीच इसी तरह का संवाद दशकों से कायम है।
विज्ञापन
विज्ञापन


44 गांवों की सहभागिता
इस परंपरा में आसपास के 44 गांवों के लोग शामिल होते हैं। जुलूस में नाच-गाना और धार्मिक आयोजन होते हैं। कुल देवी की पूजा के बाद राजमहल में सभा लगती है, जहां ग्रामीण राजा को सोनपत्ती अर्पित कर आशीर्वाद लेते हैं। यह अनोखी परंपरा लोगों में उत्साह और एकजुटता का प्रतीक मानी जाती है।

इतिहास की झलक
कंतेली जमींदारी के प्रथम पुत्र गजराज सिंह ने कुल देवी मंदिर का निर्माण कराया था। स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले 1944 में राजा पोखराज सिंह द्वितीय के निधन के बाद राजमाता पिनांक कुमारी देवी ने यशवंत कुमार सिंह को दत्तक पुत्र बनाया और तब से मंदिर और परंपराओं की जिम्मेदारी उन्हीं के संरक्षण में रही। बाद में मां महामाया समिति का गठन हुआ, जो नवरात्रि और दशहरे के आयोजन संभालती रही।


इस साल नहीं निकलेगी राजा की सवारी
हालांकि इस वर्ष परंपरा में बदलाव देखने को मिलेगा। ट्रस्ट अध्यक्ष अशोक कुमार बड्डगैया और छोटे राजा घनश्याम सिंह ने बताया कि स्वर्गीय गुनेंद कुमार सिंह, जो राजपरिवार के उत्तराधिकारी थे, उनका हाल ही में कार दुर्घटना में निधन हो गया। अभी तक नए उत्तराधिकारी का राजतिलक नहीं हुआ है। इसी कारण इस साल राजा की सवारी नहीं निकाली जाएगी। हालांकि, दशहरे का मेला पूर्ववत लगेगा और लोग परंपरागत आयोजनों में शामिल होंगे।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed