सबको पछाड़ भूपेश बघेल बने छत्तीसगढ़ के बादशाह, ये हैं वो चार वजह
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संकटमोचन बनकर कांग्रेस को उबारा
विद्याचरण शुक्ला, महेंद्र कर्मा और तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल के झीरम घाटी नक्सली हमले में मारे जाने के बाद प्रदेश में कांग्रेस को संकट से उबारने वाले नेताओं में बघेल का नाम सबसे पहले आता है।जब बघेल को प्रदेश कांग्रेस का नेतृत्व दिया गया तब पार्टी लगातार तीन विधानसभा चुनावों में हार से हताश और गुटबाजी से परेशान थी। बघेल ने सबको साथ लेकर चलने की नीति अपनाई और नतीजा ये हुआ कि प्रदेश में 15 साल बाद कांग्रेस की वापसी मुमकिन हुई।
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कड़े फैसले लेने वाले नेता की छवि
ढलान पर खड़ी पार्टी में न केवल बघेल ने जान फूंकी बल्कि पार्टी से पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और उनके बेटे अमीत जोगी को बाहर किया। विधानसभा चुनाव के दौरान बघेल ने नीतिगत तरीके से रमन सरकार को नसबंदी कांड, आंखफोड़वा कांड, भूमि अधिग्रहण समेत कई मुद्दों पर आड़े हाथों लिया।
पदयात्रा के जरिए बघेल ने प्रदेश के कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया। किसान पुत्र होने के नाते और प्रदेश में कृषि के महत्त्व को समझते हुए किसानों के मुद्दों को घोषणापत्र में शामिल करवाया।
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ओबीसी होने का मिला फायदा
भूपेश बघेल को ओबीसी नेता होने का फायदा मिला। इन चुनावों में कांग्रेस ने ओबीसी के प्रभाव वाली सीटों पर अच्छा प्रदर्शन किया। जहां एक ओर ताम्रध्वज साहू ने साहू मतदाताओं को कांग्रेस के करीब लाने में अहम भूमिका निभाई।
वहीं ओबीसी मतदाताओं के लिए यह भूमिका बघेल ने बखूबी अदा की। राज्य में कुर्मी और साहू समुदाय कुल आबादी का 36 फीसदी है, लिहाजा कोई भी पार्टी इन्हें साधे बिना सत्ता में नहीं आ सकती।
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मुकदमों से भी कभी नहीं हारे
राजनीतिक प्रभाव बढ़ने के कारण बघेल के खिलाफ मुकदमें भी दर्ज हो गए। हाल ही में रमन सिंह सरकार के मंत्री राजेश मूणत से जुड़ी एक कथित सेक्स सीडी के मामले में जब भूपेश बघेल को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया तो उन्होंने जमानत लेने से मना कर दिया।
पार्टी आलाकमान के समझाने के बाद वह जमानत लेने को तैयार हुए। इस तरह उनकी छवि कभी न झुकने वाली नेता की बन गई।