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बीजापुर: ग्रामीणों की पहल और विधायक का सहयोग बना आदिवासी बच्चों की उम्मीद, गांव वालों ने खोला स्कूल

Tue, 29 Jul 2025 04:40 PM IST
Digvijay Singh अमर उजाला नेटवर्क, बीजापुर
अमर उजाला नेटवर्क, बीजापुर Published by: Digvijay Singh Updated Tue, 29 Jul 2025 04:40 PM IST
सार

जब सरकार ने आदिवासी बच्चों के स्कूल पर ताला जड़ा, तो बीजापुर जिले के भैरमगढ़ ब्लाक के ककाड़ीपारा गांव ने हार मानने के बजाय इतिहास रच दिया।

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Initiative of villagers and support of MLA became hope for tribal children villagers opened school in Bijapur
गांव वालों ने खोला स्कूल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जब सरकार ने आदिवासी बच्चों के स्कूल पर ताला जड़ा, तो बीजापुर जिले के भैरमगढ़ ब्लाक के ककाड़ीपारा गांव ने हार मानने के बजाय इतिहास रच दिया। शिक्षा विभाग द्वारा स्कूल बंद करने के फैसले के खिलाफ ग्रामीणों ने ऐसा कदम उठाया जो आज पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन गया है। भैरमगढ़ ब्लॉक के जांगला संकुल में स्थित ककाड़ीपारा गांव में प्राथमिक शाला को बंद कर दिया गया और बच्चों को 5 किलोमीटर दूर जांगला स्कूल भेजने का फरमान जारी किया गया। लेकिन जंगली रास्तों और सुरक्षा चिंताओं के कारण यह विकल्प न तो व्यवहारिक था और न ही संवेदनशील। 

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जवाब में गांववालों ने अपने स्तर पर स्कूल का संचालन शुरू किया। गांव की रसोइया पार्वती कोवासी अब न सिर्फ बच्चों के लिए भोजन पकाती हैं बल्कि उन्हें पढ़ाना भी शुरू कर चुकी हैं। मध्याह्न भोजन की व्यवस्था भी ग्रामीणों ने आपसी सहयोग से संभाल ली है हर दिन एक परिवार भोजन उपलब्ध कराता है। वहीं गांव के ही युवक हरिराम पोयाम बच्चों को लाने ले जाने में मदद कर रहे हैं।
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इस ग्रामीण संघर्ष में अब उन्हें बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी का समर्थन भी मिला है। मंगलवार को वे खुद स्कूल पहुंचे, बच्चों से मिले और उन्हें ड्रेस, स्टेशनरी और खेल सामग्री वितरित की। उन्होंने पार्वती कोवासी और पूरे गांव के जज़्बे की तारीफ करते हुए कहा, शिक्षा हर नागरिक का अधिकार है, भाजपा सरकार इसे छीनना चाहती है। यह गांव बताता है कि इच्छाशक्ति हो तो कोई भी व्यवस्था खड़ी की जा सकती है।
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विधायक मंडावी ने सरकार से अपील की है कि आदिवासी इलाकों में स्कूलों को बंद करने के बजाय और अधिक स्कूल खोले जाएं। साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री से भी आग्रह किया है कि मन की बात करने से पहले इन बच्चों की मन की सुनें। ग्रामीणों का कहना है कि कलेक्टर और जिला शिक्षा अधिकारी से कई बार गुहार लगाने के बावजूद कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला। इसी कारण उन्होंने खुद स्कूल चलाने का फैसला लिया है। यह घटना सरकारी तंत्र की उदासीनता और ग्रामीणों की आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गई है। जहां प्रशासन ने शिक्षा बंद की, वहां जनता ने खुद व्यवस्था खड़ी कर दी।

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