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घरेलू हिंसा केस में हाईकोर्ट का फैसला: सास-ननद की शिकायत पर बहू और मायके पक्ष को राहत नहीं, ट्रायल के निर्देश

Sun, 27 Sep 2026 12:44 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर
अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर Published by: अमर उजाला ब्यूरो Updated Sun, 27 Sep 2026 12:44 PM IST
सार

हाईकोर्ट ने घरेलू हिंसा से जुड़े मामले में बहू और उसके मायके पक्ष की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि साझा घर और पारिवारिक संबंधों से जुड़े तथ्यों का फैसला शुरुआती स्तर पर केवल दलीलों के आधार पर नहीं किया जा सकता।

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In cases of domestic violence,not only the husband but also the mother-in-law, daughter-in-law, and members of
हाईकोर्ट का बड़ा आदेश - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने घरेलू हिंसा से जुड़े एक मामले में बहू और उसके मायके पक्ष के लोगों को फिलहाल राहत देने से इनकार कर दिया है। सिंगल बेंच ने निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि साझा घर, पारिवारिक संबंध और कथित घरेलू हिंसा से जुड़े विवादों का फैसला प्रारंभिक स्तर पर केवल दलीलों के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए साक्ष्यों और गवाहों की जांच के साथ ट्रायल जरूरी है।
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यह मामला इसलिए भी अलग है क्योंकि शिकायत किसी बहू ने सास के खिलाफ नहीं, बल्कि सास और ननद ने अपनी बहू तथा उसके मायके पक्ष के रिश्तेदारों के खिलाफ दर्ज कराई थी।
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सास और ननद ने दर्ज कराई थी शिकायत
जानकारी के मुताबिक, रायपुर निवासी निर्मला अग्निवंशी और उनकी बेटी श्रुति अग्निवंशी ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 12 के तहत निचली अदालत में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में बहू अनिशा अग्निवंशी के साथ उसके मायके पक्ष के सुषमा सिंह, अभिषेक सिंह, अविनाश सिंह, अंजू सिंह और अलका सिंह को भी पक्षकार बनाया गया था। शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि बहू और उसके मायके पक्ष के लोग उनके साथ कथित तौर पर दुर्व्यवहार और मानसिक प्रताड़ना कर रहे थे तथा उन्हें परिवार से अलग करने के लिए दबाव बनाया जा रहा था।
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बहू और परिजनों ने क्या दलील दी?
बहू और उसके परिजनों की ओर से निचली अदालत में तर्क दिया गया कि वे शिकायतकर्ताओं के साथ साझा घर में एक साथ नहीं रहते, इसलिए उनके खिलाफ घरेलू हिंसा कानून के तहत कार्यवाही नहीं हो सकती। निचली अदालत ने यह दलील स्वीकार नहीं की। इसके बाद बहू और उसके परिजनों ने निचली अदालत के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने ट्रायल को बताया जरूरी
हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए मामले को शुरुआती स्तर पर खत्म करने से इनकार कर दिया। अदालत के अनुसार, साझा घर में रहना, पारिवारिक संबंध और कथित दुर्व्यवहार से जुड़े तथ्य ऐसे विषय हैं, जिनका निर्धारण साक्ष्य और गवाहों की जांच के बाद किया जाना चाहिए। घरेलू हिंसा कानून की धारा 2(एफ) के अनुसार, “डोमेस्टिक रिलेशनशिप” में ऐसे लोग शामिल हो सकते हैं जो किसी समय साझा घर में साथ रहे हों और जिनके बीच विवाह, रक्त संबंध, गोद लेने या संयुक्त परिवार जैसे संबंध हों। कानून में “शेयर्ड हाउसहोल्ड” की भी व्यापक परिभाषा दी गई है।


याचिका खारिज, अब ट्रायल में सामने आएंगे तथ्य
हाईकोर्ट ने बहू और उसके मायके पक्ष की याचिका खारिज करते हुए निचली अदालत की कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं किया। इसका अर्थ यह है कि मामले में लगाए गए आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण ट्रायल के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के परीक्षण के बाद होगा। इस मामले में हाईकोर्ट का मुख्य जोर इस बात पर रहा कि घरेलू हिंसा से जुड़े ऐसे विवादों को केवल शुरुआती दलीलों के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता, जब तथ्यात्मक विवादों की जांच अभी बाकी हो।
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